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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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कर्पूरादिवर्गः ३९५ है। आमाशयिक व्रण से अथवा अन्य कारणों से आंत्र से रक्तस्राव होता हो तो इसको देने से सूक्ष्म रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तस्राव रुक जाता है। आन्त्रिक ज्वर (Typhoid) में न केवल वातानुलोमक प्रभाव के कारण आध्मान (Tympanitis) में लाभ होता है वरन् इसकी उपस्थिति में इस रोगोत्पादक दण्डाणु की वृद्धि रुक जाने से प्रत्यक्ष इस रोग में भी लाभ होता है। इसमें १५-३० बूँद हर घण्टे पर कई बार दिया जाता है। (२) जीर्ण श्वसनीशोथ (Bronchitis) में इसको देने से कफ निकलने लगता है तथा जीवाणुओं का नाश होने से दुर्गन्ध भी दूर होती है। रोगी के कमरे में तैल को छिड़कने से अपने आप यह श्वास में जाकर अपना कार्य करता है। कफक्षय एवं रक्तष्ठीवन में भी इसको खिलाया जाता है तथा सूँघने को भी दिया जाता है। फुफ्फुसों के कोथ में इससे विशेष लाभ होता है। तारपीन का तेल २ १/२ तोला, मुलेठी २ १/२ तोला एवं मधु २ तोला एक साथ घोंट कर ३०- ६० रत्ती की मात्रा में इन विकारों में दिया जाता है। (३) पुराने सोजाक (Gleet) एवं बस्तिशोथ में खनू का तेल १ -३ बूँद या शुद्ध गन्धाबिरोजा १ से २ ड्रा० खिलाते हैं। इन अवस्थाओं में 'पूय मेहारि वटी' को दिन भर में २-४ गोलियाँ दारूहरिद्रा कषाय के अनुपान से खिलाई जाती है। इसको बनाने के लिये शुद्ध गन्धाबिरोजा १ तो०, शुद्ध राल २ १/२ तोला, गूगल ५ तोला, रूमीमस्तगी २ १/२ तोला एवं चन्दन का तैल २ १/२ तोला इन सबको घोंट कर १॥ माशे की गोलियाँ बनाई जाती हैं। (४) जीर्ण कोष्ठबद्धता, आध्मान एवं सूत्रकृमि में ६०-१२० बूँद ताड़पीन का तेल एवं ४ पाइण्ट साबुन युक्त जल की बस्ति बहुत ही लाभदायक होती है। (५) इसमें रेंड़ी का तेल मिलाकर आमवात, कटिशूल, सन्धिपीड़ा एवं वातनाड़ी शूल में लगाया जाता है। आन्तरिक शोथ विशेष कर उदरगत शोथ एवं आध्मान में इससे स्वेदन किया जाता है। फलालेन जैसे कपड़े को उष्ण जल में निचोड़ कर उस पर थोड़ा सा तैल छिड़क कर उससे सेंका जाता है। पुराने कफविकारों में इसको रूमाल पर डालकर सूँघने को दिया जाता है तथा छाती पर इसको लगाते हैं। (६) गजचर्म, व्रण, क्षत तथा अन्य चर्मविकारों में गन्धाबिरोजा का मलहम उपयोग में आता है। क्षत में तैल से स्थानिक रक्तस्राव भी रुक जाती है। मुख के शल्य कर्म में साधारण रक्तस्राव को रोकने के लिये तैल का प्रयोग किया जाता है। गन्धाबिरोजा का उपयोग अनेक प्रकार के मलहमों तथा धूप आदि में किया जाता है। कण्ठमाला में इसके लेप से लाभ होता है। गन्धाबिरोजा का डामर जीर्ण कास एवं राजयक्ष्मा आदि में दिया जाता है। इसके रजन (रेझिन, कोलोफोनि) का व्यवहार मलहम बनाने में विशेष रूप से होता है। यह अल्प प्रतिदूषक तथा पुराने व्रणों के लिये लाभदायक होता है। मात्रा-तैल ३-१० बूँद; कृमिघ्न १२०-२४० बूँद; शुद्ध गन्धाबिरोजा १-२ माशा। अथ रालः। तस्य नामानि गुणाँश्चाह रालस्तु शालनिर्यास्सस्तथा सर्ज्जरसः स्मृतः। देवधूपो यक्षधूपस्तथा सर्वरसश्च सः ॥४८॥ रालो हिमो गुरुस्तिक्तः कषायो ग्राहको हरेत् । दोषास्रस्वेदवीसर्पज्वरव्रणविपादिकाः ।। ग्रहभग्नाग्निदग्धांश्च शूलातीसारनाशनः ॥४९॥ राल के नाम तथा गुण-राल, सालनिर्यास, सर्जरस, देवधूप, यक्षधूप, तथा सर्बरस ये राल के संस्कृत नाम हैं। राल-शीतवीर्य, गुरु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवं ग्राही होती है। यह-दोष (वातादिक), रक्तविकार, स्वेद, विसर्प, ज्वर, व्रण, विपादिका, ग्रहबाधा को दूर करती है तथा भग्न अर्थात् हड्डी के टूट जाने पर फायदा करती है और अग्नि से जल जाने पर भी लाभ करती हैं एवं शूल तथा अतिसार को नष्ट करती है। [४८-४९]