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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

कर्पूरादिवर्गः ३८१ १०. अगर हिं०-अगर, काला अगर । बं०-अगर काष्ठ, अगुरु चन्दन । म०, गु०-अगर । पं०-ऊद, ऊदारसी । क०, ता०, ते०-कृष्णागरु । अ०-ऊद खाम । अं०-Eagle-wood (ईगल वुड) । ले०-Aquilaria agallocha Roxb. (एक्विलेरिया एगेलोचा राक्स.) Fam. Thymelaeaceae (थाइमेलिएसी) । यह पूर्व हिमालय, आसाम, भूटान, खासिया पहाड़ एवं सिलहट आदि प्रान्तों में पाया जाता है । इसका वृक्ष-बड़ा, ६०-७० फीट ऊँचा, ५-८ फीट व्यास का धारीदार एवं सदाहरित रहता है । काष्ठ-लकड़ी मुलायम, हलकी, लचीली, श्वेत या हलकी पीताभ श्वेत एवं इसमें कोई विशेष गंध नहीं होती । इसमें वार्षिक वृद्धि के वलय नहीं होते तथा मध्यम या छोटे आकार की ३ से ४ अरीय (Radial) वाहिकाओं (Vessels) की कतारें एवं इनके बीच तन्तुगुच्छों का फ्लोएम (Phloem) रहता है । काष्ठसार अलग नहीं दिखलाई देता । पत्ते-विपरीत, २-४.५ × .८-२ इञ्च बड़े, आयताकार भालाकार या कुछ दीर्घवृत्ताकार, चिकने तथा बहुत छोटे नाल से युक्त होते हैं । पुष्प-श्वेत रंग के गुच्छों में आते हैं । फल-१.५-२ इञ्च लम्बे, अभिअंडाकार एवं मृदु रोमावृत होते हैं । अगर-यह सुगन्धित द्रव्य पुराने वृक्षों के काष्ठ में कहीं-कहीं पाया जाता है । यह एक विशेष प्रकार के फफूँद (Fungi Imperfecti) के द्वारा निर्मित विकृतिजन्य परिणाम है । प्राचीनों ने संभवतः इसीलिये इसे 'कृमिज' कहा है । विकृत भाग काला सा तेलिया हो जाता है । जिस वृक्ष में इस प्रकार परिवर्तन हुआ रहता है उन्हें दूर से देखने से ही पता लग जाता है । जहाँ शाखाएं विभक्त होती हैं वहाँ यह अधिक होता है । सिलहट का अगर अच्छा होता है । इसमें के तैलीय अंश के अनुसार इसका रंग हलका या गहरा काला होता है । इसके कोमल काष्ठ के छिद्रों में राल जैसा पदार्थ जमा रहता है । यद्यपि अन्य निघंटुकारों ने इसके कई भेद लिखे हैं तथापि जो अगर देखने में काले रङ्ग का, वजन में भारी, चबाने पर चिपचिपाहट युक्त और पानी में डालने से डूब जाय तथा दियासलाई जला कर लगा देने से जलने लगे वह अगर उत्तम है । इसका स्वाद कड़वा, कसैला तथा तैलिया मालूम होता है । इसमें हलकी मधुर गन्ध होती है जो इसे जलाने पर चारों तरफ फैलती है । सिलहट की तरफ अगर का इत्र बहुत निकाला जाता है । यह निम्न श्रेणी के मुलायम तथा पीताभ श्वेत अगर से निकालते हैं जो करीब ०.७५ से २.५% निकलता है । नोट-भारतवर्ष में प्राचीन काल में अगर का उपयोग सुगन्धि, धूप तथा शीतहर प्रलेप¹ के रूप में किया जा रहा है । अगर तिक्त होते हुए भी उष्ण होता है ।² सुश्रुत इसके तैल को 'दुष्टव्रणशोधन, कृमिकफकुष्ठानिलहर एवं तिक्त, कटु, कषाय मानते हैं (सू० अ० ४५) । सुश्रुत के अनुसार जिसके व्रण में अगर की गन्ध आती हो उस मनुष्य को मुमूर्षु समझना चाहिये (सू० अ० २८) । वाग्भट इसे रसायन मानते हैं । धूप तथा अगरबत्ती बनाने में इसका उपयोग किया जाता है । इसकी छाल से आसाम में कागज भी बनाया करते थे । रासायनिक संगठन-इसमें ईथर में घुलने वाला एक उड़नशील तैल (इत्र) उत्तेजक तथा मद्यसार में घुलने वाली एक राल होती है जो ईथर में नहीं घुलती । मद्यसार में ४८% घुलनशील भाग होता है । गुण और प्रयोग-अगर उष्ण, सुगन्धित, उत्तेजक, वातनाड़ी संस्थान के लिये उत्तेजक, वाजीकर, श्वास एवं कफ हर, वातानुलोमक, शीत प्रशमन, रसायन एवं त्वक् रोगों में लाभदायक है । १. रास्नागुरुणी शीतापनयनप्रलेपनानाम् । (च. सू. अ. २५) २. अर्कगुरुगुडूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते । (च. सू. अ. २६)

३८२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) वातरक्त तथा आमवात में इसको देते हैं तथा सन्थिशोथ पर लेप भी करते हैं। (२) ज्वर में इसका फांट पिलाने से प्यास कम होती है एवं रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। (३) चक्कर आना, अंगघात तथा अन्य वातविकारों में इसको खिलाते हैं एवं बाह्य लेप भी करते हैं। (४) हिचकी में मधु के साथ इसके चूर्ण को खिलाया जाता है। (५) अग्निमान्द्य, अरुचि, वमन, अतिसार तथा आँव आदि में इसका चूर्ण खिलाया जाता है। (६) अगर एवं ईश्वरमूल को पीस कर शिरःशूल में एवं बच्चों की खाँसी में छाती पर उसका लेप किया जाता है। इससे खुजली एवं दाह कम होने के कारण रक्त त्वचा (Erythema), त्वक् शोथ, विचर्चिका, गजचर्म एवं फोड़े आदि में इसको जल में घिसकर लगाते हैं। वातिक पीड़ा में भी इससे लाभ होता है। इससे जूँ आदि में भी लाभ होता है। (७) अगर का इत्र-१-२ बूँद इत्र पान पर लगाकर खिलाने से तमकश्वास में आराम मिलता है। वाजीकरण के लिये इसके पुराने इत्र को पान के साथ खिलाते हैं। मात्रा-चूर्ण ५-१५ र०; इत्र १-२ बूँद। अथ देवदारु । तस्य नामानि गुणाँश्चाह देवदारु स्मृतं दारुभद्रं दार्विन्द्रदारु च। मस्तदारु द्रुकिलिमं किलिमं सुरभूरुहः ।।२४।। देवदारु लघु स्निग्धं तिक्तोष्णं कटुपाकि च। विबन्धाध्मानशोथामतन्द्राहिक्काज्वरास्रजित् । प्रमेहपीनसश्लेष्मकासकण्डूसमीरनुत् ।।२५।। देवदारु के नाम तथा गुण-देवदारु, दारुभद्र, दारु, इन्द्रदारु, मस्तदारु, द्रुकिलिम, किलिम और सुरभूरुह ये सब देवदारु के संस्कृत नाम हैं। देवदारु-लघु, स्निग्ध, तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, विपाक में कटुरसयुक्त, एवम् विबन्ध, आध्मान, शोथ, आम, तन्द्रा, हिचकी, ज्वर, रक्तदोष, प्रमेह, पीनस, कफ, खाँसी, खुजली तथा वायु को नष्ट करने वाला होता है। [२४-२५] ११. देवदारु हिं०, म० गु०-देवदार। बं०-देवदारु। पहाड़ी-केलोन। ते०-देवदारि चेट्टु। पं०-केलु। ता०-देवदारु चेडि। फा०-देवदार। अं०-Himalayan cedar (हिमालय सिडार); Pinus deodar (पाइनस् देवदार)। ले०-Cedrus deodara (Roxb.) Loud. (सेड्रस् देवदार)। Fam. Pinaceae (पिर्नेसी)। पश्चिमोत्तर हिमालय में कुमाऊँ से पूर्व की ओर यह पाया जाता है। जौनसार और गढ़वाल में ७ से ८ ।। हजार फीट के बीच का भाग देवदारु वृक्षमाला का प्रधान उत्पत्ति स्थान है। इसका वृक्ष-बहुत विशाल, चिरायु, सुन्दर, १६० से १८० फीट तक ऊँचा तथा कहीं-कहीं इससे अधिक ऊँचा होता है। शाखाएँ-दिगन्तसम फैली हुई परन्तु शाखाग्र कुछ नीचे की ओर झुके हुये रहते हैं। पत्ते-त्रिकोण युक्त, सूच्याकार, १-१।। इञ्च लम्बे, लम्बी टहनियों पर एकाकी और पेचदार क्रम से निकले हुये और छोटी टहनियों पर गुच्छों में निकले हुये रहते हैं। फल-शाखाग्रों पर, एकाकी, ४-५ इञ्च लम्बे और ३-४ इञ्च मोटे होते हैं। बीज-१/२ इञ्च तक लम्बे, त्रिकोणाकार या अर्धचन्द्राकार और पक्ष युक्त होते हैं। बीजपत्र-लगभग १० होते हैं। देवदार की सुगन्ध युक्त लकड़ी (काष्ठसार) पीताभ बादामी रंग की तथा तैल से भरी होती है। लकड़ी को जलाकर एक तैल निकालते हैं जिसे केलोन का तेल कहा जाता है। यह तैल बहुत पतला होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३८३ औषध में काष्ठसार, तैल, पत्र एवं कोमल शाखाओं का व्यवहार किया जाता है। दक्षिण तथा गुजरात की तरफ देवदार नाम से सरल (चीड़ की) की लकड़ी बिकती है। नोट-चरक एवं सुश्रुत में इसका अनेक रोगों में उपयोग किया गया है। रासायनिक संगठन-इसमें केलोन का तैल नामक एक तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-देवदार स्वेदजनन, मूत्रजनन, वातानुलोमक, वात-कफहर एवं त्वग्दोषहर है। इसका तैल टर्पेण्टाइन के समान गुण वाला होता है लेकिन उससे यह कुछ न्यून गुण वाला है। देवदार का प्रयोग ज्वर, जीर्ण आमवात, शिरःशूल, श्लीपद, जलोदर, कास, श्वास, अतिसार, वातिक विकार, शोथ, अश्मरी तथा व्रण में किया जाता है। इसके तैल का प्रयोग कुष्ठ, कफ, कास एवं त्वचा के रोगों में किया जाता है। (१) ज्वर में इसको देने से काफी पसीना निकलता है तथा मूत्र की मात्रा भी बढ़ती है। ज्वर चाहे शोथ से हो या कफजन्य हो इसके प्रयोग से शोथ कम होता है तथा कफ की दुर्गंध दूर होकर कफ कम होता है। (२) जलोदर में देवदार, सहेजन की छाल तथा अपामार्ग प्रत्येक १/२ तो० गोमूत्र में पीसकर देने से मूत्र द्वारा जल निकल जाता है तथा रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। (३) सोजाक, फिरंग, वातरक्त एवं आमवात में देवदार्यादि क्वाथ का रसायन के रूप में प्रयोग करते हैं। (४) श्लीपद में इसको सरसों के तैल के साथ खिलाते हैं तथा चित्रक के साथ गोमूत्र में पीस कर लगाते हैं। (५) वातिक हृद्रोग में देवदार एवं सोंठ को पीसकर पिलाने से हृदय की धड़कन तथा शूल आदि दूर होते हैं। (६) हिक्का तथा श्वास में इसका क्वाथ पीने से लाभ होता है। (७) शिरःशूल में इसे जल में घिसकर कपाल पर लगाते हैं। पुराने शोथ पर हल्दी एवं गुग्गुलु के साथ इसका लेप किया जाता है। (८) इसका तैल-कुष्ठ में बहुत लाभदायक माना जाता है। इसको ,अधिक मात्रा में देना पड़ता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसको खिलाते हैं तथा बाह्य लगाते भी हैं। इससे पुराने तथा दुर्गन्ध युक्त व्रण अच्छे हो जाते हैं। कर्णशूल में इसका तैल डालने से आराम मिलता है। कफज कास में त्रिकटु एवं यवक्षार के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण ३-६ माशा; तेल १०-४० बूँद। अथ सरलः (धूप) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह सरलः पीतवृक्षः स्यात्तथा सुरभिदारुकः। सरलो मधुरस्तिक्तो कटुपाकरसो लघुः ।।२६।। स्निग्धोष्णः कर्णकण्ठाक्षिरोगक्षोहरः स्मृतः। कफानिलस्वेददाहकासमूर्च्छाव्रणापहः ।।२७।। सरल (धूप) अर्थात् चीड़के नाम तथा गुण-सरल, पीतवृक्ष और सुरभिदायक ये सब संस्कृत नाम चीड़ के हैं। चीड़-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, लघु, स्निग्ध तथा उष्ण वीर्य होता है एवम् कर्ण, कण्ठ तथा नेत्र सम्बन्धी रोग, रक्षोग्रह, कफ, वायु, स्वेद (पसीना), दाह, खाँसी, मूर्च्छा तथा व्रण को दूर करने वाला होता है। [२६-२७] १२. धूप सरल हिं०-धूप सरल, चिर, चीढ़, चीड़। बं०-सरलगाछ, तार्पीन तैलेर गाछ। म०-सरल। गु०-सरल देवदार, तेलियो देवदार। ता०-शिरसाल। नेपा०-धूप सलसी। अ०-शज्रतुल बक, सनोवर हिन्दी। फा०-दरख्ते वसक।

भावप्रकाशनिघण्टुः ३८४ अं०-Long-leaved Pine (लांग लीह्वड पाइन); Chir Pine (चीर पाइन)। ले०-Pinus longifolia Roxb. (पाइनस् लांगिफोलिया रॉक्स.)। Fam. Pinaceae (पिर्नेसी)। इसके वृक्ष हिमालय में अफगानिस्तान से लेकर काश्मीर, पञ्जाब, उत्तर प्रदेश, भूटान तथा आसाम एवं वर्मा में २०००-६००० फीट की ऊँचाई तक प्रायः समूहबद्ध होकर उगे हुए पाये जाते हैं। इसकी ४, ५ जातियाँ भारतवर्ष में पाई जाती है जिनमें से पा० एक्सेलसा वाल. (P. excelsa Wall.) तथा पा० खास्या रायली (P. khasya Royle) मुख्य हैं। चीड़ के प्रकाशप्रिय विशाल वृक्ष बहुत सीधे (सरल) तथा १००-१५० फीट ऊँचे होते हैं। स्तम्भ-सीधा, गोल एवं घेरा ५-७ फीट या १२ फीट तक होता है। छाल-खुरदरी, ऊँची-नीची, गढ़ेदार एवं १-२ इञ्च मोटी होती है। काष्ठ-स्निग्ध तथा तीक्ष्णगन्धी होता है। पत्ते-छोटी-छोटी टहनियों के अन्त में ९-१२ इञ्च लम्बे, पतले कुछ-कुछ त्रिकोणयुक्त, हलके हरे रंग के एवं तीन-तीन के समूह में पाये जाते हैं। माघ से चैत्र तक फूलों के गुच्छे लगते हैं। एक वर्ष के उपरान्त में इसके फल या डोडे पकते हैं। नरमञ्जरी प्रायः १/२ इञ्च लम्बी और सामूहिक शंक्वाकार फल (Cone) एकाकी अथवा ३-५ तक एक साथ रहते हैं जिनमें प्रत्येक ४-८ इञ्च लम्बा और ३.५ इञ्च मोटा लट्वाकार होता है। बीजवाहक पत्रों का अग्र मुढ़ा हुआ, मोटा, प्रायः एक तीक्ष्ण काले नोक और पृष्ठ पर ४.५ कोणों से युक्त होता है। चैत्र-वैशाख में फल फट जाते हैं जिनमें से बीज निकलते हैं तथा फल वृक्ष पर ही लगे रहते हैं। बीज १/२ इञ्च से कुछ कम लम्बा, चिपटा, पंखयुक्त (पंख बीज से बड़ा और पतला) और ऊपर से मालाकार होता है। पा० एक्सेलसा (चील या कैल) नामक इसकी उपजाति ६-१० हजार फीट के बीच उत्तरप्रदेश एवं पञ्जाब में पाई जाती है। इसके पत्ते नीलहरित और ५-६ तक प्रतिगुच्छे में होते हैं। सामूहिक फल लम्बगोल होते हैं और बीजवाहक पत्रों के अग्र बहुत मोटे नहीं होते। रासायनिक संगठन-इसके बहिःकाष्ठ (Sapwood) से सहज अथवा क्षत करने से एक प्रकार का तेलिया निर्यास निकल कर जम जाता है जिसे गन्धाबिरोजा कहते हैं। पहले यह सफेद कुछ पतला और गाढ़ा होता है। इसके बाद उत्तरोत्तर अधिक गाढ़ा एवं पीला फिर गहरा पीला हो जाता है। यह चिपचिपा, मुलायम तथा उग्रगन्धयुक्त होता है। पा० एक्सेलसा में निर्यास कम निकलता है पर अधिक अच्छा होता है। गन्धाबिरोजा को बिना जल के ऊर्ध्वनलिका यन्त्र में गरम करके एक गाढ़ा तथा लाल रंग का तैल निकालते हैं जिसे खन्नुतेल या (पं०) सतविरोजा कहते हैं। इसमें गन्धाविरोज़ा की गन्ध रहती है। बिरोजा का आभ्यन्तरिक प्रयोग करने के लिये निम्नलिखित विधि से शुद्ध किये हुये बिरोजे का व्यवहार करना चाहिये। समभाग दूध और जल भरे हुए पात्र पर कपड़ा बाँध, उस पर गन्धाबिरोजा डाल कर नीचे आँच देते हैं, जिससे बिरोजा कपड़े से टपक कर नीचे के पात्र में जम जाता है। इसको निकाल कर सुखा कर रख लें। गन्धाबिरोजा को वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र द्वारा गरम करने से एक रंगहीन तैल प्राप्त होता है जिसे तारपीन का तेल (Turpentine oil) कहते हैं। ५६ पौंड गन्धाबिरोजा से ८ पौंड तैल निकलता है। तैल निकालने के बाद जो अवशेष रह जाता है उसे डाक्टरी में रेजिन या कोलोफोनि (Resin, Colophony) कहा जाता है। इसे छान कर उबलते हुये जल के साथ कढ़ाई में डाल कर घोटते हैं। जिससे एक काला सा मधु के समान गाढ़ा पदार्थ तैयार होता है जिसे गन्धाबिरोजा का डामर कहते हैं। यह यूरोपीय बरगंडी पिच के समान होता है। यहाँ पर सरल (चीड़) वृक्ष के गुण और प्रयोग दिये जा रहे हैं। आगे 'सरलनिर्यास' के अन्तर्गत गन्धाबिरोजा तथा तारपीन के तैल आदि के गुण और प्रयोग दिये गये हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, दुर्गन्धहर, उत्तेजक, दीपन, वातानुलोमक, स्वेदल, मूत्रल, प्रतिदूषक एवं कफहर है।

कर्पूरादिवर्गः ३८५ इसका आन्तरिक उपयोग अन्य औषधों के साथ क्वाथ के रूप में दाह, कास, मूर्च्छा, आध्मान, अङ्गघात आदि वातिक व्याधियाँ, अश्मरी, कफज्वर, कृमि, श्लेष्मातिसार एवं वातज हिक्का में किया जाता है। इसका लेप व्रण, शोथ, कंठमाला, जन्तुओं के दंश, त्वचा के अनेक विकार एवं वातव्याधियों में किया जाता है। व्रण में इसकी छाल का धुआँ दिया जाता है। इसकी लकड़ी को कपड़ा लपेट कर तथा घृत में डुबोकर जलाते हैं तथा जो तेल टपकता है उसे कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है। व्रणरोपण तैलों में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-३ माशा। अथ तगरं पिण्डतगरं च तयोर्नामानि गुणाँश्चाह कालानुसार्यं तगरं कुटिलं नहुषं नतम्। अपरं पिण्डतगरं दण्डहस्ती च बर्हिणम्॥२८॥ तगरद्वयमुष्णं स्यात्स्वादु स्निग्धं लघु स्मृतम्। विषापस्मारशूलाक्षिरोगदोषत्रयापहम् ॥२९॥ तगर तथा पिण्ड तगर के भेद एवं दोनों के नाम और गुण-तगर दो प्रकार का होता है उसमें प्रथम प्रकार के तगर के-कालानुसार्य, तगर, कुटिल, नहुष और नत ये सब संस्कृत नाम हैं। दूसरे प्रकार के तगर के-पिण्डतगर, दण्डहस्ती और बर्हिण ये सब संस्कृत नाम हैं। दोनों प्रकार के तगर-उष्णवीर्य स्वादिष्ट, स्निग्ध तथा लघु होते हैं। यह विष, अपस्मार (मिर्गीरोग), शूल, नेत्ररोग तथा त्रिदोष को दूर करने वाले होते हैं। [२८-२९] १३. तगर हिं०-तगर, सुगन्ध वाला, मुश्क वाला। बं०-तगर पादुका, शुमियो, असारून। म०-तगर गण्ठोडा, तगरमूल। गु०-तगर गण्ठोडा। फा०-असारून। उर्दू-रिशवाल। पं०-बालमुदक, मुश्कवली। अं०-Indian Valerian Rhizome (इण्डियन वेलेरियन हाइमोम)। ले०-Valeriana wallichii DC. (बॅलेरिआना वालिशिआइ)। Fam. Valerianaceae (वॅलेरिॲनेसी)। तगर क्या है इसके सम्बन्ध में पहले मतभेद था। कुछ लोग श्वेत पुष्पवाले एक छोटे वृक्ष टेबर्नी मोण्टॅना कोरोनेरिया (Tabernae montana coronaria B. Br.), हिं०-चाँदनी के मूल को तगर मानते थे। कहीं-कहीं श्यामवर्ण की चंदन जैसी वजनदार लकड़ी बिकती है। बंगाल में कोई जल में उत्पन्न होने वाली घास तथा पंजाब में कोई पीले काष्ठ आदि का व्यवहार किया जाता रहा। लेकिन अब निर्विवाद रूप से यह सिद्ध हो गया है कि ऊपर लिखे हुये वेलेरिआना वालिशिआइ का मूलस्तम्भ (मूल) ही तगर है। बाजार में यह 'सुगन्ध वाला' के नाम से बिकता है तथा इसे वैद्य 'बालकम् या हीबेर' के स्थान पर प्रयोग करते रहे हैं। वास्तव में यह सुगन्धवाला नहीं है। बालक या हीबेर (सुगन्धवाला) का स्वतन्त्र वर्णन आगे दिया हुआ है। बाजार में 'तगर' नाम से जो द्रव्य बिकता है वह कोई निर्गन्ध काष्ठ है और किसी सुगन्धित द्रव्य के साथ रख कर गन्धयुक्त बना दिया जाता है। भारतीय तगर-पाश्चात्य चिकित्सा में व्यवहार में लाये जाने वाले विदेशी वॅलेरियन, वॅलेरिआना ऑफिसिनॅलिस् लिन. (Valeriana offcinalis Linn.) के स्थान में उत्तम प्रतिनिधि माना जाता है। यद्यपि भारतीय तगर अपने यहाँ पर्याप्त होता है तथापि व्यापारी तगर अधिकतर अफगानिस्तान से निर्यात किया हुआ रहता है। भारत में विदेशी तगर (वे० ऑफिसिनॅलिस) बहुत थोड़ी मात्रा में काश्मीर के उत्तर में सोनमर्ग स्थान पर ८ से ९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसकी अन्य उपजाति वे० हार्डविकाइ वाल. (V. hardwickii Wall.) भी वे० वालिचिआइ के साथ पाई जाती है। बाजार में इस तगर को सुगन्धवाला एवं असारून नाम से लोग बेचते हैं। श्री ठा० दलजीतसिंहजी द्वारा लिखित यूनानी द्रव्यगुण विज्ञान में असारुन का ले० नाम असारूम् यूरोपियम् लिन., एरिस्टोलोकिएसी (Asarum europaeum Linn.; Fam. Aristolochiaceae) लिखा हुआ है। स्वरूपादि का वर्णन भी उसी का (अ० २८ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३८६ भावप्रकाशनिघण्टुः यूरोपियम्) मालूम पड़ता है लेकिन गुण धर्म जो लिखे हैं वे तगर (वेलेरियन) से मिलते लिखे हैं। इन्होंने इसका एक प्रतिनिधि भारतीय भेद माना है जिसको 'तुग्गुर' नाम दिया है। डॉ० देसाई ने तगर (वेलेरिआना वालिचिआइ) एवं असरून (अ० यूरोपियम्) का अलग-अलग वर्णन किया है तथा दोनों के गुण धर्म भी अलग लिखे हैं। डॉ० देसाई ने असरून को वामक, शिरोविरेचक, स्वेदजनन, कफघ्न, संर्सा एवं शोथघ्न लिखा है जो तगर से भिन्न हैं। इसके परिचय में लिखा है कि असरून की जड़ में मिरिच जैसी गन्ध तथा स्वाद कटु (तीता) होता है तथा इसके पंञ्चाग के चूर्ण को सूँघने से छींक आती है। तगर का स्वाद कड़वा एवं गन्ध अलग प्रकार की होती है। डॉ० चोपड़ा भी डॉ० देसाई के मत से सहमत हैं। डॉ० देसाई ने यह स्पष्ट लिखा है कि असरून के समान ही दिखलाई देने वाली लेकिन गुणों में भिन्न एक दूसरी वनस्पति है जिसको तुग्गुर कहते हैं तथा उसका लोग असरून के स्थान पर व्यवहार करते हैं। इस दृष्टि से बाजार में सुगन्धवाला के नाम से बिकने वाला द्रव्य असली तगर (वेलेरिअन) है एवं इसे असरून नाम देना या असरून के स्थान पर प्रयोग करना उचित नहीं है। असरून अलग द्रव्य है। इसी प्रकार सुगन्धवाला भी अलग द्रव्य है। बाजार में तगर नाम से बिकने वाले कृष्ण वर्ण के काष्ठ चूर्ण आदि को भी तगर नहीं मानना चाहिये। इसके क्षुप-हिमालय पहाड़ के साधारण भाग में काश्मीर से भूटान तक ४ से १२ हजार फीट की ऊँचाई पर तथा खासिया के पहाड़ों पर ४ से ६ हजार फीट की ऊँचाई पर बहुत पाये जाते हैं। इसका क्षुप (Herb)-किंचित् रोमश एवं बहुवर्षायु होता है। मूलस्तम्भ-मोटा, अधोगामी मोटे तन्तुओं से युक्त एवं जमीन में दिगन्तसम फैला रहता है। काण्ड-१५.४५ से० मी० ऊँचे एवं प्रायः गुच्छेदार होते हैं। पत्ते-आधारीय पत्र प्रायः २।।-७।। से० मी० व्यास में, लम्बे नाल से युक्त, लट्वाकार, आधार पर गहरे ताम्बूलाकार, तीक्ष्णाग्र तथा धारयुक्त दन्तुर या लहरदार होते हैं। काण्डपत्र संख्या में थोड़े, बहुत छोटे एवं अखंड या खंडित होते हैं। फूल-श्वेत रंग के या कुछ-कुछ गुलाबी होते हैं और समशिख क्रम से शाखाओं पर पाये जाते हैं। ये प्रायः एकलिंगी होते हैं तथा पुंपुष्प एवं स्त्रीपुष्प अलग-अलग क्षुपों पर होते हैं। वृत्तपत्रक (Bracteoles)-फल के इतने लम्बे, आयताकार- रेखाकार होते हैं। बाह्यकोश-पुष्पित होते समय बाह्यदल के खंड क्वचित् व्यक्त लेकिन बाद में करीब १२, रेखाकार, रोमयुक्त खण्डों में दिखलाई देते हैं। आभ्यन्तर कोश-यह कुप्पी के आकार का, पाँच खण्डों से युक्त तथा फैला हुआ होता है। पुंकेशर-संख्या में ३ होते हैं। स्त्रीकेशरी-कुक्षिवृन्त पतला, अविभाजित तथा कुक्षि अग्र में स्थित रहती है। अंडाशय-३ गहरों वाला होता है। फल-रोमश या करीब-करीब रोमहीन होते हैं। इसके मूल तथा मूलस्तम्भ का व्यवहार औषध में किया जाता है। मूलस्तम्भ के अत्यन्त गाँठदार, टेढ़े-मेढ़े, खुरदरे, हलके पीताभ बादामी (Dull yellowish-brown) रंग के, ४-८ से० मी० लम्बे तथा ५-१० मि० मी० मोटे टुकड़े होते हैं। यह कुछ चिपटे से होते हैं। इनके ऊपरी पृष्ठ पर अनेक टूटे हुये पत्तों के निशान तथा अधोपृष्ठ पर टूटे हुए मूल के निशान रहते हैं तथा अधोपृष्ठ से कुछ मोटे मूल निकले हुये रहते हैं। इसका भग्न-छोटा तथा कंटकित होता है। इसका स्पष्ट अनुप्रस्थ (Trausverse) विच्छेद करके देखने से गहरे रंग का बाह्यक (Cortex), मज्जक (Pith), एधा (Cambium) की स्पष्ट रेखा एवं चौड़े मज्जक किरणों (Medullary rays) से पृथक् किये हुये १२-१५ छोटे हलके रंग के दारूपूलों (Xylem bundles) का वर्तुल आदि भाग दिखलाई देते हैं। इसके मूल बहुत से, ६-७ मि० मी० लम्बे एवं १-२ मि० मी० मोटे या कभी-कभी नहीं भी रहते। इसके अन्दर का भाग हलके वर्ण का काष्ठमय एवं छाल गहरे रंग की होती है। तगर में एक विशिष्ट उग्र गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कड़वा होता है। रासायनिक संगठन-भारतीय वेलेरियन (तगर) में एक उड़नशील तैल ०.५-२.१२% पाया जाता है। वसन्त ऋतु में संगृहीत ताजे मूल में इसकी अधिकतम मात्रा होती है। इस तैल में प्रधानतया सेस्क्व्टपैन्‌स (Sesquiterpenes),

कर्पूरादिवर्गः ३८७ वेलेरिक् एसिड (Valeric acid) एवं टर्पेन अल्कोहोल (Terpene alcohols) स्वतन्त्र या ईस्टर के रूप में संयुक्त अवस्था में पाये जाते हैं। इस तैल के अतिरिक्त इसमें ॲराचिडिक् एसिड (Arachidic acid), हेण्ट्रियाकोण्टेन (Hentriacontane) तथा स्नेहीय अम्लों के मिश्रण रहते हैं। ताजे मूल में जल में घुलनशील कार्यकारी पदार्थ अल्प मात्रा में पाये जाते हैं। **गुण और प्रयोग-**यह वातहर, उद्वेष्टिननिरोधी, रक्ताभिसरण एवं वातनाड़ी तन्तुओं के लिये उत्तेजक, चेतनाकारक, स्वापजनक, वातानुलोमक, केन्द्रीय वातनाड़ीसंस्थान के लिये अवसादक एवं स्थानिक वेदनास्थापक तथा व्रणरोपक है। अल्प मात्रा में देने से अन्य सुगन्धित तैलों की तरह इससे आमाशयोर्ध्वप्रदेश में उष्णता मालूम होती है, नाड़ी की गति बढ़ती है तथा कुछ मानसिक उत्तेजना होती है। इससे सांवेदनिक नाड़ियों के अग्र में बधिरता उत्पन्न होती है। अधिक मात्रा में इसको देने से चक्कर आने लगते हैं, हिचकी आती है, वमन होता है एवं हृदयावसाद होता है। (१) अपतन्त्रक, अतत्त्वाभिनिवेश (Hypochondriasis-हाइपोकॉण्ड्रियासिस्), अशान्ति तथा इसी प्रकार की मानसिक व्यथाओं में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इसके साथ यशदभस्म का उपयोग भी किया जाता है। इसका यह प्रभाव संभवतः इसके अरुचिकारक स्वाद एवं उग्र गन्ध के कारण होता है। कंपवात में भी कभी-कभी इसका उपयोग किया जाता है। (२) जीर्ण ज्वर के कारण जब हृदय तथा सम्पूर्ण शरीर में शिथिलता आई रहती है तथा त्रिदोष की तीव्रता रहती है तब इसके देने से हृदय को बल मिलता है एवं प्रलाप, अस्वस्थता आदि दूर होकर रोगी को चेतना आती है। बेहोशी एवं हृदय की धड़कन में इसका तैल २-५ बूँद की मात्रा में गोंद के साथ मिलाकर दालचीनी के फांट के साथ देते हैं। (३) यह वातानुलोमक होने के कारण आध्मान आदि में इससे लाभ होता है। (४) कुकास, तमकश्वास, जीर्णविबन्ध, पीड़ायुक्त व्रण, घाव, अस्थिभग्न एवं तीव्र आमवात में शोथयुक्त संधिशूल कम करने के लिये इसके फांट का उपयोग करते हैं। (५) वातनाड़ी संस्थान के रोगों के कारण उत्पन्न मधुमेह तथा बहुमूत्र में इसके साथ सूक्ष्म मात्रा में अफीम का प्रयोग किया जाता है। (६) विषम ज्वर में मनैःशिला, यशदभस्म, तगर, भांग या अफीम को पान के रस के साथ गोली बनाकर देते हैं जिससे ज्वर के कारण उत्पन्न मानसिक तथा शारीरिक थकावट कम होती है। शीत ज्वर में पारी न आकर केवल शिरःशूल या उदरशूल हो तो तगर एवं यशदभस्म को देते हैं। **मात्रा-**चूर्ण २-८ र०। अथ पद्मकम्। तस्य नामानि गुणाँश्चाह पद्मकं पद्मगन्धि स्यात्तथा पद्माह्वयं स्मृतम्। पद्मकं तुवरं तिक्तं शीतलं वातलं लघु ॥३०॥ वीसर्पदाहविस्फोटकुष्ठश्लेष्मास्रपित्तनुत् । गर्भसंस्थापनं रुच्यं¹ वमिव्रणतृषाप्रणुत् ॥३१॥ **पद्माख के नाम तथा गुण-**पद्मक, पद्मगन्धि तथा पद्माह्वय (कमल के पर्याय वाचक समस्त शब्द) ये सब पद्माख के संस्कृत नाम हैं। **पद्माख-**कषाय तथा तिक्तरस युक्त, शीतवीर्य, वातजनक तथा लघु होता है एवं विसर्प, दाह, विस्फोट, कुष्ठ, कफ और रक्तपित्त को दूर करता है। यह गर्भ का स्थापन करने वाला, रुचिकारक एवं वमन, व्रण तथा तृषा को दूर करने वाला होता है। [३०-३१] १. 'वृष्यमिति' पाठा०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३८८ भावप्रकाशनिघण्टुः १४. पद्माख हिं०-पद्माक, पद्माख, पदुम काठ, फाजा । बं०-पद्म काष्ठ । म०-पद्म काष्ठ, पद्मक । गु०-पद्मकनुं लाकडुं, पद्मकाष्ठ । क०-पद्मक । पं०-चभिअरी । लिपचा०-कोंगकी । अं०-Mild Himalaya Cherry (माइल्ड हिमालय चेरी) । ले०-Prunus puddum Roxb. ex Wall. (प्रूनस् पड्डुम्, राक्सज्) । Fam. Rosaceae (रोज़ॅसी) । यह गरम हिमालय में शिमला, गढ़वाल से सिक्किम और भूटान तक एवं दक्षिण में कुडाईकनाल और उटकमंड में पाया जाता है । इसका वृक्ष मध्यमाकार का अचिरस्थायी होता है । छाल-फीके भूरे रंग की या कालापन युक्त भूरे रंग की और चमकीली होती है । इससे पतली चमकीली पपड़ियाँ छूटती रहती हैं । काष्ठसार रक्ताभ तथा सुगन्ध युक्त होता है । पत्ते- ३-५ इञ्च लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, भालाकार लट्वाकार, लम्बे नोकवाले, चिकने और दोहरे दाँतों वाले होते हैं । फूल- सफेद गुलाबी या लाल रंग के आते हैं और पतझड़ के बाद नवीन पत्ते निकलने के पहले ही खिल जाते हैं । फल- छोटे-छोटे गोलाकार या अंडाकार होते हैं और वे पीले या गुलाबी रंग के दिखाई पड़ते हैं । इन फलों की लोग खाते हैं तथा इनसे एक प्रकार का मद्य बनाते हैं । बाजार में पद्मकाष्ठ के कांड के टुकड़े बिकते हैं । ये वजन में भारी तथा इनके छाल का वर्ण कृष्ण-रक्त रहता है । छाल पर आड़ी खाँचें रहती हैं । इसे हाथ से रगड़ने से आह्लादकारक तथा मृदु सुगन्ध आती है । इनके भीतर का भाग रक्तपीताभ श्वेतवर्ण का होता है । पद्मकाष्ठ हमेशा नया काम में लाना चाहिये क्योंकि कालान्तर से उसका औषधधर्म नष्ट हो जाता है । पद्माख का क्वाथ बनाकर प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि इसे उबालने से इसका सत्व उड़ जाता है । इसका हमेशा गुनगुने जल में फांट बनाकर प्रयोग करना चाहिये । रासायनिक संगठन-इसकी छाल में एक अत्यन्त विषैला द्रव्य हाइड्रोसायेनिक एसिड् (Hydrocyanic acid) तथा ॲमिग्डॅलिन् (Amygdalin) इत्यादि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-पद्माख शीतल, रक्तस्तम्भक, तिक्तपौष्टिक, छर्दिनिग्रहण, स्तम्भन, वेदनास्थापक, वर्ण्य, गर्भस्थैर्यकर एवं ज्वरहर है । इसका वेदनाहर गुण इसके विषैले सत्व में है तथा स्तम्भन एवं तिक्तपौष्टिक गुण काष्ठ में है । इसके विषैले सत्व की क्रिया सम्पूर्ण शरीर पर एवं विशेषकर जीवनीय केन्द्र स्थान पर शामक रूप में होती है । (१) अपचन के कारण आमाशय को श्लेष्मल त्वचा में शोथ होकर वमन एवं अतिसार होने पर तथा आमाशय के व्रण में इसको दिया जाता है । इससे व्रण की वेदना कम होती है तथा स्तम्भन गुण के कारण अतिसार तथा वमन में लाभ होता है । इसके फांट से भी वमन तथा हल्लास में लाभ होता है । (२) श्वसनकेन्द्र के ऊपर इसके शामक प्रभाव के कारण शुष्क कास एवं क्षयज प्रस्वेद कम हो जाता है । हिक्का एवं श्वास में इसको मधु के साथ चटाते हैं । (३) हृदय के केन्द्रस्थान के शमन के कारण हृदय की धड़कन तथा हृदय के वामपटल रोग से रक्त का पीछे बहना (Mitral regurgitation) एवं हृदय पर मेद संचित होकर एक प्रकार की जो खाँसी होती है उसमें यह गुणकारक है । (४) रक्तपित्त में चन्दन, शर्करा एवं तंडुल जल के साथ इसको देते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः . ३८९ (५) गर्भपात रोकने के लिये इसे जल में घिस कर पिलाते हैं। चरक एवं सुश्रुत ने इसे गर्भस्थैर्यकर नहीं माना है। (६) जननेन्द्रिय की शुष्क कण्डू में इसे शीतल जल में घिसकर लगाते हैं। शुष्क कण्डू युक्त त्वचा के रोगों में इसके लेप से त्वचा शुद्ध होकर कान्ति बढ़ती है। मात्रा—५-१५ र०। इसमें तीव्र विषैला द्रव्य होने के कारण भली प्रकार विचार करके इसका प्रयोग करें। अथ गुग्गुलु । तस्य नामान्याह गुग्गुलुर्देवधूपश्च जटायुः कौशिकः पुरः । कुम्भोलूखलकं क्लीवे महिषाक्षः पलङ्कषः ।। ३२ ।। गूगल के नाम—गुग्गुलु, देवधूप, जटायु, कौशिक, पुर, कुम्भोलूखलक (नपुंसकलिङ्ग), महिषाक्ष और पलङ्कष ये सब गूगल के संस्कृत नाम हैं। [३२] गुग्गुलुभेदानाह महिषाक्षो महानीलः कुमुदः पद्म इत्यपि । हिरण्यः पञ्चमो ज्ञेयो गुग्गुलोः पञ्च जातयः ।। ३३ ।। गूगल के भेद—(१) महिषाक्ष, (२) महानील, (३) कुमुद, (४) पद्म, (५) हिरण्य इस प्रकार से गूगल के पाँच भेद जानना चाहिये। [३३] तेषां लक्षणानि गुणाँश्चाह भृङ्गाञ्जनसवर्णस्तु महिषाक्ष इति स्मृतः । महानीलस्तु विज्ञेयः स्वनामसमलक्षणः ।। ३४ ।। कुमुदः कुमुदाभः स्यात्पद्मो माणिक्यसन्निभः । हिरण्याख्यस्तु¹ हेमाभः पञ्चानांलिङ्गमीरितम् ।। ३५ ।। महिषाक्षो महानीलो गजेन्द्राणां हितावुभौ । हयानां कुमुदः पद्मः स्वस्त्यारोग्यकरौ परौ ।। ३६ ।। विशेषेण मनुष्याणां कनकः परिकीर्त्तितः । कदाचिन्महिषाक्षश्च मतः कैश्चिन्नृणामपि ।। ३७ ।। क्रम से उन्हीं ५ प्रकार के गूलों के लक्षण एवं गुण—(१) जो गूगल भौंरा या स्रोतोंजन के समान काले रङ्ग का होता है वह 'महिषाक्ष' कहलाता है। (२) महानील नामक गूगल का लक्षण अपने नाम के अनुरूप ही है अर्थात् वह अत्यन्त नीलवर्ण का होता है। (३) कुमुद नामक गूगल—कुमुद (कुई) पुष्प के समान वर्ण वाला होता है। (४) पद्म नामक गूगल—मानिक के समान वर्ण वाला होता है। (५) हिरण्याख्य गूगल—सोने के समान वर्ण वाला होता है। इनमें से महिषाक्ष तथा महानील ये दोनों गूगल हाथियों के लिये हितकारी होते हैं। कुमुद तथा पद्म ये दोनों गूगल घोड़ों के लिये अत्यन्त कल्याणकारक तथा आरोग्यदायक होते हैं। कनक अर्थात् हिरण्यनामक गूगल तो विशेष करके मनुष्यों के लिये हितकर होता है। कोई-कोई ऐसा भी कहते हैं कि मनुष्य के लिये कहीं-कहीं महिषाक्ष गूगल भी हितकारी होता है। [३४-३७] सामान्यतो गुग्गुलुगुणानाह गुग्गुलुर्विशदस्तिक्तो वीर्योष्णः पित्तलः सरः । कषायः कटुकः पाके कटू रूक्षो लघुः परः ।। ३८ ।। भग्नसन्धानकृद् वृष्यः सूक्ष्मः स्वर्यो रसायनः । दीपनः पिच्छिलो बल्यः कफवातव्रणापचीः ।। ३९ ।। मेदोमेहाश्मवातांश्च क्लेदकुष्ठाममारुतान् । पिडकाग्रन्थिशोफार्शोगण्डमालाकृमीञ्जयेत् ।। ४० ।। माधुर्याच्छमयेद्वातं कषायत्वाच्च पित्तहा । तिक्तत्वाद् कफजित्तेन गुग्गुलुः सर्वदोषहा ।। ४१ ।। १. 'हिरण्याक्षस्तु' इति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३९० भावप्रकाशनिघण्टुः सामान्यरूप से गूगल के गुण-गूगल-विशद गुण युक्त, तिक्त-कषाय तथा कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, पित्तजनक, सारक (दस्तावार), विपाक में कटुरस युक्त, रूक्ष एवं अत्यन्त लघु होता है। यह टूटे हुये हड्डियों को जोड़ने वाला, वृष्य, सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतोगामी), स्वर को उत्तम करने वाला, रसायन, अग्निदीपक, पिच्छिलगुणयुक्त तथा बलकारक होता है एवम्-कफवात, व्रण, अपची, मेदरोग, प्रमेह, पथरी, वातरोग, क्लेद, कुष्ठ, आमवात, पिडका, ग्रन्थिरोग, शोथ, बवासीर, गण्डमाला तथा कृमिरोग का नाशक होता है। गूगल-मधुर रस युक्त होने से वात को, कषाय रसयुक्त होने से पित्त को और तिक्त रस युक्त होने से कफ को नष्ट करने वाला होता है, अतः यह सम्पूर्ण दोषों का नाशक कहा हुआ है। [३८-४१] नवीनस्य प्राचीनस्य च गुग्गुलोर्लक्षणं गुणाँश्चाह स नवो बृंहणो वृष्यः पुराणस्त्वतिलेखनः ।।४२।।। स्निग्धः काञ्चनसंकाशः पक्वजम्बूफलोपमः । नूतनो गुग्गुलुः प्रोक्त सुगन्धिर्यस्तु पिच्छिलः ।।४३।। शुष्को दुर्गन्धकश्चैव व्यक्तप्रकृतिवर्णकः । पुराणः स तु विज्ञेयो गुग्गुलुर्वीर्यवर्जितः ।।४४।। नवीन और पुराने गूगल के गुण तथा लक्षण-नवीन गूगल-बृंहण (धातुवर्धक) तथा वृष्य (वीर्यजनक) होता हैं और पुराना गूगल-अतिलेखन (शरीर के धातु तथा मलों को सुखा कर खुरचने वाला) होता है। नवीन गूगल वह कहलाता है जो स्निग्ध, सोने के समान वर्ण वाला, पके हुये जामुन के समान स्वरूप वाला, सुगन्ध युक्त तथा पिच्छिल गुण युक्त होता है। पुराना गूगल-वह कहलाता है कि जो शुष्क, दुर्गन्धयुक्त, स्वाभाविक वर्ण हीन तथा वीर्य रहित होता है। [४२-४४] गुग्गुलुसेविनां त्याज्यान्याह अम्लं तीक्ष्णमजीर्णञ्च व्यवायं श्रममातपम् । मद्यं रोषं त्यजेत्सम्यग् गुणार्थी पुरसेवकः ।।४५।। गूगल सेवन करने वालों के लिये अहितकर अतएव त्याज्य विषय-गूगल का सेवन करने वाला पुरुष यदि गूगल का भली भाँति गुण प्राप्त करना चाहे तो वह अम्ल रस युक्त, तीक्ष्ण तथा अजीर्णकारक द्रव्य, मैथुन, परिश्रम, धूप में फिरना, शराब पीना तथा क्रोध करना छोड़ दे। [४५] १५. गूगल हिं०-गूगल, गुग्गुल। बं०-गुग्गुल, मुकुल। म०-गुग्गुल। गु०-गुगलते क०-गुग्गुल। त०-गुक्कुलु चेट्टु। ता०-मैशाक्षी, गुक्कल। सिंध-गुगुरू। फा०-बूएजहूदीन। अ०-मुक्ल-अर्जक, अफलात(तू) न। अं०- Indian Bdellium (इण्डियन डेलिअम्)। ले०-Balsamodendron mukul Hook. ex Stocks (बाल्सेमोडेण्ड्रोन् मुकुल, हुक एक्स स्टॉक्स)। Fam. Burseraceae (बर्सेरसी)। गूगल के वृक्ष-सिन्ध, राजपूताना, खानदेश, बरार, मैसूर, काठियावाड़ एवं बेलरी आदि स्थानों में अधिक पाये जाते हैं। इसका वृक्ष-छोटा, ४ से ८ फीट ऊँचा एवं झाड़ीदार होता है जिसकी मोटी फैली हुई शाखाओं के अग्रभाग कंटकित होते हैं। छाल-हरापन युक्त पीली होती है। इससे कागज के समान लम्बे, पतले, चमकीले परत निकलते रहते हैं। लकड़ी-सफेद और कोमल होती है। पत्ते-पत्रक १ से ३ तक, ऊपर से लट्वाकार, अग्र की तरफ दन्तमय धार वाले, चिकने, चमकीले तथा विशेष कर छोटी मोटी प्रशाखाओं के अन्त में रहते हैं। फूल-४-५ दल वाले, छोटे- छोटे तथा भूरापन लिये लाल रंग के आते हैं। फल-छोटे-छोटे, मांसक, लंबगोल तथा पकने पर लाल हो जाते हैं। ' CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३९१ उक्त वृक्ष की त्वचा में जाड़े के दिनों में घाव करने से एक प्रकार का तैलीय रालदार गोंद (Oleo gum-resin) निकलता है जिसे गूगल कहते हैं। गूगल के प्रकार—आकृति, रंग एवं स्थान भेद से गूगल कई प्रकार का होता है। ऊपर मूल में पाँच प्रकार के भेद लिखे हुए हैं। यूनानी वाले भी इसके पाँच भेद मानते हैं। (१) मुक्ले सकलाबी—यह भूरा होता है। (२) मुक्ले अरबी—यह यमन में पैदा होता है और ललाई लिये भूरा या बैगनी होता है। (३) मुक्ले अर्जक—यह ललाई लिये होता है। (४) मुक्ले यहूद—यह पिलाई लिये होता है। (५) मुक्ले हिन्दी—यह भारतवर्ष में होता है। बाजार में तीन तरह का गूगल बिकता है जिसमें से प्रथम दो तो गूगल हैं और तीसरा सलई का गोंद है। केवल गूगल कहने से कभी-कभी सलई का गोंद (कुंदुरू) भी व्यापारी दे देते हैं। (१) कण गूगल—यह मारवाड़ से आता है तथा ललाई लिये पीले रंग का होता है। यह भैंसा गूगल से नरम होता है। यह अच्छा माना जाता है। (२) भैंसागूगल—यह सिंध तथा कच्छ से आता है। यह हलका हरापन लिये पीले रंग का, टेढ़े-मेढ़े, छोटे-बड़े गट्ठों में होता है। इस पर मैल, बाल एवं छाल के टुकड़े आदि चिपके रहते हैं। यह मोम जैसा नरम लेकिन दबाने से भुरभुरा, कड़वा एवं देवदार के समान गंध वाला होता है। इसे जलाने पर गुब्बारे जैसे निकल कर फूटते हैं। इसे जल में घिसने से हरापन लिये सफेद मिश्रण बनता है। यह हलकी जात का होता है। (३) सलई का गोंद—इसका वर्णन आगे किया गया है। यह लाल रंग का होता है तथा जलाने पर अच्छी तरह जलता है। उत्तम गूगल—चमकीला, चिपचिपा, मधुर गंध वाला, कुछ पीला (ताजा), पुराना होने पर काला सा, स्वाद में कड़वा तथा आसानी से टूटता है। तोड़ने पर अन्दर से हरी एवं लाल चमक वाला होता है। इसे उष्ण जल में घिसने पर हरी चमक युक्त सफेद रंग का मिश्रण बनता है। इसे जलाने पर यह अच्छी तरह जलता नहीं तथा फूलकर महीन पपड़ी निकलती है। व्यापारी लोग जली हुई लकड़ी आदि में अनेक प्रकार के चिपचिपे गोंद लगाकर गोले बनाकर बेचते हैं इसलिये अच्छी तरह परीक्षा कर खरीदना चाहिये। हमेशा नये गूगल का ही व्यवहार करना चाहिये क्योंकि रखने से यह खराब हो जाता है। गूगल शोधन—गूगल के बराबर त्रिफला एवं गुडूच लेकर उसे मोटा कूटकर अष्टगुण जल में अर्धांश शेष क्वाथ करें। फिर क्वाथ को छानकर उसमें गूगल को कपड़े में बाँध उसकी पोटली लटकावें तथा मंद आँच पर स्वेदन करें। बार-बार उस क्वाथ को करछुल से पोटली पर डालते जाँय। जब सब गूगल छनकर क्वाथ में आ जावे तब कपड़े में का मैला फेंक दें तथा क्वाथ को ऊपर-ऊपर से निकाल लें। नीचे जमे हुये गाढ़े भाग को अलग कर दें। गूगल मिश्रित क्वाथ को मंद आँच पर गाढ़ा करें। जब गाढ़ा होने लगे तो उसमें थोड़ा घी डाल दें जिससे जलने न पावे। बाद में उसे खूब अच्छी तरह कूटकर ऊपर घी लगाकर रखें। यद्यपि इस विधि से शोधन करने की परिपाटी है तथापि संभवतः इस विधि से गूगल कुछ हीनवीर्य हो जाता होगा क्योंकि आधुनिक विद्वानों का मत है कि गूगल के गुण विशेष कर उसमें के सुगंधि तत्त्वों पर निर्भर होते हैं। इसलिये गूगल को केवल खूब अच्छी तरह बीनकर उसमें घी डालकर बहुत कूटकर व्यवहार करें तो ज्यादा उपयुक्त हो सकता है। कुछ लोग त्रिफला क्वाथ के स्थान पर दुग्ध अथवा दशमूल क्वाथ का व्यवहार भी करते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें एक उड़नशील तैल, रालदार गोंद (Gum resin) एवं एक कड़वा सत्व पाया जाता है। गुण और प्रयोग—गूगल, रसायन, त्रिदोषघ्न, वृष्य, बल्य, स्नेहन, सं्रसन, वातानुलोमक, आमाशयोत्तेजक, दीपन, वातहर, वातनाड़ी संस्थान के लिये पुष्टिकारक, उत्तेजक, कफनिःसारक तथा श्लेष्मल त्वचा के लिय उत्तेजक,

३९२ भावप्रकाशनिघण्टुः संकोचक एवं प्रतिदूषक, श्वेतकायाणुवर्धक, भक्षकायाणुकार्य-वृद्धिकर, त्वग्दोषहर, व्रणशोधन, व्रणरोपण, शोथघ्न, रक्तवर्धक एवं आर्तवजनन है। नया गूगल बृंहण एवं वृष्य होता है तथा पुराना कर्षण (लेखन) होता है। इसकी क्रिया बोल (Myrrha–मिह) जैसी होती है। इसके सेवन के पश्चात् आमाशय में उष्णता मालूम होती है। इसका प्रचूषण बहुत जल्दी होता हैं। इसके गुण संभवतः इसमें के सुगंधित तत्त्वों के ऊपर निर्भर रहते हैं। इसका उत्सर्ग चर्म, श्लेष्मलत्वचा एवं वृक्कों से होता है तथा उत्सर्ग के समय यह उन-उन अंगों को उत्तेजित करता है तथा जीवाणुनाशन का भी कार्य करता है। बिना किसी दुष्परिणाम के इसका बहुत दिन तक प्रयोग किया जा सकता है। कभी-कभी इससे कोपैबा (Copaiba) की तरह त्वचा पर लाल चकते और क्वचित् वृक्क प्रक्षोभ के लक्षण दिखलाई देते हैं जो औषध बन्द करने से ठीक हो जाते हैं। इसका उपयोग जीर्ण कफरोग, वातरोग, नाड्यवस्रनता, गृध्रसी, अर्दित, अग्निमांद्य, अपचन, अतिसार, प्रवाहिका, कंठमाला, ग्रंथि, विद्रधि, कुष्ठ, फिरंग, सोजाक, विभिन्न अवयवों के शोथयुक्त विकार, शोफ, उदर, चर्मरोग, व्रण, भगंदर, कृमि, पांडु, अर्श, प्रमेह, गर्भाशय विकार एवं मेदोवृद्धि में उन-उन अवयवों पर कार्य करने वाली प्रयोजक औषधों के साथ किया जाता है। (१) पुराने कफ विकारों में इसको छोटी पीपल, अडूसा, मधु एवं घृत के साथ दिया जाता है। राजयक्ष्मा में इसके प्रयोग से कफ की मात्रा कम होती है तथा जीवाणुनाशन भी होता है। जिन रोगों में कफ अत्यधिक एवं चिपचिपा होता है उसमें इससे विशेष लाभ होता है। दुर्बल, पांडुयुक्त एवं मध्यम आयु के लोगों में यह विशेष लाभदायक होता है। इसके साथ लोहभस्म का प्रयोग किया जा सकता है। श्वास में इसको घृत के साथ खिलाते हैं। (२) आमाशय शिथिलता एवं अभिस्तीर्णता में इसके प्रयोग से क्षुधावृद्धि होती है तथा पाचन सुधरता है। अतिसार, प्रवाहिका, आंत्रप्रदाह एवं क्षयज अतिसार आदि में आंत्रिक प्रतिदूषक (Intestinal antiseptic) के रूप में सुगन्धि द्रव्य, इन्द्रजव, एलुवा और गुड़ आदि के साथ यह दिया जाता है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में इसका अधिक प्रभाव पड़ता है। (३) यह रक्तशोधक, प्रतिदूषक, संपूर्ण शरीर को उत्तेजक एवं बलदायक होने के कारण अनेक शोथयुक्त अवस्थाओं जैसे स्वरयंत्रशोथ, श्वसनीशोथ, कुकास, उरःस्तोय, क्षयज उदराचरणशोथजन्य जलोदर, कंठमाला एवं मूत्रसंस्थान के गवीनीमुखशोथ, बस्तिशोथ तथा जीर्ण गर्भाशयशोथ एवं फिरंग आदि में लाभकर होता है। इनमें हर ४ या ६ घंटे के अन्तर पर इसको देते हैं। कंठमाला में पारद, सोमल एवं वायविडंग के साथ गूगल देते हैं। फिरंगादि में अनंतमूल के साथ एवं जीर्ण आमवात या सोजाक से संधिशोथ होने पर गूगल एवं शिलाजतु का प्रयोग किया जाता है। संधिशोथ पर इसका लेप भी करते हैं। सोजाक तथा बस्तिशोथ में गुडुच के साथ इसको देते हैं। उरःस्तोय एवं जलोदर आदि में इससे स्रवित जल का शोषण हो जाता है। (४) गूगल की गर्भाशय के ऊपर बहुत अच्छी क्रिया होती है। तरुणस्त्रियों के अनार्तव में गूगल, एलुवा तथा कसीस की गोलियाँ खिलाई जाती हैं। श्वेत प्रदर में तथा उसके कारण वन्ध्यत्व हो तो रसोंत के साथ इसे अधिक मात्रा में देते हैं। (५) अंगघात, अर्दित, उरुस्तंभ, गृध्रसी एवं वातनाड़ी शूल में कैशोर गुग्गुलु से बहुत लाभ होता है। ऊरुस्तंभ में गोमूत्र के साथ एवं गृध्रसी में रास्ना एवं घृत के साथ इसको देते हैं। (६) आमवात, कटिशूल एवं संधिपीड़ा में इसका बाह्याभ्यंतर प्रयोग किया जाता है। रास्नादि क्वाथ के साथ योगराज या त्रयोदशांग गुग्गुलु का उपयोग अच्छा होता है।

कर्पूरादिवर्गः ३९३ (७) कुष्ठ में इससे साधारण स्वास्थ्य अच्छा होता है तथा इसके प्रयोग से दुर्बलता तथा नाड़ीशूल आदि ठीक होता है। सभी प्रकार के चर्मरोगों में गूगल लाभदायक माना जाता है। इससे कंडू कम होती है तथा त्वचा का वर्ण सुन्दर हो जाता है। (८) व्रणशोथक, व्रणरोपक एवं प्रतिदूषक होने के कारण इसका बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। १० ड्राम जल में १ ड्राम इसका टिंक्चर (९०% मद्यसार में २०%) मिलाकर मसूड़ों की सूजन, पायरिया, दाँतों में गढ़े हो जाना, गले के व्रण, जीर्ण ग्रसनिकाशोथ एवं गलतुण्डिकाशोथ में गंडूष कराया जाता है। पुराने व्रणों के प्रक्षालन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। फोड़ों की प्रारंभिक अवस्था में इसके गरम लेप से फोड़े बैठ जाते हैं। घी में इसका मलहम बनाकर पुराने व्रणों में प्रयोग किया जाता है। कंठमाला में गूगल को उष्ण जल में घिसकर दिन में तीन चार बार मोटा लेप करने से गाँठें बैठ जाती है। अर्श में इसका लेप एवं धूआँ दिया जाता है। आमाशयोर्ध्वप्रदेश में इसे लगाने से हिचकी तुरंत रुकती है। प्राच्यव्रण (Delhi boil) नामक दिल्ली की तरफ होने वाले व्रण में गूगल, गंधक, सोहागा तथा कत्था इसका मलहम लगाया जाता है। मुखरोगों में गूगल को मुख में रखकर चूसने से लाभ होता हैं। **मात्रा—**२-८ रत्ती।

अथ सरल निर्यासगुग्गुलुः । तस्या नामानि गुणाँश्चाह

श्रीवासः सरलस्रावः श्रीवेष्टो वृक्षधूपकः । श्रीवासो मधुरस्तिक्तः स्निग्धोष्णस्तुवरः सरः ।।४६।। पित्तलो वातमूर्द्धाक्षिश्वररोगकफापहः । रक्षोघ्नः स्वेददौर्गन्ध्यूकाकण्डूव्रणप्रणुत् ।।४७।। **सरलनिर्यास अर्थात् चीड़ के गोंद (गन्धाबिरोजा) के नाम तथा गुण—**श्रीवास, सरलस्राव, श्रीवेष्ट और वृक्षधूपक ये सब गन्धाबिरोजा के संस्कृत नाम हैं। **गन्धाबिरोजा—**मधुर तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, उष्णवीर्य, दस्तावर, पित्तजनक एवं वायु, मस्तक, नेत्र तथा स्वरसम्बन्धी रोग, कफ, रक्षोग्रहबाधा, स्वेद, दुर्गन्ध, जूयें, खुजली और घाव को दूर करता है। [४६-४७]

१६. सरल निर्यास

**हिं०—**गन्धाबिरोजा, विहरोजा, विरोजा, सरल का गोंद, चीड़ का गोंद। **म०—**सरलडीक। **गु०—**बेरजो। क०— श्रीवेष्टक। **ता०—**पिनैमारू। **लिपचा०—**गिएपट। **भो०—**टीडोंग। **नेपा०—**धूप। **पहाड़ी—**विरजेलासा, लीसा। फा०— बारजद, बरजद। **अ०—**किन्न। **अं०—**Oleo-resin of Pine (ओलियो रेजिन् ऑफ पाइन्)। ले०—Oleo-resin of Pinus longifolia and other species (ओलियो रेजिना ऑफ पाइनस लांगिफोलिया अण्ड अदर स्पिसीज)। Fam. Pinaceae (पिनेंसी)। धूपसरल वृक्ष (चीड़) के निर्यास को गन्धाबिरोजा कहा जाता है। इसके वृक्ष तथा स्वरूपादि का वर्णन पहले सरल वृक्ष (पृष्ठ १९८) के अन्तर्गत किया जा चुका है। **रासायनिक संगठन—**इसमें करीब २०% तारपीन का तेल (Turpentine oil) होता है जो ऊर्ध्वपातन यंत्र द्वारा निकाला जाता है। लगभग ८०% भाग अवशेष रहता है। इसके डाक्टरी में रेझिन (रजन) या कोलोफोनि (Resin colophony) कहते हैं। रेझिन (रजन) पारभासक हलके अम्बर के वर्ण का, चमकीला एवं आसानी से टूटने वाला घन पदार्थ होता है। यह तोड़ने पर अन्दर से चमकीला दिखाई देता है। इसमें तारपीन सदृश स्वाद एवं गन्ध होती है। यह जल में अविलेय किन्तु मद्यसार तथा ईथर आदि में आसानी से घुल जाता है। **तारपीन का तेल—**यह सरल वृक्ष के निर्यास (गन्धाबिरोजा) से वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र से निकाला हुआ तैल है। औषध की अपेक्षा अन्य उद्योगों में इसकी बहुत खपत होती है। सुगन्धि द्रव्य, कृत्रिम कर्पूर, तैलीय रंग एवं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३९४ भावप्रकाशनिघण्टुः वार्निश बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। इस तेल की संसार भर की आवश्यकता का ६७% भाग अमेरिका एवं २२% भाग फ्रांस पूर्ति करता है इतने अधिक वहाँ इसके वृक्ष पाये जाते हैं। भारतवर्ष में भी यद्यपि इसके वृक्ष बहुत पाये जाते हैं तथापि जंगली प्रदेशों में यातायात की कठिनाइयों के कारण अभी बहुत कम वृक्षों के निर्यास से तैल निकाला जाता है। भवाली, झाल्लो तथा बरेली के पास चित्तरबकगंज आदि स्थानों में इसके तैल निकालने के कारखाने हैं। यह तैल रंगहीन एवं स्वच्छ होता है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार की गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कटु एवं कुछ तिक्त होता है। कुछ दिन के बाद तथा इसे खुला रखने पर इसके स्वाद तथा गन्ध दोनों बढ़ जाते हैं जो अधिक अप्रिय हो जाते हैं। इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.८६०-०.८७० है। यह सातगुने मद्यसार (९०%) में तथा ईथर, क्लोरोफॉर्म, कार्बन डाईसल्फाइड, विजलीयित (Dehydrated) मद्यसार एवं ग्लेशियल असेटिक् एसिड् में चाहे जिस मात्रा में घुल जाता है। भारतीय व्यापारी तैल में ३७.६% अॅल्फा-कॅरेन् (a-carene) एवं अॅल्फा-डी-टर्पेन्स् (a-d-terpenes), १.७% अॅल्फा-एल्-टर्पेन् (a-l-terpene), २४.८% एल्-पिनेन् (l-pinene), ९.७% नोपनेन् (Nopinene) या बीटा-पिनेन् (B-pinene), २०.३% लॉगिफोलीन् (Longifoline) एवं अल्प मात्रा में सिल्ह्वेस्ट्रीन (Sylvestrene) एवं डाइपेण्टीन (Dipentene) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। अमेरिका और फ्रांस के तैल में प्रधानतया पिनेन् अधिक होते हैं। भारतीय तारपीन के तैल में उपयुक्त पिनेन् की अपर्याप्त मात्रा होने के कारण कृत्रिम कर्पूर निर्माण के यह अयोग्य होता है। भारतीय तैल आसानी से जारित (Oxidized) होने के कारण तथा सूखने पर अधिक राल निकलने के कारण विदेशी तैल की अपेक्षा हीन श्रेणी का समझा जाता है लेकिन अन्य उद्योगों में इसका उपयोग किया जा सकता है। इस तैल को प्रकाशहीन, ठंडी जगह में बंद बोतलों में रखना चाहिये। गुण और प्रयोग-गन्धाबिरोजा एवं तारपीन के तेल के गुण लगभग समान ही होने के कारण दोनों का एक साथ ही वर्णन किया गया है। यह वातानुलोमक, श्लेष्मनिःसारक, कफघ्न, स्वेदजनन, मूत्रजनन, रक्तस्तम्भक, उत्तेजक, कृमिघ्न, शोथघ्न, वातहर, व्रणरोपक, दुर्गन्धिनाशक एवं अल्प प्रतिदूषक (antiseptic) है। इसको चर्म पर मर्दन करने से प्रारम्भ में त्वचा लाल हो जाती है तथा प्रक्षोभ उत्पन्न होता है, पश्चात् नाड्यग्रों के अवसाद से शून्यता उत्पन्न होती है। इससे सूक्ष्म रक्तवाहिनियों का संकोच होकर बाह्य (स्थानिक) रक्तस्राव रुक जाता है। अधिक मर्दन से त्वचा में स्फोट आदि भी उत्पन्न होते हैं। इसका प्रचूषध महास्रोत, श्वसनसंस्थान एवं त्वचा द्वारा होता है तथा उत्सर्ग मूत्र एवं श्वसनसंस्थान से होता है। उत्सर्ग के समय श्वास में इसकी गन्ध तथा मूत्र में वफ्श़ाह (Violet-ह्रायोलेट) की गन्ध आती है। अल्प मात्रा में बार-बार देने से प्रथम वृक्कों की उत्तेजना से मूत्र की मात्रा बढ़ती है लेकिन अधिक काल तक प्रयोग करते रहने से मूत्र में जलन, प्रक्षोभ एवं कभी-कभी तीव्र मूत्रकृच्छ्र होता है। वृक्कों में शोथ उत्पन्न होने से मूत्र की मात्रा कम होती है एवं मूत्र में अल्ब्यूमिन एवं कभी-कभी रक्त भी जाने लगता है। अधिक मात्रा में महास्रोत में प्रक्षोभ से तीव्र विरेचन एवं रक्तातिसार तथा तन्द्रा, सारे शरीर में शिथिलता, अवसाद, सांवेदनिक नाड़ियों का घात, प्रत्याक्षेप क्रिया का घात एवं संन्यास आदि लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। उपर्युक्त परिणाम अधिक मात्रा में तैल को सूँघने से भी हो सकते हैं। (१) यह उत्तम वातानुलोमक होने के कारण आध्मानजन्य शूल के लिये बहुत उपयोगी है। तारपीन के तेल को गोंद के साथ घोंट कर थोड़ी चीनी एवं जल मिलाकर रोगी को दिया जाता है। इससे स्फीतकृमियों का भी नाश होता

कर्पूरादिवर्गः ३९५ है। आमाशयिक व्रण से अथवा अन्य कारणों से आंत्र से रक्तस्राव होता हो तो इसको देने से सूक्ष्म रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तस्राव रुक जाता है। आन्त्रिक ज्वर (Typhoid) में न केवल वातानुलोमक प्रभाव के कारण आध्मान (Tympanitis) में लाभ होता है वरन् इसकी उपस्थिति में इस रोगोत्पादक दण्डाणु की वृद्धि रुक जाने से प्रत्यक्ष इस रोग में भी लाभ होता है। इसमें १५-३० बूँद हर घण्टे पर कई बार दिया जाता है। (२) जीर्ण श्वसनीशोथ (Bronchitis) में इसको देने से कफ निकलने लगता है तथा जीवाणुओं का नाश होने से दुर्गन्ध भी दूर होती है। रोगी के कमरे में तैल को छिड़कने से अपने आप यह श्वास में जाकर अपना कार्य करता है। कफक्षय एवं रक्तष्ठीवन में भी इसको खिलाया जाता है तथा सूँघने को भी दिया जाता है। फुफ्फुसों के कोथ में इससे विशेष लाभ होता है। तारपीन का तेल २ १/२ तोला, मुलेठी २ १/२ तोला एवं मधु २ तोला एक साथ घोंट कर ३०- ६० रत्ती की मात्रा में इन विकारों में दिया जाता है। (३) पुराने सोजाक (Gleet) एवं बस्तिशोथ में खनू का तेल १ -३ बूँद या शुद्ध गन्धाबिरोजा १ से २ ड्रा० खिलाते हैं। इन अवस्थाओं में 'पूय मेहारि वटी' को दिन भर में २-४ गोलियाँ दारूहरिद्रा कषाय के अनुपान से खिलाई जाती है। इसको बनाने के लिये शुद्ध गन्धाबिरोजा १ तो०, शुद्ध राल २ १/२ तोला, गूगल ५ तोला, रूमीमस्तगी २ १/२ तोला एवं चन्दन का तैल २ १/२ तोला इन सबको घोंट कर १॥ माशे की गोलियाँ बनाई जाती हैं। (४) जीर्ण कोष्ठबद्धता, आध्मान एवं सूत्रकृमि में ६०-१२० बूँद ताड़पीन का तेल एवं ४ पाइण्ट साबुन युक्त जल की बस्ति बहुत ही लाभदायक होती है। (५) इसमें रेंड़ी का तेल मिलाकर आमवात, कटिशूल, सन्धिपीड़ा एवं वातनाड़ी शूल में लगाया जाता है। आन्तरिक शोथ विशेष कर उदरगत शोथ एवं आध्मान में इससे स्वेदन किया जाता है। फलालेन जैसे कपड़े को उष्ण जल में निचोड़ कर उस पर थोड़ा सा तैल छिड़क कर उससे सेंका जाता है। पुराने कफविकारों में इसको रूमाल पर डालकर सूँघने को दिया जाता है तथा छाती पर इसको लगाते हैं। (६) गजचर्म, व्रण, क्षत तथा अन्य चर्मविकारों में गन्धाबिरोजा का मलहम उपयोग में आता है। क्षत में तैल से स्थानिक रक्तस्राव भी रुक जाती है। मुख के शल्य कर्म में साधारण रक्तस्राव को रोकने के लिये तैल का प्रयोग किया जाता है। गन्धाबिरोजा का उपयोग अनेक प्रकार के मलहमों तथा धूप आदि में किया जाता है। कण्ठमाला में इसके लेप से लाभ होता है। गन्धाबिरोजा का डामर जीर्ण कास एवं राजयक्ष्मा आदि में दिया जाता है। इसके रजन (रेझिन, कोलोफोनि) का व्यवहार मलहम बनाने में विशेष रूप से होता है। यह अल्प प्रतिदूषक तथा पुराने व्रणों के लिये लाभदायक होता है। मात्रा-तैल ३-१० बूँद; कृमिघ्न १२०-२४० बूँद; शुद्ध गन्धाबिरोजा १-२ माशा। अथ रालः। तस्य नामानि गुणाँश्चाह रालस्तु शालनिर्यास्सस्तथा सर्ज्जरसः स्मृतः। देवधूपो यक्षधूपस्तथा सर्वरसश्च सः ॥४८॥ रालो हिमो गुरुस्तिक्तः कषायो ग्राहको हरेत् । दोषास्रस्वेदवीसर्पज्वरव्रणविपादिकाः ।। ग्रहभग्नाग्निदग्धांश्च शूलातीसारनाशनः ॥४९॥ राल के नाम तथा गुण-राल, सालनिर्यास, सर्जरस, देवधूप, यक्षधूप, तथा सर्बरस ये राल के संस्कृत नाम हैं। राल-शीतवीर्य, गुरु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवं ग्राही होती है। यह-दोष (वातादिक), रक्तविकार, स्वेद, विसर्प, ज्वर, व्रण, विपादिका, ग्रहबाधा को दूर करती है तथा भग्न अर्थात् हड्डी के टूट जाने पर फायदा करती है और अग्नि से जल जाने पर भी लाभ करती हैं एवं शूल तथा अतिसार को नष्ट करती है। [४८-४९]

३१६ भावप्रकाशनिघण्टुः १७ राल हिं०—राल, रार, धूना, शाल (साखू) का निर्यास । बं०—धुना, राल, डम्मर । म०—राल पिंवली । गु०—राल । क०—सर्ज्जरस । ते०—सर्ज्जरसमु, सर्ज्ज । पं०—राल, अर्लु । फा०—राल मगरबी, रातियानः । अ०—रातीनज, कैकहर । अं०—Resin of Sal Tree (रेझिन् ऑफ़ साल ट्री) । ले०—Resina of Shorea robusta Gaertn. f. (रेझिना ऑफ़ श्योरिआ रोबस्टा गार्ट.) । Fam. Dipterocarpaceae (डिप्टेरोकार्पेसी) । शालवृक्ष के गोंद को राल कहते हैं । यह सफेदी लिये पीली किञ्चित् कालापन मिश्रित होती है । नयी अवस्था में यह रंगहीन एवं पारदर्शक होती है। इसमें तारपीन की राल के सदृश गन्ध नहीं होती तथा इसमें स्वाद भी नहीं होता । यह तैल में मिल जाती है तथा आसानी से जलती है । नोट—राल के लिये चरक सुश्रुत में सर्जरस शब्द प्रयुक्त हुआ है । शालनिर्यास शब्द चरक सुश्रुत में देखने में नहीं आता । वैद्य लोग राल से शाल की राल का व्यवहार करते हैं जो अधिकतर सिंगापुर से आती है । डाक्टरी में व्यवहार में लाई जाने वाली राल जिसे रजन (रेझिन) कहते हैं वह गन्धाबिरोजा से तारपीन के तैल निकालने के पश्चात् बचा हुआ अवशेष है । शाल.(साखू) के वृक्ष का वर्णन आगे वटादिवर्ग में आया है । सर्ज वृक्ष (शाल भेद) तथा उससे प्राप्त होने वाली राल जिसे चन्द्रस कहते हैं उसका भी वर्णन वटादि वर्ग में है । गुण और प्रयोग—राल उत्तम व्रणशोधन, व्रणरोपण, रक्तस्तम्भन, ग्राही एवं जीवाणुनाशक होती है । यह रेझिन (रजन) का अच्छा प्रतिनिधि मानी जाती है । (१) राल के मलहम का बहुत व्यवहार किया जाता है । इसके लगाने से स्थानिक रक्तप्रवाह बढ़ता है तथा जीवाणुनाशन का भी कार्य होता है । फोड़े आदि पर लगाने से बिना पीड़ा के वे फूट कर जल्दी अच्छे हो जाते हैं । नवीन शोथ हो तो बिना फूटे ही बैठ भी जाते हैं । इसके मलहम का उपयोग खुजली, पामा, बिवाई (विपादिका), पुराने व्रण एवं अग्निदग्ध व्रण आदि में किया जाता है । मलहम बनाने के लिये राल ४, मोम ४, तिल का तैल ४ एवं घृत ३ इन सबको जरा गरम करके एक में घोंट कर मिला दें । (२) आमवातिक पीड़ा एवं कटिशूल में ब्राण्डी के साथ या अंडे की सफेदी के साथ लगाने से लाभ होता है । (३) खाँसी, श्वास, अतिसार, कुपचन एवं सोजाक में राल खिलाई जाती है । बच्चों के रक्तयुक्त आँव में तथा रक्तार्श में चीनी के साथ इसका अधिक अच्छा उपयोग होता है । (४) वाजीकरण के लिए १० रत्ती राल १/२ सेर दूध के साथ नित्य प्रातः सेवन की जाती है । मात्रा—४-८ रत्ती । अथ कुन्दरुः (सुगन्धद्रव्यं शल्लकीनिर्यासः) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुन्दुरुस्तु मुकुन्दः स्यात्सुगन्धः कुन्द इत्यपि ॥५०॥ कुन्दुरुर्मधुरस्तिक्तस्तीक्ष्णस्त्वच्यः कटुर्हरेत् । ज्वरस्वेदग्रहलक्ष्मीमुखरोगकफानिलान् ॥५१॥ कुन्दुरु (सुगन्ध द्रव्य) जो कि शल्लकी का गोंद है उसके नाम तथा गुण—कुन्दुरु, मुकुन्द, सुगन्ध तथा कुन्द ये सब कुन्दुरु के संस्कृत नाम हैं । कुन्दुरु—मधुर, तिक्त तथा कटु रसयुक्त, तीक्ष्ण एवं त्वचा के लिये हितकारी होता है । यह ज्वर, स्वेद, ग्रहबाधा, अलक्ष्मी, मुखरोग, कफ और वायु को दूर करता है । [५०-५१] नोट—प्राचीनों ने शल्लकी (सलई) के निर्यास को ही कुन्दुरु माना है लेकिन बाजार में मिलने वाला कुन्दुरु सलई का निर्यास न होते हुए भी उसी जाति के विदेशी वृक्ष का निर्यास है जो अफ्रीका एवं अरब से आता है । इसका व्यापार CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३९७ मुख्यतया बंबई में होता है। गुणों की दृष्टि से भारती के गोंद एवं कुन्दुरु में विशेष अन्तर नहीं है। पार्थय लिये भारतीय निर्यास को 'सलई गूगल' एवं विदेशी निर्यास को 'कुन्दुरु' लिखा गया है तथा दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। बाजार में गूगल नाम से सलई का गूगल एवं कणगूगल (गुग्गुलु) दोनों ही बिकते हैं इसलिये खरीदते समय शल्लकी निर्यास की आवश्यकता होने पर 'सलई गूगल' माँगना चाहिये एवं गुग्गुलु की आवश्यकता होने पर कणगूगल नाम से खरीदना चाहिये। सलई वृक्ष का वर्णन वटादिवर्ग में किया गया है। यद्यपि कुन्दरु का अरबी नाम लबान तथा लोबान या लोहबान यह अन्य द्रव्य है, उसका भी प्रसंगतः संक्षेप में वर्णन किया गया है। कुन्दुरु शाक का वर्णन आगे शाकवर्ग में किया हुआ है। १८. शल्लकी निर्यास (सलई गूगल) हिं०-सलई गूगल, गूगल, लोबान। बं०-सलैधूप। गु०-धूपडो। म०-सालईचा डीक। अजमेर-गंधबिरोज़। अं०-Indian olibanum or Frankincense (इण्डियन् ओलिबॅनम या फ्रँकिन्सेन्स)। ले०-Gum resin of Boswellia serrata Roxb. (गमरेझिन ऑफ् बॉस्वेलिया सेरेटा रॉक्स)। Fam. Burseraceae (बर्सेर्रेसी)। यह शल्लकी (सलई) वृक्ष का गोंद है। यह कुछ आर्द्र, चिपचिपा, रक्ताभ पीतवर्ण का एवं सुगंधयुक्त होता है। यह जलाने पर कणगूगल की अपेक्षा जल्दी जलता है। जल में डालने पर यह सफेद दिखलाई देता है तथा मद्यसार या जल के साथ घोटने पर सफेद घोल बनता है। नवंबर से जुलाई तक के समय इसके वृक्षों को नीचे छीलते हैं तथा जो स्राव निकलता है उसे संग्रह करते हैं। ताजी अवस्था में यह कनाडा बाल्सम की तरह दिखलाई देता है। प्राचीनों ने कुन्दुरु इसे ही माना है। रासायनिक संगठन-इसमें गोंद, उड़नशील तैल एवं राल के समान एक अन्य द्रव्य रहता है। गुण और प्रयोग-यह स्नेहन, स्रंसन, रक्तशोधक, कफनिःसारक, उत्तेजक, मूत्रल, आर्तवजनन एवं त्वच्य है। इसके गुण मिह तथा गूगल के समान हैं। इसका उपयोग ज्वर, स्वेद, जीर्ण कफविकार, रक्तविकार, प्रदर, रक्तातिसार, मुखरोग, कास, श्वास, मूत्रविकार, आर्तवविकार, वातनाड़ीसंस्थान के रोग, श्लेष्मल त्वचा के कफयुक्त, विकार, पाण्डु एवं अनेक प्रकार के ग्रंथि, फोड़े एवं व्रण आदि में किया जाता है। इसका प्रयोग अन्य उपयुक्त औषधों के साथ गोली या चूर्णरूप में किया जाता है। (१) पुराने एवं गढ़ेदार व्रणों में टंकण, गन्धक, खैर एवं सलई गूगल का मलहम बहुत लाभदायक होता है। दुर्गंधित व्रणों में गरी का तेल या नींबू के रस में इसे मिलाकर लगाने से लाभ होता है। (२) इसको गरम जल में घिसकर गण्डमाला, ग्रन्थि, बद, संधिवात एवं अस्थिशोथ आदि में लगाया जाता है एवं खिलाते भी हैं। (३) पुराने सोजाक एवं फिरङ्ग में स्नेहन औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। (४) दुर्गन्धयुक्त श्वास में बबूल के गोंद के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा-५-१० रत्ती। १८. (अ) कुन्दुरु हिं०-कुन्दुरु, लोबान, कुन्दुरु, थुस। बं०-कुन्दुरुखोटी। म०-इ(बि)सेस। बं०-कुंदो। फा०-कुन्दुर। अ०-कुन्दुरे जकर, लोबान, बस्तज। अं०-Olibanum (ऑलिबॅनम्), Frankincense (फ्रँकिन्सेस)। ले०- Gum resin of Boswellia carterii Birdw. & other sp. (गम रेजिन ऑफ बॉस्बेलिया कार्टेराइ बर्ड, अण्ड अदर स्पीसीज)। Fam. Burseraceae (बर्सेर्रेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३९८ भावप्रकाशनिघण्टुः यह शल्लकी (सलई) की ही जाति के विदेशी वृक्ष का गोंद है जो अरब तथा अफ्रीका के एबीसीनिया नामक स्थान से आता है। बाजार में कुन्दुरु के नाम से यही बिकता है एवं बम्बई में इसका आयात होता है। इसके छोटे, बड़े एवं अण्डाकार ५-२५ मि० मी० बड़े टुकड़े होते हैं जो कभी-कभी आपस में चिपके रहते हैं। इसका बाह्य स्तर मटमैला एवं पीताभ, नीलाभ या हरी आभा युक्त होता है। यह आसानी से टूट जाता है। भीतरी सतह चिकनी तथा अर्धपारदर्शक होती है। यह जलाने में जल्दी जलता है। यह सुगन्धित तथा स्वाद में कुछ कड़वा होता है। रासायनिक संगठन-इसमें गोंद तथा एक राल सदृश अन्य पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धित, उत्तेजक, कफनिःसारक, ग्राही तथा शोथहर है। इसके गुण सलई के गूगल के समान हैं। इसकी क्रिया श्लेष्मल त्वचा पर होती है। श्वसनसंस्थान की श्लेष्मल त्वचा पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। पाश्चात्य चिकित्सा के बाल्सम् पेरु तथा बाल्सम् टोलू के समान यह कार्य करता है किन्तु इससे आमाशय में कम प्रक्षोभ होता है। (१) इसका उत्सर्ग श्वसनसंस्थान के द्वारा होने के कारण जीर्ण कफ विकार तथा अत्यन्त लसदार कफ गिरना आदि अवस्थाओं में इसे बदाम, शर्करा तथा जल के साथ खिलाते हैं। इससे कफ की दुर्गन्ध दूर होती है तथा कफ कम होकर खाँसी कम होती है। इसका धूम्रपान् भी कराते हैं। (२) सोजाक में इसको ५ रत्ती की मात्रा में बदाम आदि के साथ या गोली के रूप में खिलाते हैं। (३) कुन्दुरु, खसखस का तेल एवं सफेद मोम इनको मन्द आँच पर पिघला कर कपड़े से छान कर इस मलहम का प्रयोग ग्रन्थि, शोथ तथा व्रणों पर किया जाता है। बच्चों के फोड़े फुन्सी जल्दी फूट कर अच्छे हो जाते हैं। पाषाणगर्भ पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है। कार्बन्कल पर इसका मलहम विशेष उपयोगी है। (४) इसको वाष्प पर जल के साथ गरम करने से एक चिकट गोंद बनाता है। इसमें अफीम, धतूरा, खुरासानी अजवायन या बेलाडोना आदि मिलाकर, मोटे कपड़े पर लगाकर इसकी पट्टी को पीड़ायुक्त अङ्गों पर लगाने से वहाँ की रक्तवाहिनियों का संकोच होने से तथा उस अंग की गति कम होने से पीड़ा शान्त होती है। मात्रा-१०-३० रत्ती १८. (ब) लोहबान हिं०-लोहबान, लोबान। म०-ऊद। गु०-लोबान। अं०-Benzoin (बेन्झोइन)। ले०-Benzoinum (बेन्झोइनम्)। वृक्षनाम-Styrax benzoin Dryand (स्टाइरॅक्स बेंझोइन ड्रायेंड)। यह एक प्रकार का रालयुक्त गोंद है जिसके वृक्ष भारत में नहीं पाये जाते। इसके दो प्रकार मिलते हैं। उपर्युक्त नाम के वृक्ष से प्राप्त द्रव्य सुमात्रा बेंझोइन कहलाता है एवं दूसरे वृक्ष Styrax tonkinensis (Pierre) Craib ex Hartwich (स्टाइरॅक्स टॉन्किनेन्सिस्) से प्राप्त द्रव्य को स्याम बेंझोइन कहते हैं। इनके अतिरिक्त इसी जाति के अन्य वृक्षों से भी यह द्रव्य प्राप्त होता है। इसमें पर्याप्त मिलावट भी की जाती है। सुमात्रा बेंझोइन में कुछ अपारदर्शक, श्वेताभ या रक्ताभ बदाम या कौड़ी के आकार के टुकड़े, रालदार रक्ताभ भूरे या धूसर भूरे द्रव्य के साथ मिले हुए रहते हैं। इसका स्वाद कुछ तीता तथा गंध हलकी किन्तु अप्रिय नहीं होती। स्याम बेंझोइन के टुकड़े विभिन्न नाप के या चौपहल तथा कुछ चिपटे होते हैं। यह बाहर से पीताभ भूरे या रक्ताभ भूरे किन्तु अन्दर से दुधिया श्वेत और अपारदर्शक होते हैं। चौपहल टुकड़ों में चमकीले रक्ताभ भूरे रंग के लंब गोल टुकड़े राल के साथ मिले हुवे रहते हैं। इसमें बॉनिला की तरह गंध तथा बाल्सम् का विशिष्ट स्वाद होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३९९ लोहबान को हल्के-हल्के गरम करने से श्वेत वर्ण का धूँआ निकलता है जो ठंडी जगह पर रवेदार पदार्थ के रूप में जम जाता है। पोटैशियम् परम्गनेट के घोल के साथ इसके चूर्ण को गरम करने से सुमात्रा बेंझोइन हो तो बेन्झोल्डिहाइड की हल्की गंध आती है। ५ सी० सी० लोबान का ईथरीय सत्व लेकर उसमें २, ३ बूँद गंधक का तेजाब मिलावे तो सुमात्रा बेंझोइन होने पर रक्ताभ भूरा एवं स्याम बेंझोइन में गहरा गुलाबी लाल रंग हो जाता है। ९० प्र० श० मद्यसार में पहले प्रकार का ७५% एवं दूसरे प्रकार का ९०% घुल जाता है। गुण और प्रयोग-लोबान कफ निःसारक एवं प्रतिदूषक है। पुरानी खाँसी में बदाम तथा गोंद के साथ इसको देने से कफ बाहर निकलने में मदद होती है। बस्तिशोथ आदि में भी इसको देते हैं। विभिन्न प्रकार के चर्म रोग तथा व्रण आदि में इसका बाह्य प्रयोग लाभदायक है। अथ शिलारसः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह सिह्लकस्तु तुरुष्कः स्याद्यतो यवनदेशजः । कपितैलश्च संख्यातस्तथा च कपिनामकः ॥५२॥ सिह्लकः कटुकः स्वादुः स्निग्धोष्णः शुक्रकान्तिकृत् । वृष्यः कण्ठ्यः स्वेदकुष्ठज्वरदाहग्रहापहः ॥५३॥ शिलारस के नाम तथा गुण-यवनों (मुसलमानों) के देश में उत्पन्न होने से शिलारस को संस्कृत में तुरुष्क कहते हैं। सिह्लक, कपितैल, कपिनामक (अर्थात् कपि के पर्यायवाची सभी शब्द शिलारस के नामान्तर हैं) ये सब शिलारस के संस्कृत नाम हैं। शिलारस-कटुरस युक्त, स्वादु, स्निग्ध, उष्णवीर्य, शुक्रजनक, कान्तिकारक, वृष्य तथा कण्ठ के लिये हितकारी होता है। यह स्वेद, कुष्ठ, ज्वर, दाह तथा ग्रहबाधा को दूर करने वाला होता है। १९. शिलारस हिं०, म०, बं०, क०-शिलारस। सिलारस। गु०-शेलारस। ता०-नेरिअरिशिप्पाल। मल०-रसमाल। ते०-शिलारसम्। मा०-शिलारस। फा०-अम्बर माइअ, अस्ले लवनी। अ०-मीअः साइला, लब्नी, वृक्षनाम-जिर्द, उस्तुरक। अं०-Liquid Storax (लिक्विड स्टोरैक्स)। ले०-(वृक्ष नाम) Liquidamber orientalis Miller (लिक्विडम्बर ओरीएण्टलिस् मिलर)। Fam. Hamamelidaceae (हेमॅमेलिडेसी)। शिलारस अरब देश से आता है। यह गोंद के समान एक सुगन्धित द्रव्य है। इसके वृक्ष एशिया माइनर में होते हैं। इसी वर्ग का अन्य वृक्ष ले० ऑल्टिङ्गिया एक्सेल्सा नोरोन्हा (Altingia excelsa Noronha) आसाम, भूटान, वर्मा, पूर्वी बंगाल, पेगू, चीन, मलाया और जावा आदि देशों में होता है जिससे निकले हुए शिलारस को विदेशी शिलारस का अच्छा प्रतिनिधि मानते हैं। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का अनेक शाखायुक्त; पत्ते-करतलाकार ५ खण्डयुक्त; पुष्प- पीत वर्ण के गोल गुच्छों में आते हैं। ३ या ४ वर्ष पुराने वृक्ष की छाल को चोट पहुँचाने से भीतरी छाल में स्राव जमा होता है। फिर बाहरी छाल को हटाकर भीतरी छाल को जल में उबालने से उसके साथ लगा हुआ शिलारस जल पर तैरने लगता है जिसे अलग कर लेते हैं। शिलारस का आयात प्रधानतः फ्रांस से होता है। यह मधु के समान गाढ़ा, वजन में जल से भारी, पिलाई लिए लाल या भूरे रंग का, मुलायम, चिपचिपा तथा तैलीय राल सदृश पदार्थ है। नये शिलारस में मिट्टी के तेल जैसी गन्ध होती है लेकिन पुराना होने पर अच्छी गन्ध आने लगती है। इसका स्वाद तीता होता है। इसकी अन्य जाति के वृक्षों से भी यह प्राप्त किया जाता है। शोधन-पाश्चात्य चिकित्सा में इसको शुद्ध करके व्यवहार करते हैं। मद्यसार में इसे घोल एवं छान कर उस द्रव को उड़ जाने देते हैं तथा जो बचा रहता है उसे व्यवहार करते हैं। यह पीताभ भूरा, चिपचिपा, कुछ पारदर्शक एवं विशिष्ट सुगंध एवं स्वादयुक्त होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४०० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-इसमें एक तैलीय द्रव के साथ मिली हुई एक राल रहती है। राल में सिनेमिक एसिड (Cinnamic acid) के साथ संयुक्त स्टोरेसिनॉल् (Storesinol) नामक द्रव्य रहता है। तैलीय द्रव पदार्थ में स्टाइरॉल् (Styrol), एथिल सिनॅमेट (Ethyl cinnamate) एवं स्टाइरॅसिन (Styracin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-शिलारस कफघ्न, मूत्रल, प्रतिदूषक, कृमिघ्न, कण्डूघ्न, व्रणरोपक एवं व्रणशोधक है। इसका कफघ्न धर्म सौम्य है। इसकी क्रिया लोहबान, बाल्सन् पेरु तथा बाल्सम् टोलू सदृश होती है। इसका उत्सर्ग वृक्क तथा फुप्फुस द्वारा होता है। कभी-कभी इससे वृक्क शोथ भी हो सकता है। औषधि तैलों को सुगन्धित करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। चरक में वात व्याधि के बला तैल के पाठ में 'तुरुष्क' का प्रयोग किया हुआ है। (१) जीर्ण कास आदि कफविकारों में तथा राजयक्ष्मा में इसको अण्डे की सफेदी के साथ घोंटकर शहद मिलाकर चटाते हैं। इससे फुप्फुसों को बल मिलता है। (२) पुराना सोजाक एवं बस्तिशोथ आदि में मुलेठी के साथ इसको खिलाते हैं। (३) त्वचा के रोगों में शिलारस का बहुत प्रयोग किया जाता है। इससे जूँ तथा खुजली उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं का नाश होता है। इसे चौगुने तिल के तेल में मिलाकर पामा (Scabies), सिध्म तथा जीर्ण दाहयुक्त अपररस में लगाते हैं, इससे खुजली बहुत जल्दी कम हो जाती है। क्षयज व्रणों पर अकेले इसे लगाते हैं। इससे स्थानिक रक्ताभिसरण की वृद्धि होती है तथा क्षयज दण्डाणुओं का नाश होता है। वृषण शोथ में इसको लगाकर ऊपर से तम्बाखू या धतूरे का पत्ता बाँधने से लाभ होता है। अथ जातीफलम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह जातीफलं जातिकोशं मालतीफलमित्यपि। जातीफलं रसे तिक्तं तीक्ष्णोष्णं रोचनं लघु ।। कटुकं दीपनं ग्राहि स्वर्यं श्लेष्मानिलापहम् ।। ५४ ।। निहन्ति मुखवैरस्यं मलदौर्गन्ध्यकृष्णताः। कृमिकासवमिश्वासशोषपीनसहृद्रुजः ।।५५।। जायफल के नाम तथा गुण-जातीफल, जातिकोश और मालतीफल ये सब 'जायफल' के संस्कृत नाम हैं। जायफल-रस में तिक्त होता है एवं तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रोचक, लघु और कटुरस युक्त भी होता है तथा अग्निदीपक, ग्राही एवं बिगड़े हुए गले के स्वर को ठीक करनेवाला होता है तथा कफ, वात, मुख की विरसता, मल की दुर्गन्ध एवं कालापन तथा कृमि, खाँसी, वमन, श्वास, शोथ, पीनस और हृद्रोग इन सबों को दूर करने वाला होता है। [५४-५५] २०. जायफल हिं०-जायफल, जायफर। बं०, गु०-जायफल। म०-जायफल, बांडा जायफल। पं०-जयफल। ते०- जाजिकाय। क०-जाजिकै। ता०-जाडिक्कै। ब्रह्मी०-झाडि फू। सिलो०-जडिका। मलाया-बुशपल। फा०- जौज बूया। अ०-जौज बव्वा, जौजुत्तीव। अं०-Nutmeg (नटमेग)। ले०-Myristica fragrans, Houtt (मायूरिस्टिका फ्रैग्रेन्स, हाउउट) । Fam. Myristicaceae (मायूरिस्टिकॅसी) । जायफल-सुमात्रा, जावा, सिंगापुर, मोलूक्का, पिनांग एवं लंका तथा वेस्ट इण्डीज में अधिकता से उत्पन्न होता है। इस देश में इसके वृक्ष से फल पाना कष्ट साध्य है। नीलगिरी पर्वत के पूर्वीय भाग में कनूर की घाटी में बर्लियार के सरकारी बगीचों में तथा और दक्षिण में कोर्टलम् की पहाड़ियों पर इसके पेड़ लगाये गये हैं। इसका वृक्ष-सेव के वृक्ष के समान होता है और देखने में बहुत सुहावना हरे रङ्ग का मालूम पड़ता है। पत्ते- २ से ५ इञ्च तक लम्बे, १॥ इञ्च तक चौड़े, चर्मवत्, लंबे पर्णवृन्त से युक्त, अंडाकार या आयताकार भालाकार तथा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA