भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ३९७ मुख्यतया बंबई में होता है। गुणों की दृष्टि से भारती के गोंद एवं कुन्दुरु में विशेष अन्तर नहीं है। पार्थय लिये भारतीय निर्यास को 'सलई गूगल' एवं विदेशी निर्यास को 'कुन्दुरु' लिखा गया है तथा दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। बाजार में गूगल नाम से सलई का गूगल एवं कणगूगल (गुग्गुलु) दोनों ही बिकते हैं इसलिये खरीदते समय शल्लकी निर्यास की आवश्यकता होने पर 'सलई गूगल' माँगना चाहिये एवं गुग्गुलु की आवश्यकता होने पर कणगूगल नाम से खरीदना चाहिये। सलई वृक्ष का वर्णन वटादिवर्ग में किया गया है। यद्यपि कुन्दरु का अरबी नाम लबान तथा लोबान या लोहबान यह अन्य द्रव्य है, उसका भी प्रसंगतः संक्षेप में वर्णन किया गया है। कुन्दुरु शाक का वर्णन आगे शाकवर्ग में किया हुआ है। १८. शल्लकी निर्यास (सलई गूगल) हिं०-सलई गूगल, गूगल, लोबान। बं०-सलैधूप। गु०-धूपडो। म०-सालईचा डीक। अजमेर-गंधबिरोज़। अं०-Indian olibanum or Frankincense (इण्डियन् ओलिबॅनम या फ्रँकिन्सेन्स)। ले०-Gum resin of Boswellia serrata Roxb. (गमरेझिन ऑफ् बॉस्वेलिया सेरेटा रॉक्स)। Fam. Burseraceae (बर्सेर्रेसी)। यह शल्लकी (सलई) वृक्ष का गोंद है। यह कुछ आर्द्र, चिपचिपा, रक्ताभ पीतवर्ण का एवं सुगंधयुक्त होता है। यह जलाने पर कणगूगल की अपेक्षा जल्दी जलता है। जल में डालने पर यह सफेद दिखलाई देता है तथा मद्यसार या जल के साथ घोटने पर सफेद घोल बनता है। नवंबर से जुलाई तक के समय इसके वृक्षों को नीचे छीलते हैं तथा जो स्राव निकलता है उसे संग्रह करते हैं। ताजी अवस्था में यह कनाडा बाल्सम की तरह दिखलाई देता है। प्राचीनों ने कुन्दुरु इसे ही माना है। रासायनिक संगठन-इसमें गोंद, उड़नशील तैल एवं राल के समान एक अन्य द्रव्य रहता है। गुण और प्रयोग-यह स्नेहन, स्रंसन, रक्तशोधक, कफनिःसारक, उत्तेजक, मूत्रल, आर्तवजनन एवं त्वच्य है। इसके गुण मिह तथा गूगल के समान हैं। इसका उपयोग ज्वर, स्वेद, जीर्ण कफविकार, रक्तविकार, प्रदर, रक्तातिसार, मुखरोग, कास, श्वास, मूत्रविकार, आर्तवविकार, वातनाड़ीसंस्थान के रोग, श्लेष्मल त्वचा के कफयुक्त, विकार, पाण्डु एवं अनेक प्रकार के ग्रंथि, फोड़े एवं व्रण आदि में किया जाता है। इसका प्रयोग अन्य उपयुक्त औषधों के साथ गोली या चूर्णरूप में किया जाता है। (१) पुराने एवं गढ़ेदार व्रणों में टंकण, गन्धक, खैर एवं सलई गूगल का मलहम बहुत लाभदायक होता है। दुर्गंधित व्रणों में गरी का तेल या नींबू के रस में इसे मिलाकर लगाने से लाभ होता है। (२) इसको गरम जल में घिसकर गण्डमाला, ग्रन्थि, बद, संधिवात एवं अस्थिशोथ आदि में लगाया जाता है एवं खिलाते भी हैं। (३) पुराने सोजाक एवं फिरङ्ग में स्नेहन औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। (४) दुर्गन्धयुक्त श्वास में बबूल के गोंद के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा-५-१० रत्ती। १८. (अ) कुन्दुरु हिं०-कुन्दुरु, लोबान, कुन्दुरु, थुस। बं०-कुन्दुरुखोटी। म०-इ(बि)सेस। बं०-कुंदो। फा०-कुन्दुर। अ०-कुन्दुरे जकर, लोबान, बस्तज। अं०-Olibanum (ऑलिबॅनम्), Frankincense (फ्रँकिन्सेस)। ले०- Gum resin of Boswellia carterii Birdw. & other sp. (गम रेजिन ऑफ बॉस्बेलिया कार्टेराइ बर्ड, अण्ड अदर स्पीसीज)। Fam. Burseraceae (बर्सेर्रेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA