भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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कर्पूरादिवर्गः ३८१ १०. अगर हिं०-अगर, काला अगर । बं०-अगर काष्ठ, अगुरु चन्दन । म०, गु०-अगर । पं०-ऊद, ऊदारसी । क०, ता०, ते०-कृष्णागरु । अ०-ऊद खाम । अं०-Eagle-wood (ईगल वुड) । ले०-Aquilaria agallocha Roxb. (एक्विलेरिया एगेलोचा राक्स.) Fam. Thymelaeaceae (थाइमेलिएसी) । यह पूर्व हिमालय, आसाम, भूटान, खासिया पहाड़ एवं सिलहट आदि प्रान्तों में पाया जाता है । इसका वृक्ष-बड़ा, ६०-७० फीट ऊँचा, ५-८ फीट व्यास का धारीदार एवं सदाहरित रहता है । काष्ठ-लकड़ी मुलायम, हलकी, लचीली, श्वेत या हलकी पीताभ श्वेत एवं इसमें कोई विशेष गंध नहीं होती । इसमें वार्षिक वृद्धि के वलय नहीं होते तथा मध्यम या छोटे आकार की ३ से ४ अरीय (Radial) वाहिकाओं (Vessels) की कतारें एवं इनके बीच तन्तुगुच्छों का फ्लोएम (Phloem) रहता है । काष्ठसार अलग नहीं दिखलाई देता । पत्ते-विपरीत, २-४.५ × .८-२ इञ्च बड़े, आयताकार भालाकार या कुछ दीर्घवृत्ताकार, चिकने तथा बहुत छोटे नाल से युक्त होते हैं । पुष्प-श्वेत रंग के गुच्छों में आते हैं । फल-१.५-२ इञ्च लम्बे, अभिअंडाकार एवं मृदु रोमावृत होते हैं । अगर-यह सुगन्धित द्रव्य पुराने वृक्षों के काष्ठ में कहीं-कहीं पाया जाता है । यह एक विशेष प्रकार के फफूँद (Fungi Imperfecti) के द्वारा निर्मित विकृतिजन्य परिणाम है । प्राचीनों ने संभवतः इसीलिये इसे 'कृमिज' कहा है । विकृत भाग काला सा तेलिया हो जाता है । जिस वृक्ष में इस प्रकार परिवर्तन हुआ रहता है उन्हें दूर से देखने से ही पता लग जाता है । जहाँ शाखाएं विभक्त होती हैं वहाँ यह अधिक होता है । सिलहट का अगर अच्छा होता है । इसमें के तैलीय अंश के अनुसार इसका रंग हलका या गहरा काला होता है । इसके कोमल काष्ठ के छिद्रों में राल जैसा पदार्थ जमा रहता है । यद्यपि अन्य निघंटुकारों ने इसके कई भेद लिखे हैं तथापि जो अगर देखने में काले रङ्ग का, वजन में भारी, चबाने पर चिपचिपाहट युक्त और पानी में डालने से डूब जाय तथा दियासलाई जला कर लगा देने से जलने लगे वह अगर उत्तम है । इसका स्वाद कड़वा, कसैला तथा तैलिया मालूम होता है । इसमें हलकी मधुर गन्ध होती है जो इसे जलाने पर चारों तरफ फैलती है । सिलहट की तरफ अगर का इत्र बहुत निकाला जाता है । यह निम्न श्रेणी के मुलायम तथा पीताभ श्वेत अगर से निकालते हैं जो करीब ०.७५ से २.५% निकलता है । नोट-भारतवर्ष में प्राचीन काल में अगर का उपयोग सुगन्धि, धूप तथा शीतहर प्रलेप¹ के रूप में किया जा रहा है । अगर तिक्त होते हुए भी उष्ण होता है ।² सुश्रुत इसके तैल को 'दुष्टव्रणशोधन, कृमिकफकुष्ठानिलहर एवं तिक्त, कटु, कषाय मानते हैं (सू० अ० ४५) । सुश्रुत के अनुसार जिसके व्रण में अगर की गन्ध आती हो उस मनुष्य को मुमूर्षु समझना चाहिये (सू० अ० २८) । वाग्भट इसे रसायन मानते हैं । धूप तथा अगरबत्ती बनाने में इसका उपयोग किया जाता है । इसकी छाल से आसाम में कागज भी बनाया करते थे । रासायनिक संगठन-इसमें ईथर में घुलने वाला एक उड़नशील तैल (इत्र) उत्तेजक तथा मद्यसार में घुलने वाली एक राल होती है जो ईथर में नहीं घुलती । मद्यसार में ४८% घुलनशील भाग होता है । गुण और प्रयोग-अगर उष्ण, सुगन्धित, उत्तेजक, वातनाड़ी संस्थान के लिये उत्तेजक, वाजीकर, श्वास एवं कफ हर, वातानुलोमक, शीत प्रशमन, रसायन एवं त्वक् रोगों में लाभदायक है । १. रास्नागुरुणी शीतापनयनप्रलेपनानाम् । (च. सू. अ. २५) २. अर्कगुरुगुडूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते । (च. सू. अ. २६)