भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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३१६ भावप्रकाशनिघण्टुः १७ राल हिं०—राल, रार, धूना, शाल (साखू) का निर्यास । बं०—धुना, राल, डम्मर । म०—राल पिंवली । गु०—राल । क०—सर्ज्जरस । ते०—सर्ज्जरसमु, सर्ज्ज । पं०—राल, अर्लु । फा०—राल मगरबी, रातियानः । अ०—रातीनज, कैकहर । अं०—Resin of Sal Tree (रेझिन् ऑफ़ साल ट्री) । ले०—Resina of Shorea robusta Gaertn. f. (रेझिना ऑफ़ श्योरिआ रोबस्टा गार्ट.) । Fam. Dipterocarpaceae (डिप्टेरोकार्पेसी) । शालवृक्ष के गोंद को राल कहते हैं । यह सफेदी लिये पीली किञ्चित् कालापन मिश्रित होती है । नयी अवस्था में यह रंगहीन एवं पारदर्शक होती है। इसमें तारपीन की राल के सदृश गन्ध नहीं होती तथा इसमें स्वाद भी नहीं होता । यह तैल में मिल जाती है तथा आसानी से जलती है । नोट—राल के लिये चरक सुश्रुत में सर्जरस शब्द प्रयुक्त हुआ है । शालनिर्यास शब्द चरक सुश्रुत में देखने में नहीं आता । वैद्य लोग राल से शाल की राल का व्यवहार करते हैं जो अधिकतर सिंगापुर से आती है । डाक्टरी में व्यवहार में लाई जाने वाली राल जिसे रजन (रेझिन) कहते हैं वह गन्धाबिरोजा से तारपीन के तैल निकालने के पश्चात् बचा हुआ अवशेष है । शाल.(साखू) के वृक्ष का वर्णन आगे वटादिवर्ग में आया है । सर्ज वृक्ष (शाल भेद) तथा उससे प्राप्त होने वाली राल जिसे चन्द्रस कहते हैं उसका भी वर्णन वटादि वर्ग में है । गुण और प्रयोग—राल उत्तम व्रणशोधन, व्रणरोपण, रक्तस्तम्भन, ग्राही एवं जीवाणुनाशक होती है । यह रेझिन (रजन) का अच्छा प्रतिनिधि मानी जाती है । (१) राल के मलहम का बहुत व्यवहार किया जाता है । इसके लगाने से स्थानिक रक्तप्रवाह बढ़ता है तथा जीवाणुनाशन का भी कार्य होता है । फोड़े आदि पर लगाने से बिना पीड़ा के वे फूट कर जल्दी अच्छे हो जाते हैं । नवीन शोथ हो तो बिना फूटे ही बैठ भी जाते हैं । इसके मलहम का उपयोग खुजली, पामा, बिवाई (विपादिका), पुराने व्रण एवं अग्निदग्ध व्रण आदि में किया जाता है । मलहम बनाने के लिये राल ४, मोम ४, तिल का तैल ४ एवं घृत ३ इन सबको जरा गरम करके एक में घोंट कर मिला दें । (२) आमवातिक पीड़ा एवं कटिशूल में ब्राण्डी के साथ या अंडे की सफेदी के साथ लगाने से लाभ होता है । (३) खाँसी, श्वास, अतिसार, कुपचन एवं सोजाक में राल खिलाई जाती है । बच्चों के रक्तयुक्त आँव में तथा रक्तार्श में चीनी के साथ इसका अधिक अच्छा उपयोग होता है । (४) वाजीकरण के लिए १० रत्ती राल १/२ सेर दूध के साथ नित्य प्रातः सेवन की जाती है । मात्रा—४-८ रत्ती । अथ कुन्दरुः (सुगन्धद्रव्यं शल्लकीनिर्यासः) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुन्दुरुस्तु मुकुन्दः स्यात्सुगन्धः कुन्द इत्यपि ॥५०॥ कुन्दुरुर्मधुरस्तिक्तस्तीक्ष्णस्त्वच्यः कटुर्हरेत् । ज्वरस्वेदग्रहलक्ष्मीमुखरोगकफानिलान् ॥५१॥ कुन्दुरु (सुगन्ध द्रव्य) जो कि शल्लकी का गोंद है उसके नाम तथा गुण—कुन्दुरु, मुकुन्द, सुगन्ध तथा कुन्द ये सब कुन्दुरु के संस्कृत नाम हैं । कुन्दुरु—मधुर, तिक्त तथा कटु रसयुक्त, तीक्ष्ण एवं त्वचा के लिये हितकारी होता है । यह ज्वर, स्वेद, ग्रहबाधा, अलक्ष्मी, मुखरोग, कफ और वायु को दूर करता है । [५०-५१] नोट—प्राचीनों ने शल्लकी (सलई) के निर्यास को ही कुन्दुरु माना है लेकिन बाजार में मिलने वाला कुन्दुरु सलई का निर्यास न होते हुए भी उसी जाति के विदेशी वृक्ष का निर्यास है जो अफ्रीका एवं अरब से आता है । इसका व्यापार CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA