भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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३९८ भावप्रकाशनिघण्टुः यह शल्लकी (सलई) की ही जाति के विदेशी वृक्ष का गोंद है जो अरब तथा अफ्रीका के एबीसीनिया नामक स्थान से आता है। बाजार में कुन्दुरु के नाम से यही बिकता है एवं बम्बई में इसका आयात होता है। इसके छोटे, बड़े एवं अण्डाकार ५-२५ मि० मी० बड़े टुकड़े होते हैं जो कभी-कभी आपस में चिपके रहते हैं। इसका बाह्य स्तर मटमैला एवं पीताभ, नीलाभ या हरी आभा युक्त होता है। यह आसानी से टूट जाता है। भीतरी सतह चिकनी तथा अर्धपारदर्शक होती है। यह जलाने में जल्दी जलता है। यह सुगन्धित तथा स्वाद में कुछ कड़वा होता है। रासायनिक संगठन-इसमें गोंद तथा एक राल सदृश अन्य पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धित, उत्तेजक, कफनिःसारक, ग्राही तथा शोथहर है। इसके गुण सलई के गूगल के समान हैं। इसकी क्रिया श्लेष्मल त्वचा पर होती है। श्वसनसंस्थान की श्लेष्मल त्वचा पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। पाश्चात्य चिकित्सा के बाल्सम् पेरु तथा बाल्सम् टोलू के समान यह कार्य करता है किन्तु इससे आमाशय में कम प्रक्षोभ होता है। (१) इसका उत्सर्ग श्वसनसंस्थान के द्वारा होने के कारण जीर्ण कफ विकार तथा अत्यन्त लसदार कफ गिरना आदि अवस्थाओं में इसे बदाम, शर्करा तथा जल के साथ खिलाते हैं। इससे कफ की दुर्गन्ध दूर होती है तथा कफ कम होकर खाँसी कम होती है। इसका धूम्रपान् भी कराते हैं। (२) सोजाक में इसको ५ रत्ती की मात्रा में बदाम आदि के साथ या गोली के रूप में खिलाते हैं। (३) कुन्दुरु, खसखस का तेल एवं सफेद मोम इनको मन्द आँच पर पिघला कर कपड़े से छान कर इस मलहम का प्रयोग ग्रन्थि, शोथ तथा व्रणों पर किया जाता है। बच्चों के फोड़े फुन्सी जल्दी फूट कर अच्छे हो जाते हैं। पाषाणगर्भ पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है। कार्बन्कल पर इसका मलहम विशेष उपयोगी है। (४) इसको वाष्प पर जल के साथ गरम करने से एक चिकट गोंद बनाता है। इसमें अफीम, धतूरा, खुरासानी अजवायन या बेलाडोना आदि मिलाकर, मोटे कपड़े पर लगाकर इसकी पट्टी को पीड़ायुक्त अङ्गों पर लगाने से वहाँ की रक्तवाहिनियों का संकोच होने से तथा उस अंग की गति कम होने से पीड़ा शान्त होती है। मात्रा-१०-३० रत्ती १८. (ब) लोहबान हिं०-लोहबान, लोबान। म०-ऊद। गु०-लोबान। अं०-Benzoin (बेन्झोइन)। ले०-Benzoinum (बेन्झोइनम्)। वृक्षनाम-Styrax benzoin Dryand (स्टाइरॅक्स बेंझोइन ड्रायेंड)। यह एक प्रकार का रालयुक्त गोंद है जिसके वृक्ष भारत में नहीं पाये जाते। इसके दो प्रकार मिलते हैं। उपर्युक्त नाम के वृक्ष से प्राप्त द्रव्य सुमात्रा बेंझोइन कहलाता है एवं दूसरे वृक्ष Styrax tonkinensis (Pierre) Craib ex Hartwich (स्टाइरॅक्स टॉन्किनेन्सिस्) से प्राप्त द्रव्य को स्याम बेंझोइन कहते हैं। इनके अतिरिक्त इसी जाति के अन्य वृक्षों से भी यह द्रव्य प्राप्त होता है। इसमें पर्याप्त मिलावट भी की जाती है। सुमात्रा बेंझोइन में कुछ अपारदर्शक, श्वेताभ या रक्ताभ बदाम या कौड़ी के आकार के टुकड़े, रालदार रक्ताभ भूरे या धूसर भूरे द्रव्य के साथ मिले हुए रहते हैं। इसका स्वाद कुछ तीता तथा गंध हलकी किन्तु अप्रिय नहीं होती। स्याम बेंझोइन के टुकड़े विभिन्न नाप के या चौपहल तथा कुछ चिपटे होते हैं। यह बाहर से पीताभ भूरे या रक्ताभ भूरे किन्तु अन्दर से दुधिया श्वेत और अपारदर्शक होते हैं। चौपहल टुकड़ों में चमकीले रक्ताभ भूरे रंग के लंब गोल टुकड़े राल के साथ मिले हुवे रहते हैं। इसमें बॉनिला की तरह गंध तथा बाल्सम् का विशिष्ट स्वाद होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA