भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ३९९ लोहबान को हल्के-हल्के गरम करने से श्वेत वर्ण का धूँआ निकलता है जो ठंडी जगह पर रवेदार पदार्थ के रूप में जम जाता है। पोटैशियम् परम्गनेट के घोल के साथ इसके चूर्ण को गरम करने से सुमात्रा बेंझोइन हो तो बेन्झोल्डिहाइड की हल्की गंध आती है। ५ सी० सी० लोबान का ईथरीय सत्व लेकर उसमें २, ३ बूँद गंधक का तेजाब मिलावे तो सुमात्रा बेंझोइन होने पर रक्ताभ भूरा एवं स्याम बेंझोइन में गहरा गुलाबी लाल रंग हो जाता है। ९० प्र० श० मद्यसार में पहले प्रकार का ७५% एवं दूसरे प्रकार का ९०% घुल जाता है। गुण और प्रयोग-लोबान कफ निःसारक एवं प्रतिदूषक है। पुरानी खाँसी में बदाम तथा गोंद के साथ इसको देने से कफ बाहर निकलने में मदद होती है। बस्तिशोथ आदि में भी इसको देते हैं। विभिन्न प्रकार के चर्म रोग तथा व्रण आदि में इसका बाह्य प्रयोग लाभदायक है। अथ शिलारसः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह सिह्लकस्तु तुरुष्कः स्याद्यतो यवनदेशजः । कपितैलश्च संख्यातस्तथा च कपिनामकः ॥५२॥ सिह्लकः कटुकः स्वादुः स्निग्धोष्णः शुक्रकान्तिकृत् । वृष्यः कण्ठ्यः स्वेदकुष्ठज्वरदाहग्रहापहः ॥५३॥ शिलारस के नाम तथा गुण-यवनों (मुसलमानों) के देश में उत्पन्न होने से शिलारस को संस्कृत में तुरुष्क कहते हैं। सिह्लक, कपितैल, कपिनामक (अर्थात् कपि के पर्यायवाची सभी शब्द शिलारस के नामान्तर हैं) ये सब शिलारस के संस्कृत नाम हैं। शिलारस-कटुरस युक्त, स्वादु, स्निग्ध, उष्णवीर्य, शुक्रजनक, कान्तिकारक, वृष्य तथा कण्ठ के लिये हितकारी होता है। यह स्वेद, कुष्ठ, ज्वर, दाह तथा ग्रहबाधा को दूर करने वाला होता है। १९. शिलारस हिं०, म०, बं०, क०-शिलारस। सिलारस। गु०-शेलारस। ता०-नेरिअरिशिप्पाल। मल०-रसमाल। ते०-शिलारसम्। मा०-शिलारस। फा०-अम्बर माइअ, अस्ले लवनी। अ०-मीअः साइला, लब्नी, वृक्षनाम-जिर्द, उस्तुरक। अं०-Liquid Storax (लिक्विड स्टोरैक्स)। ले०-(वृक्ष नाम) Liquidamber orientalis Miller (लिक्विडम्बर ओरीएण्टलिस् मिलर)। Fam. Hamamelidaceae (हेमॅमेलिडेसी)। शिलारस अरब देश से आता है। यह गोंद के समान एक सुगन्धित द्रव्य है। इसके वृक्ष एशिया माइनर में होते हैं। इसी वर्ग का अन्य वृक्ष ले० ऑल्टिङ्गिया एक्सेल्सा नोरोन्हा (Altingia excelsa Noronha) आसाम, भूटान, वर्मा, पूर्वी बंगाल, पेगू, चीन, मलाया और जावा आदि देशों में होता है जिससे निकले हुए शिलारस को विदेशी शिलारस का अच्छा प्रतिनिधि मानते हैं। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का अनेक शाखायुक्त; पत्ते-करतलाकार ५ खण्डयुक्त; पुष्प- पीत वर्ण के गोल गुच्छों में आते हैं। ३ या ४ वर्ष पुराने वृक्ष की छाल को चोट पहुँचाने से भीतरी छाल में स्राव जमा होता है। फिर बाहरी छाल को हटाकर भीतरी छाल को जल में उबालने से उसके साथ लगा हुआ शिलारस जल पर तैरने लगता है जिसे अलग कर लेते हैं। शिलारस का आयात प्रधानतः फ्रांस से होता है। यह मधु के समान गाढ़ा, वजन में जल से भारी, पिलाई लिए लाल या भूरे रंग का, मुलायम, चिपचिपा तथा तैलीय राल सदृश पदार्थ है। नये शिलारस में मिट्टी के तेल जैसी गन्ध होती है लेकिन पुराना होने पर अच्छी गन्ध आने लगती है। इसका स्वाद तीता होता है। इसकी अन्य जाति के वृक्षों से भी यह प्राप्त किया जाता है। शोधन-पाश्चात्य चिकित्सा में इसको शुद्ध करके व्यवहार करते हैं। मद्यसार में इसे घोल एवं छान कर उस द्रव को उड़ जाने देते हैं तथा जो बचा रहता है उसे व्यवहार करते हैं। यह पीताभ भूरा, चिपचिपा, कुछ पारदर्शक एवं विशिष्ट सुगंध एवं स्वादयुक्त होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA