भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

कर्पूरादिवर्गः ३९९ लोहबान को हल्के-हल्के गरम करने से श्वेत वर्ण का धूँआ निकलता है जो ठंडी जगह पर रवेदार पदार्थ के रूप में जम जाता है। पोटैशियम् परम्गनेट के घोल के साथ इसके चूर्ण को गरम करने से सुमात्रा बेंझोइन हो तो बेन्झोल्डिहाइड की हल्की गंध आती है। ५ सी० सी० लोबान का ईथरीय सत्व लेकर उसमें २, ३ बूँद गंधक का तेजाब मिलावे तो सुमात्रा बेंझोइन होने पर रक्ताभ भूरा एवं स्याम बेंझोइन में गहरा गुलाबी लाल रंग हो जाता है। ९० प्र० श० मद्यसार में पहले प्रकार का ७५% एवं दूसरे प्रकार का ९०% घुल जाता है। गुण और प्रयोग-लोबान कफ निःसारक एवं प्रतिदूषक है। पुरानी खाँसी में बदाम तथा गोंद के साथ इसको देने से कफ बाहर निकलने में मदद होती है। बस्तिशोथ आदि में भी इसको देते हैं। विभिन्न प्रकार के चर्म रोग तथा व्रण आदि में इसका बाह्य प्रयोग लाभदायक है। अथ शिलारसः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह सिह्लकस्तु तुरुष्कः स्याद्यतो यवनदेशजः । कपितैलश्च संख्यातस्तथा च कपिनामकः ॥५२॥ सिह्लकः कटुकः स्वादुः स्निग्धोष्णः शुक्रकान्तिकृत् । वृष्यः कण्ठ्यः स्वेदकुष्ठज्वरदाहग्रहापहः ॥५३॥ शिलारस के नाम तथा गुण-यवनों (मुसलमानों) के देश में उत्पन्न होने से शिलारस को संस्कृत में तुरुष्क कहते हैं। सिह्लक, कपितैल, कपिनामक (अर्थात् कपि के पर्यायवाची सभी शब्द शिलारस के नामान्तर हैं) ये सब शिलारस के संस्कृत नाम हैं। शिलारस-कटुरस युक्त, स्वादु, स्निग्ध, उष्णवीर्य, शुक्रजनक, कान्तिकारक, वृष्य तथा कण्ठ के लिये हितकारी होता है। यह स्वेद, कुष्ठ, ज्वर, दाह तथा ग्रहबाधा को दूर करने वाला होता है। १९. शिलारस हिं०, म०, बं०, क०-शिलारस। सिलारस। गु०-शेलारस। ता०-नेरिअरिशिप्पाल। मल०-रसमाल। ते०-शिलारसम्। मा०-शिलारस। फा०-अम्बर माइअ, अस्ले लवनी। अ०-मीअः साइला, लब्नी, वृक्षनाम-जिर्द, उस्तुरक। अं०-Liquid Storax (लिक्विड स्टोरैक्स)। ले०-(वृक्ष नाम) Liquidamber orientalis Miller (लिक्विडम्बर ओरीएण्टलिस् मिलर)। Fam. Hamamelidaceae (हेमॅमेलिडेसी)। शिलारस अरब देश से आता है। यह गोंद के समान एक सुगन्धित द्रव्य है। इसके वृक्ष एशिया माइनर में होते हैं। इसी वर्ग का अन्य वृक्ष ले० ऑल्टिङ्गिया एक्सेल्सा नोरोन्हा (Altingia excelsa Noronha) आसाम, भूटान, वर्मा, पूर्वी बंगाल, पेगू, चीन, मलाया और जावा आदि देशों में होता है जिससे निकले हुए शिलारस को विदेशी शिलारस का अच्छा प्रतिनिधि मानते हैं। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का अनेक शाखायुक्त; पत्ते-करतलाकार ५ खण्डयुक्त; पुष्प- पीत वर्ण के गोल गुच्छों में आते हैं। ३ या ४ वर्ष पुराने वृक्ष की छाल को चोट पहुँचाने से भीतरी छाल में स्राव जमा होता है। फिर बाहरी छाल को हटाकर भीतरी छाल को जल में उबालने से उसके साथ लगा हुआ शिलारस जल पर तैरने लगता है जिसे अलग कर लेते हैं। शिलारस का आयात प्रधानतः फ्रांस से होता है। यह मधु के समान गाढ़ा, वजन में जल से भारी, पिलाई लिए लाल या भूरे रंग का, मुलायम, चिपचिपा तथा तैलीय राल सदृश पदार्थ है। नये शिलारस में मिट्टी के तेल जैसी गन्ध होती है लेकिन पुराना होने पर अच्छी गन्ध आने लगती है। इसका स्वाद तीता होता है। इसकी अन्य जाति के वृक्षों से भी यह प्राप्त किया जाता है। शोधन-पाश्चात्य चिकित्सा में इसको शुद्ध करके व्यवहार करते हैं। मद्यसार में इसे घोल एवं छान कर उस द्रव को उड़ जाने देते हैं तथा जो बचा रहता है उसे व्यवहार करते हैं। यह पीताभ भूरा, चिपचिपा, कुछ पारदर्शक एवं विशिष्ट सुगंध एवं स्वादयुक्त होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४०० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-इसमें एक तैलीय द्रव के साथ मिली हुई एक राल रहती है। राल में सिनेमिक एसिड (Cinnamic acid) के साथ संयुक्त स्टोरेसिनॉल् (Storesinol) नामक द्रव्य रहता है। तैलीय द्रव पदार्थ में स्टाइरॉल् (Styrol), एथिल सिनॅमेट (Ethyl cinnamate) एवं स्टाइरॅसिन (Styracin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-शिलारस कफघ्न, मूत्रल, प्रतिदूषक, कृमिघ्न, कण्डूघ्न, व्रणरोपक एवं व्रणशोधक है। इसका कफघ्न धर्म सौम्य है। इसकी क्रिया लोहबान, बाल्सन् पेरु तथा बाल्सम् टोलू सदृश होती है। इसका उत्सर्ग वृक्क तथा फुप्फुस द्वारा होता है। कभी-कभी इससे वृक्क शोथ भी हो सकता है। औषधि तैलों को सुगन्धित करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। चरक में वात व्याधि के बला तैल के पाठ में 'तुरुष्क' का प्रयोग किया हुआ है। (१) जीर्ण कास आदि कफविकारों में तथा राजयक्ष्मा में इसको अण्डे की सफेदी के साथ घोंटकर शहद मिलाकर चटाते हैं। इससे फुप्फुसों को बल मिलता है। (२) पुराना सोजाक एवं बस्तिशोथ आदि में मुलेठी के साथ इसको खिलाते हैं। (३) त्वचा के रोगों में शिलारस का बहुत प्रयोग किया जाता है। इससे जूँ तथा खुजली उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं का नाश होता है। इसे चौगुने तिल के तेल में मिलाकर पामा (Scabies), सिध्म तथा जीर्ण दाहयुक्त अपररस में लगाते हैं, इससे खुजली बहुत जल्दी कम हो जाती है। क्षयज व्रणों पर अकेले इसे लगाते हैं। इससे स्थानिक रक्ताभिसरण की वृद्धि होती है तथा क्षयज दण्डाणुओं का नाश होता है। वृषण शोथ में इसको लगाकर ऊपर से तम्बाखू या धतूरे का पत्ता बाँधने से लाभ होता है। अथ जातीफलम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह जातीफलं जातिकोशं मालतीफलमित्यपि। जातीफलं रसे तिक्तं तीक्ष्णोष्णं रोचनं लघु ।। कटुकं दीपनं ग्राहि स्वर्यं श्लेष्मानिलापहम् ।। ५४ ।। निहन्ति मुखवैरस्यं मलदौर्गन्ध्यकृष्णताः। कृमिकासवमिश्वासशोषपीनसहृद्रुजः ।।५५।। जायफल के नाम तथा गुण-जातीफल, जातिकोश और मालतीफल ये सब 'जायफल' के संस्कृत नाम हैं। जायफल-रस में तिक्त होता है एवं तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रोचक, लघु और कटुरस युक्त भी होता है तथा अग्निदीपक, ग्राही एवं बिगड़े हुए गले के स्वर को ठीक करनेवाला होता है तथा कफ, वात, मुख की विरसता, मल की दुर्गन्ध एवं कालापन तथा कृमि, खाँसी, वमन, श्वास, शोथ, पीनस और हृद्रोग इन सबों को दूर करने वाला होता है। [५४-५५] २०. जायफल हिं०-जायफल, जायफर। बं०, गु०-जायफल। म०-जायफल, बांडा जायफल। पं०-जयफल। ते०- जाजिकाय। क०-जाजिकै। ता०-जाडिक्कै। ब्रह्मी०-झाडि फू। सिलो०-जडिका। मलाया-बुशपल। फा०- जौज बूया। अ०-जौज बव्वा, जौजुत्तीव। अं०-Nutmeg (नटमेग)। ले०-Myristica fragrans, Houtt (मायूरिस्टिका फ्रैग्रेन्स, हाउउट) । Fam. Myristicaceae (मायूरिस्टिकॅसी) । जायफल-सुमात्रा, जावा, सिंगापुर, मोलूक्का, पिनांग एवं लंका तथा वेस्ट इण्डीज में अधिकता से उत्पन्न होता है। इस देश में इसके वृक्ष से फल पाना कष्ट साध्य है। नीलगिरी पर्वत के पूर्वीय भाग में कनूर की घाटी में बर्लियार के सरकारी बगीचों में तथा और दक्षिण में कोर्टलम् की पहाड़ियों पर इसके पेड़ लगाये गये हैं। इसका वृक्ष-सेव के वृक्ष के समान होता है और देखने में बहुत सुहावना हरे रङ्ग का मालूम पड़ता है। पत्ते- २ से ५ इञ्च तक लम्बे, १॥ इञ्च तक चौड़े, चर्मवत्, लंबे पर्णवृन्त से युक्त, अंडाकार या आयताकार भालाकार तथा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ४०१ हल्के पीले-भूरे से रंग के होते हैं। फूल-छोटे-छोटे सफेद रंग के गोलाकार आते हैं। फल-गोल, अण्डाकार १॥ से २ इञ्च लम्बे, रक्ताभ या पीताभ तथा पकने पर दो फाँकों में फट जाते हैं। इनके फटने पर कड़े आवरण से युक्त जायफल (सूखे हुए बीज) को घेरे हुवे जावित्री का लाल वर्ण का वेष्टन दिखाई देता है। जावित्री के अन्दर जायफल रहता है जिसका औषध में व्यवहार किया जाता है। जायफल अंडाकार, गोल तथा एक इञ्च के घेरे में होता है। बाहर से यह खाकीपन लिये हुए भूरा तथा सिकुड़ा हुआ दिखलाई पड़ता है और भीतर का रंग मैला गुलाबी जिसमें लालिमा लिये हुए भूरे रंग के तंतुओं का जाल होता है। इसकी गन्ध एक स्वतन्त्र प्रकार की तेज और स्वाद सुगन्ध युक्त कड़वा होता है। औषध के अतिरिक्त जायफल तथा इसके तैल का उपयोग मसाले, साबुन तथा सुगंधि आदि में किया जाता है। रासायनिक संगठन-जायफल में ५-१५% एक पतला हल्के पीले रंग का उड़नशील तैल पाया जाता है जो इसमें का कार्यकारी तत्त्व है। इसमें २४-४०% एक स्थिर तैल भी होता है जिससे साबुन की तरह गाढ़ा एक स्नैहिक पदार्थ प्राप्त होता है। इसे बांडा साबुन या नटमेग-बटर (Nutmeg-butter) कहते हैं। इसकी पीले रंग की साबुन की तरह बट्टियाँ बिकती हैं। इसके स्नैहिक अम्लों में प्रधानतया (करीब ६१%) मायरिस्टिक् एसिड (Myristic acid) रहता है। इनके अतिरिक्त जायफल में सुगंधि बाल्सम्, स्टार्च तथा रेशेदार पदार्थ पाये जाते हैं। इसके उड़नशील तैल में मुख्यतया यूजीनॉल (Eugenol) तथा आइसो यूजीनॉल (Iso-eugenol) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-जायफल तथा इसका तैल सुगंधित, ग्राही, दीपन, वातानुलोमक, उत्तेजक, मादक, पौष्टिक, वाजीकर, स्तंभन, मुख दौर्गन्ध्यहर तथा वेदना स्थापन है। इसके सेवन के पश्चात् आमाशयिक पाचक रसों की वृद्धि होने से भूख बढ़ती है तथा पाचन सुधरता है एवं वायु का अनुलोमन भी होता है। अधिक मात्रा में इसका मस्तिष्क पर प्रभाव कपूर के विषैले परिणाम के सदृश होता है। गतिनियंत्रक केन्द्र की उत्तेजना से अपस्मार सदृश आक्षेप आते हैं। यह तीव्र संज्ञाहर (Narcotic) हैं तथा इससे चक्कर तथा संन्यास आदि उत्पन्न हो जाता है। इसका प्रयोग कुपचन, अग्निमांद्य, आध्मान, अतिसार, हृल्लास, वमन, गले के रोग, कफ तथा वातविकार, हृत् दौर्बल्य, क्लीबत्व, शीघ्रपतन एवं अनिद्रा आदि में किया जाता है। विरेचक औषधों के ऐंठन, मरोड़ आदि दुष्परिणामों को दूर करने के लिये तथा अन्य उत्तेजक एवं वातानुलोमक औषधों के निर्माण में इसके तैल का पाश्चात्य चिकित्सा में बहुत उपयोग किया जाता है। (१) उदरशूल, अतिसार एवं बच्चों के आमातिसार आदि में इसे भूनकर नशा आने की मात्रा में देते हैं। वातानुलोमक तथा उत्तेजक गुणों के लिये इसके तैल को मिश्री के साथ खिलाते हैं। अजीर्ण में प्यास बहुत लगे तथा वमन होता हो तो इसका हिम लाभदायक होता है। (२) अफीम के साथ अनेक स्तंभक योगों में इसका उपयोग किया जाता है। (३) शिरःशूल, नाड़ीशूल, प्रसव कालीन कटिशूल, अंगघात तथा विपादिका में इसको जल में घिसकर लगाने से लाभ होता है। व्यंग तथा नीलिमा में इसको जल में घिसकर लगाया जाता है। मुखदुर्गंधि दूर करने के लिये इसे चबाते हैं। (४) इसके तैल में ओलिह ऑइल मिलाकर जीर्ण आमवात में मालिश की जाती है। तैल से दंतशूल में लाभ होता है। इसका गाढ़ा तैल वेदनाहर होता है तथा जीर्ण संधिशोथ, मोच एवं मरोड़ में मालिश किया जाता है। विसूचिका में हाथ एवं पैरों की ऐठन में भी इसके मलने से लाभ होता है। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-बंबई जायफल, रामफल या जंगली जायफल नाम से मायूरिस्टिका मलबारिका लॅम (Myristica malabarica Lam.) के फलों को लोग इसके स्थान पर व्यवहार करते हैं। इसके वृक्ष कोंकण, २९ भाव.I

४०२ भावप्रकाशनिघण्टुः कर्नाटक तथा उत्तर मलवार प्रान्तों में पाये जाते हैं। इससे जो पत्री निकलती है उसे रामपत्री या बंबई की जायपत्री कहते हैं। ये जंगली जायफल अधिक लम्बे, कम चौड़े, किंचित् मुलायम एवं करीब-करीब गंधहीन होते हैं। ये जायफल की अपेक्षा हीन गुण वाले होते हैं। कभी-कभी खराब जायफल तथा मिट्टी आदि मिलाकर साँचे के द्वारा बने हुए नकली जायफल भी बाजार में बिकते हैं। मात्रा-चूर्ण २-८ रत्ती; तैल १-५ बूँद। अथ जातीपत्री। तस्य नामानि गुणाँश्चाह जातीफलस्य त्वक् प्रोक्ता जातीपत्री भिषग्वरैः ।।५६।। जातीपत्री लघुः स्वादुः कटूष्णा रुचिवर्णकृत् । कफकासवमिश्र्वासतृष्णाकृमिविषापहा ।।५७।। जावित्री के नाम तथा गुण-वैद्यों में जो श्रेष्ठ हैं वे लोग 'जायफल' के छिल्के को ही 'जावित्री' कहते हैं। जातीपत्री या जातिपत्री और जातिकोष आदि संस्कृत नाम 'जावित्री' के हैं। जावित्री-लघु, स्वादिष्ट, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, रुचिजनक तथा वर्णकारक होती है एवम् यह कफ, खाँसी, वमन, श्वास, तृष्णा, कृमि और विषविकार इन सबों को दूर करने वाली भी होती है। [५६-५७] २१. जावित्री हिं०-जावित्री, जायपत्री। बं०-जायित्री, जैत्री। म०-जायपत्री। गु०-जावंत्री। क०-जायपत्री। ते०- जातिपत्री। फा०-बज्बाज। अ०-बस्बास(सः)। अं०-Mace (मेस)। ले०-Myristica fragrans Houtt (मायुरिस्टिका फ्रैग्रेन्स आउट)। Fam. Myristicaceae (मायरिस्टिकेंसी)। जिस वृक्ष से जायफल उत्पन्न होता है उसी से जावित्री भी उत्पन्न होती है। इस वृक्ष के वास्तविक फल के भीतर के बीज (जायफल) से लिपटा हुआ लालरङ्ग का जालीदार जो वेष्टन दिखाई देता है वही जावित्री है। अन्य वानस्पतिक वर्णन जायफल के साथ पहले किया जा चुका है। रासायनिक संगठन-इसमें जायफल की तरह ही एक उड़नशील तैल ८-१७% पाया जाता है। इसके अतिरिक्त स्थिर तैल, राल, वसा, शर्करा, डेक्स्ट्रीन एवं गोंद आदि पदार्थ इसमें होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण जायफल के समान होते हैं। यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, कफहर, रुचिकर, वर्ण्य एवं वृष्य हैं। इसका उपयोग कास, कफयुक्त श्वास, क्षयरोग, मन्दज्वर, वमन, आँतों के जीर्ण विकार, विसूचिका एवं कृमि आदि में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती। अथ लवङ्गम्। तस्य नामानि गुणाँश्चाह लवङ्गं देवकुसुमं श्रीसंज्ञं श्रीप्रसूनकम्। लवङ्गं कटुकं तिक्तं लघु नेत्रहितं हिमम्।।५८।। दीपनं पाचनं रुच्यं कफपित्तास्रनाशकृत्। तृष्णां छर्दिं तथाऽऽध्मानं शूलमाशु विनाशयेत्। कासं श्वासञ्च हिक्काञ्च क्षयं क्षपयति ध्रुवम्।।५९।। लौंग के नाम तथा गुण-लवङ्ग, देवकुसुम, श्रीसंज्ञ (लक्ष्मीवाचक सम्पूर्ण शब्द लवङ्गवाचक हैं) और श्रीप्रसूनक ये सब 'लौंग' के संस्कृत नाम हैं। लौंग-कटु तथा तिक्त रस युक्त, लघु, नेत्र के लिये हितकर, शीतवीर्य, अग्नि को CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ४०३ दीप्त करने वाली, पाचक एवम् रुचिकारक होती है तथा कफ, पित्त, रक्तविकार, तृषा, वमन, आध्मान, शूल, कास, श्वास, हिचकी एवम् क्षय इन सब रोगों को प्रायः शीघ्र तथा निश्चय दूर करती है । [५८-५९] लौंग हिं०—लोंग, लौंग, लवंग। बं०, म०—लवंग। गु०—लवींग। क०—लवंग कलिका, रूंग। ते०—करवप्पु, लवंगमु। ता०—किरांबु। मा०—लोंग। फा०—मेखक। अ०—करन्फल, करन्फूल। अं०—Cloves (क्लोव्स्)। ले०—Caryophyllus aromaticus Linn. (कॅरियोफालस् एरोमॅटिकस् लिन.); Eugenia aromatica Kuntze (यूजेनिया एरोमॅटिका कुंजे); Syzygium aromaticum (Linn.) Merr. & L. M. Perry (सिझिगियम् एरोमॅटिकम् (लिन.) मेर. पेरी)। Fam. Myrtaceae (मिर्टेसी)। इसका वृक्ष मोलूक्का द्वीप में नैसर्गिक रूप से उत्पन्न होता है। झंजिबार तथा पेम्बा में इसकी बहुत खेती की जाती है तथा करीब ९०% लौंग की पूर्ति वहीं से होती है। पेनांग, मेडागास्कर, मॉरिशस् एवं सीलोन आदि स्थानों में भी इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में दक्षिण भारत में अल्प मात्रा में इसकी खेती का प्रयत्न किया गया है। इसके वृक्ष— प्रायः १२-१३ हाथ ऊँचे और सतेज होते हैं तथा देखने में बहुत सुहावने लगते हैं। काण्ड—इसकी लकड़ी कठोर होती है तथा इस पर धूसर वर्ण की चिकनी छाल होती है। पत्ते—अभिमुख, सवृन्त, ४ इञ्च लम्बे, २ इञ्च चौड़े, लट्वाकार- आयताकार; फलकमूल एवं अग्र दोनों पतले एवं लम्बे; पत्रतट अखण्ड किन्तु लहरदार एवं मध्य नाड़ी के दोनों तरफ अनेक समानान्तर नाड़ियाँ होती हैं। पत्ते चमकीले हरे रंग के होते हैं तथा मसलने से इनमें सुगन्ध आती है। पुष्प— हलके नीलारुण (Purple) रंग के ६ मि० मि० लम्बे तथा अत्यन्त तीव्र आह्लादकारक सुगन्ध वाले होते हैं। इस वृक्ष की सुखी हुई पुष्प कलिकाओं को लौंग कहा जाता है। ये पहले हरी होती हैं। बाद में जब इनका रंग किरमिजी हो जाता है तब इन्हें वृक्षों से तोड़ कर सुखा लिया जाता है। इसी समय इनमें तैल की मात्रा अधिकतम रहती है। लौंग १०-१७.५ मि० मि० लम्बी तथा रक्ताभ बादामी रंग की होती है। इसके नीचे का भाग जो हाइपॅन्थियम् (Hypanthium) से बना होता है वह चौकोर तथा कुछ चपटा होता है तथा नख से दबाने पर उसमें से तेल निकलता है एवं इसके अग्र भाग में दो कोष रहते हैं जिनके अन्दर अक्षलग्न जरायु से लगे हुए अनेक बीजविभव (Ovule) होते हैं। लौंग के ऊपर के भाग में मोटे, नुकीले तथा फैले हुए ४ बाह्यदल होते हैं जिनके बीच में गुम्बजाकृति हलके रंग के, न फैले, हुए, पतले तथा अनियतारूढ़ (Imbricate) ४ अन्तर्दल होते हैं। अन्तर्दलों के अन्दर अनेक अन्दर की तरफ मुड़े हुए पुंकेशर होते हैं तथा एक स्त्री केशर होता है जिसका कुक्षिवृन्त सीधा तथा कड़ा होता है। लौंग में अत्यन्त तीव्र मसालेदार गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कटु होता है। रासायनिक संगठन—इसमें १५-२०% एक उड़नशील तैल पाया जाता है जिसमें ८५-९२% यूजेनॉल (Eugenol, C₁₀ H₁₂ O₂) रहता है। इसके अतिरिक्त लौंग में टॅनिन् (गॅलोटॅनिन्-ॲसिड् १३%) एवं फाइटोस्टेराल सदृश एक कॅरियोफाइलीन् (Carophyllene) नामक गन्धहीन, स्वादरहित, रंगहीन रवेदार पदार्थ पाया जाता है। लौंग के तेल में फेनॉल के समान यूजेनॉल नामक एक महत्त्व का पदार्थ रहता है। इसके अतिरिक्त तैल में ॲसिटिल् यूजेनॉल (Acetyl engenol 10%), मेथिल् सॅलिसिलेट (Methyl salicylate), मेथिलॲमिलकीटोन् (Methylamylketone, C₅ H₁₁ C OCH₃), व्हॅनिलिन् (Vanillin), कॅरियोफाइलीन् (Caryophyllene) तथा फर्फ्यूरॉल् (Furfurol, C₅ H₄ O₂) ये पदार्थ पाये जाते हैं। यह तैल ताजी अवस्था में रंगहीनया हलके पीले रंग का होता है लेकिन वह पुराना होने पर या खुला रखने पर गहरे रक्ताभ बादामी रंग का हो जाता है। गुण और प्रयोग—लौंग सुगन्धित पाचक, वातानुलोमक, उत्तेजक, अग्निदीपक, उद्वेष्टननिरोधि, कफघ्न, मूत्रजनन, रुचिकर, दुर्गन्धनाशक, श्वेतकणवर्धक, वृष्य एवं कृमिघ्न है। यह स्थानिक वेदनाहर, व्रणरोपक एवं व्रणशोधक है।

४०४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका उपयोग उदरशूल, आध्मान, अजीर्ण, कास, तृष्णा, वमन, विसूचिका, क्षय तथा सुगन्धित पदार्थ के रूप में मसाले आदि में किया जाता है। (१) लौंग के फांट (४० में १) को १ से २ तोला की मात्रा में विसूचिका में प्यास की शान्ति के लिये देते हैं। इससे जी मिचलाना भी कम होता है तथा वमन कम हो जाता है। गर्भिणीवमन में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाया जाता है। (२) अजीर्ण, आध्मान एवं उदरशूल आदि में इसका फांट या चूर्ण खिलाया जाता है। (३) गले की सूजन, कुकास, काँस, मुख एवं श्वास की दुर्गन्ध तथा जी मिचलाना आदि में लौंग दिये पर भून कर या उसी तरह मुख में रख कर चूसते हैं। इससे मसूड़े मजबूत होते हैं। (४) प्रतिश्याय एवं मस्तकशूल में लौंग को गरम जल में घिस कर ललाट पर लगाते हैं। लौंग का तैल—इसके गुण भी लौंग के समान ही होते हैं। इसका उत्सर्ग वृक्क, चर्म, श्वसनसंस्थान, आंत्र तथा यकृत् आदि से होता है। चरक-सुश्रुत में इसका उल्लेख नहीं मिलता। सिगरेट के लिये प्रयुक्त तम्बाकू को सुगन्धित करने के लिये जावा, सुमात्रा तथा जापान आदि स्थानों में इसका उपयोग किया जाता है। अनेक औषधों को सुगन्धित करने के लिये तथा विरेचक औषधों के साथ मरोड़ आदि न हो इसलिये इसका उपयोग करते हैं। मच्छर भगाने के लिये सोते समय इसे थोड़ा सा खुले अंगों पर लगा देने से मच्छर नहीं काटते। तैलों को सुगन्धित करने के लिये तथा पदार्थ संरक्षण के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। इसका बाह्य प्रभाव कपूर के सदृश होता है। यह स्थानिक उत्तेजक, स्वरागकारक, प्रतिक्षोभक, अल्पवेदनाहर, कृमिघ्न, सड़न को रोकने वाला एवं प्रतिदूषक है। (१) मिश्री पर डाल कर या गोंद के साथ मिश्रण के रूप में इसको आन्त्रिकशूल तथा आध्मान में खिलाते हैं। (२) क्षयजकास में कफ कम करने के लिये इसको खिलाते हैं। (३) दन्तशूल में दाँत के गढ़े में इसका फाहा रखने से बहुत लाभ होता है। सन्धिपीड़ा, गृध्रसी, कटिशूल एवं वातनाड़ीशूल आदि में इसको लगाया जाता है। तिलाओं में इसका प्रयोग किया जाता है। प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण—बाजार में तैल निकाली हुई लौंग भी बिकती है। इसे नख से दबाने पर तैल नहीं निकलता तथा उबले जल में डालने पर हय तैरती है एवं इसका रंग भी कुछ हलका रहता है। लौंग के चूर्ण में डंठल के टुकड़े का चूर्ण मिला दिया जाता है। लौंग के पक्व फल भी मदरक्लोव्हस (Mother cloves) नाम से बिकते हैं लेकिन उनमें तैल बहुत कम रहता है तथा उनके बीज में रहने वाले बड़े स्टार्च के कण से इनकी पहचान की जा सकती है। टूटे हुए पुंकेसर, अन्तर्दल एवं विकसित फूल जिनके पुंकेसर एवं अन्तर्दल निकाल लिये गये हों इनका मिश्रण लौंग के चूर्ण में व्यापारी कर देते हैं। लौंग में १५% से कम तैल नहीं होना चाहिये। मात्रा—चूर्ण १-२ १/२ रत्ती; तैल १-३ बूँद। अथ स्थूलैला (बड़ी इलायची) तस्या नामानि गुणाँश्चाह एला स्थूला च बहुला पृथ्वीका त्रिपुटाऽपि च ।। ६० ।। भद्रैला बृहदेला च चन्द्रबाला च निष्कुटिः । स्थूलैला कटुका पाके रसे चानलकृल्लघुः १ ।। ६१ ।। रूक्षोष्णा श्लेष्मपित्तास्रकण्डूश्वासतृषाऽपहा । हल्लासविषबस्त्यास्यशिरोरुग्वमिकानुत ।। ६२ ।। १. 'चानिलकृल्लघुः' इति पाठा० अशुद्धम् ।

कर्पूरादिवर्गः ४०५ बड़ी इलायची के नाम तथा गुण-एला, स्थूला, बहुला, पृथ्वीका, त्रिपुटा, भद्रैला, बृहदेला, चन्द्रबाला, निष्कुटि तथा स्थूलैला ये सब संस्कृत नाम 'बड़ी इलायची' के हैं। बड़ी इलायची-पाक तथा रस (स्वाद) में कटु होती है एवं अग्निजनक, लघु, रूक्ष और उष्णवीर्य होती है। यह कफ, पित्त, रक्तविकार, कण्डू (खुजली), श्वास, तृषा, हृल्लास (वमन मालूम पड़ना अर्थात् जी मिचलाना), विष एवं बस्ति, मुख तथा शिर सम्बन्धी रोग, वमन तथा खाँसी को दूर करने वाली होती है। [६०-६२] २३. बड़ी इलायची हिं०-बड़ी इलायची, पूर्वी इलायची, लाल इलायची। बं०-बड़ा इलाची। म०-मोठी एलची, मोठे वेलदोड़े । गु०-एलचा, मोटी एलची। ते०-पेद्दायेलाकी। ता०-पेरेलम, पेरिय एलक्वे। क०-डोड्डा एलाकी। फा०- हीलकलाँ। अ०-काकुले कुबार, काकुले जंजी। अं०-Nepal or Greater Cardamom (नेपाल या ग्रेटर कार्डेमोम्); Amomum (अॅमोमम्)। ले०-Amomum subulatum Roxb. (एमोमम् सबुलॅटम् राक्स)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेॅसी)। इसकी खेती नेपाल, बंगाल, सिक्किम तथा आसाम के पहाड़ी भागों के पास में गीली भूमि में की जाती है। इसका क्षुप-आमा हलदी के समान होता है और उसकी जड़ के नीचे कन्द रहता है। पत्रदण्ड-३-४ फुट ऊँचा होता है। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े, आयताकार-भालाकार, हरे एवं चिकने होते हैं। फूल-अवन्तकाण्डज व्यूहों (Spike) में नलिकाकार सफेद रङ्ग के आते हैं। फल-किञ्चित् लम्बाई लिये गोल, १ इञ्च तक लम्बे तथा लाल भूरे रङ्ग के होते हैं। बीज-शर्करायुक्त गाढ़े गूदे के कारण आपस में चिपके हुए अनेक बीज प्रत्येक कोष में होता हैं। बड़ी इलायची की बहुत-सी उपजातियाँ भारतवर्ष में पाई जाती हैं जिनमें से (ले०) अमोमम् ॲरोमॅटिकम् राक्स (Amomum aromaticum Roxb.); हिं०, बं०-मोरंग इलायची पूर्वी बंगाल तथा आसाम के आस-पास बहुत उत्पन्न होती है। यह बंगाल कार्डेमोम् (Bengal Cardamom) नाम से भी कही जाती है। हिमालय की तराई में आसाम तथा बंगाल के आर्द्र प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है। इसके क्षुप-के २-३ फीट लम्बे काण्ड, राइजो़म से एक साथ गुच्छों में निकलते हैं। पुष्प-हलके पीले रंग के अवृन्तकाण्डज व्यूहों में निकलते हैं। फल-अभिअण्डाकार या लट्वाकार करीब बड़े जायफल के इतने बड़े कुछ खुरदरे तथा ३ हिस्सों में विभक्त होते हैं। बीज-प्रत्येक कोष में अनेक तथा करीब ३ मि० मि० लम्बे होते हैं। रासायनिक संगठन-बड़ी इलायची में एक हलके पीले रंग का उड़नशील तैल पाया जाता है। इस तैल में सिनिओल् (Cineol) नामक पदार्थ बहुत रहता है। गुण और प्रयोग-यह किंचित् उष्ण, पाचक, सुगन्धित, उत्तेजक एवं वातानुलोमक है। इसके गुण छोटी इलायची के सदृश हैं तथा उसके प्रतिनिधि रूप में इसका व्यवहार किया जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में बड़ी एला का बहुत कम प्रयोग किया गया है। इलायची के स्थान में हमेशा छोटी इलायची का ही प्रयोग करना चाहिये जबतक कि विशेष रूप से बड़ी इलायची के लेने का निर्देश न हो। अनेक कड़वी, उत्तेजक तथा विरेचक औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इसके तैल का उपयोग सुगन्ध के लिये करते हैं। मन्दाग्नि, आध्मान, शूल, अतिसार, यकृतशोथ तथा मूत्रकृच्छ्र में इसका उपयोग किया जाता है। (१) दाँत तथा मसूढ़ों के विकारों में इसके क्वाथ से कुल्ला कराया जाता है। (२) पाचन संस्थान के कुछ विकारों में जिनमें आन्त्रिक स्राव गाढ़े तथा कम हो जाते हैं इसको ५ रत्ती की मात्रा में खिलाते हैं। इससे पित्त का स्राव ठीक होकर यकृतशोथ कम होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

(३) मूत्रल औषध के रूप में अश्मरी में इसको खरबूजे के बीज के साथ खिलाते हैं। (४) नाड़ीशूल में २ माशे की मात्रा में इसको क्विनीन के साथ देने से लाभ होता है। मात्रा-५-१५ रत्ती। अथैला (गुजराती इलायची) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह सूक्ष्मोपकुञ्चिका तुत्था कोरङ्गी द्राविडी त्रुटिः। एला सूक्ष्मा कफश्वासकासार्शोमूत्रकृच्छ्रहृत् । रसे तु कटुका शीता लघ्वी वातहरी मता ।। ६३ ।। छोटी इलायची (गुजराती इलायची) के नाम तथा गुण-सूक्ष्मा, उपकुञ्चिका, तुत्था, कोरङ्गी, द्राविडी, त्रुटि तथा सूक्ष्मैला ये सब 'छोटी इलायची' के संस्कृत नाम हैं। छोटी इलायची-कफ, श्वास, कास, अर्श (बवासीर) और मूत्रकृच्छ्र इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है तथा कटु रसयुक्त, शीतवीर्य, लघु एवं वातनाशक होती है। [६३] २४. छोटी इलायची हिं०-छोटी इलायची, गुजराती, इलायची, चौहरा इलायची, सफेद इलायची। बं०-छोट इलायच। गु०- एलची कागदी, एलची, मलवारी एलची। म०-बारीक वेलदोड़े, एलची। ते०-एलाक्तिक। ता०-एलाक्के, चिन्न एलं। मा०-छोटी इलायची। क०-एलाक्तिक। फा०-हीलबवा, हील, खैरबवा, इलायची खुर्द, हीलउन्सा। अ०- काकुलह सिगार, शूशमीर। अं०-(कार्डेमोम् फ्रूट); (Lesser Cardamom) (लेसर कार्डेमोम्)। ले०-(Elettaria cardamomum Maton) (इलेट्टेरिआ कार्डेमोमम् मेटन)। Fam. Zingiberaceae (झिंजीबेरेसी)। यह पश्चिम तथा दक्षिण भारत में, कनारा, मैसूर, कुर्ग, वैनाड, ट्रावंकोर तथा कोचीन में आर्द्र पहाड़ी जंगलों में उत्पन्न होती है। सीलोन तथा दक्षिणी प्रायद्वीप के चाय, कॉफी एवं रबर के बगानों में इसकी खेती की जाती हैं। वर्मा के जंगलों में भी यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-अदरख के क्षुप के समान तथा बहुवर्षायु होता है और इसकी जड़ के नीचे मोटा, मांसक तथा अनुप्रस्थ फैला हुआ राइजोम (मौमिक काण्ड) रहता है। राइजोम से ८-२० की संख्या में सीधे, चिकने, हरे रंग के चमकीले तथा ६-९ फीट ऊँचे काण्ड निकलते रहते हैं जिन पर एकान्तरित पत्र लगे होते हैं। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३ इञ्च तक चौड़े, आयताकार-भालाकार तथा कोषाकार होते हैं। पुष्पखण्ड-कांड के आधार भाग से १-२ फीट लम्बा पुष्पखण्ड निकला रहता है जो जमीन पर फैला रहता है। पुष्प-पुष्पव्यूहों में तथा किंचित् नील लोहिताभ वर्णयुक्त छोटे-छोटे होते हैं। पंखड़ियों के ओष्ठ श्वेत होते हैं। फल-हलके पीले या हरिताभ पीत रङ्ग के, १-२ से० मि० लम्बे, अण्डाकार, बड़े फल कुछ तिकोने, ३ कोषवाले, अनेक महीन खड़ी धारियों से युक्त सामान्य स्फोटी फल (Capsule) होते हैं जिनका स्फुटन पाष्ठिक सन्धियों (Loculicidal) पर होता है। बीज-फलों के अन्दर अनेक छोटे बीज होते हैं जो प्रत्येक कोष में दो-दो कतारों में एवं अक्षलग्न जरायु से लगे हुए एक साथ रहते हैं। यह हलके या गहरे रक्ताभ भूरे रङ्ग के, ४ मि० मि० लम्बे, ३ मि० मि० चौड़े, अनियमित कोण युक्त, कड़े एवं ६-८ आड़ी झुर्रियों (Rugae-रूगी) से युक्त होते हैं। प्रत्येक बीज महीन वर्णहीन आवरण (Aril-ॲरिल्) से युक्त रहता है। इसका स्वाद कुछ कटु तथा शीतल एवं गन्ध मनोहर होती है। इलायची के प्रयोग के समय ही उसके बीजों को निकालना चाहिये। निकाल कर रखे हुए बीज खराब हो जाते हैं। भेद-(१) मैसूरी इलायची ही अधिकतर बिकती है। यह अण्डाकार, १०-२० मि० मि० लम्बी, हलके क्रीम के रंग की, करीब-करीब चिकनी तथा मजबूत रहती है। यह मलाबारी इलायची की अपेक्षा अधिक टिकाऊ रहती है।

कर्पूरादिवर्गः ४०७ (२) मलबारी इलायची कुछ छोटी, कम चौड़ी, भरी हुई एवं लम्बाई में झुर्रीदार रहती है। (३) मंगलोरी इलायची, मलबारी इलायची की ही तरह होती हैं किन्तु यह गोल, बड़ी तथा इसकी सतह खुरदरी होती है। (४) अलेप्पी इलायची, मलबारी इलायची की ही सदृश किन्तु हरी या हरिताभ पीत रङ्ग की रहती हैं। रासायनिक संगठन-छोटी इलायची के बीजों में ३-८% एक उड़नशील तैल पाया जाता है जिसमें प्रधान रूप में टर्पीनेन् (Terpinene) एवं टर्पिनिओल् (Terpineol) रहते हैं। इसमें टर्पिनिल् ॲसिटेट (Terpinyl acetate) एवं अल्प मात्रा में सीनिओल् (Cineol) भी पाये जाते हैं। उड़नशील तैल के अतिरिक्त बीजों में ३-४% स्टार्च, नाइट्रोजन युक्त गोंद एवं पीत रञ्जक द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-छोटी इलायची दीपन, पाचन, रोचन, मूत्रल, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं सुगन्धित है। अन्य सुगन्धित पदार्थों के साथ वातानुलोमक औषधों में तथा विरेचक औषधों के साथ मरोड़ न हो इसलिये इसका उपयोग किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा में जीरा, दालचीनी, कोचीनेल (इन्द्रगोप) एवं ग्लीसरीन के साथ छोटी इलायची का बना हुआ मद्यसारिय टिंक्चर औषधों को सुगन्धित एवं रंजित करने के लिये बहुत व्यवहार में लाया जाता है। छोटी इलायची का उपयोग श्वास, कास, क्षय, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण, अतिसार, आध्मान एवं उदर शूल में किया जाता है। (१) पचन नलिका के शिथिलता प्रधान रोगों में तथा दाहयुक्त रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। आंत्रिक रस की उत्पत्ति कम होती हो तथा पित्त का उचित रूप से स्राव न होता हो ऐसी अवस्थाओं के लिये यह अमूल्य औषध है। वमन तथा हल्लास में इसका फांट पिलाते हैं। उदर शूल, आध्मान एवं मरोड़ आदि में इलायची २ ड्राम, धनियां २ ड्राम, दालचीनी ४ ड्राम, मुनक्का १ औंस, रक्त चन्दन २ ड्राम एवं मद्यसार (४५%) १ पाइंट इसका टिंक्चर २- ८ बूँद देने से बहुत लाभ होता है। केले के अजीर्ण में इलायची का उपयोग किया जाता है। आँव तथा प्रवाहिका में मक्खन के साथ इसका चूर्ण खिलाया जाता है। यकृत् शोथ में ५ रत्ती की मात्रा में इससे बहुत लाभ होता है। (२) वृक्क के पीड़ायुक्त विकारों में खरबूजे के बीज के साथ इसे खिलाते हैं। इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है। सोजाक में तथा वाजीकरण के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। मूत्रकृच्छ्र में आँवले के रस के साथ या दही के पानी के साथ इसका चूर्ण लाभदायक होता है। (३) नेत्र रोगों में इसके सूक्ष्म चूर्ण को बकरी के मूत्र की भावना देकर अञ्जन कराया जाता है। (४) हृदय की धड़कन में पिप्पलीमूल के साथ इसको घी में मिला कर खिलाते हैं। गुल्म में भी इससे लाभ होता है। (५) नाड़ीशूल में १५ २० की मात्रा में छोटी इलायची का चूर्ण थोड़ी सी क्विनीन के साथ मिला कर देने से बहुत लाभ होता है। मस्तिष्क तथा वातनाड़ियों की थकावट में यह लाभदायक होती है। (६) चक्कर आते हों तो छिलके सहित इसका क्वाथ गुड़ मिला कर पिलाया जाता है। प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण-लंका से आने वाली एक जंगली छोटी इलायची होती है जो कुछ लम्बी, सिकुड़ी हुई एवं गहरे धूसरित भूरे रंग की होती है। इसके बीजों में करीब ४ झुर्रियाँ होती हैं। एक अन्य ॲमोमम् केपुलेगा स्प्रेग, बर्किल (Amomum kepulaga Sprague & Burkill) नामक क्षुप से प्राप्त इलायची के बीजों में कपूर की तरह स्वाद रहता है तथा उसमें करीब १४ खण्डित झुर्रियाँ रहती हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४०८ भावप्रकाशनिघण्टुः

इसमें बुरा लगी हुई, अपक्व, कीड़ों द्वारा खाई हुई एवं फटी हुई इलायची का व्यामिश्रण रहता है। मात्रा— चूर्ण ५-१५ रत्ती।

अथ त्वक्पत्रम् (तज) । तस्य नामानि गुणाँश्चाहं त्वक्पत्रञ्च वराङ्गं स्याद् भृङ्गं चोचं तथोत्कटम् । त्वचं लघूष्णं कटुकं स्वादु तिक्तञ्च रूक्षकम् ।।६४।। पित्तलं कफवातघ्नं कण्डूवामारुचिनाशनम् । हृद्बस्तिरोगवातार्शःकृमिपीनसशुक्रहृत् ।।६५।।

तज के नाम तथा गुण— त्वक्पत्र, वराङ्ग, भृङ्ग, चोच, उत्कट और त्वच ये सब 'तज' के संस्कृत नाम हैं। तज— लघु, उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त रस युक्त, स्वादिष्ट और रूक्ष होती है एवं यह पित्त उत्पन्न करने वाली, कफ तथा वात को दूर करने वाली, खुजली, आम, अरुचि, हृद्रोग, बस्तिसम्बन्धी रोग, वात, अर्श, कृमि, पीनस तथा शुक्र का भी नाश करने वाली होती है। [६४-६५]

तज— दालचीनी का ही एक भेद है। दालचीनी के अनेक जातियों के वृक्ष पाये जाते हैं। लंका से आने वाली दालचीनी पतली छाल वाली होती हैं जो सबसे अच्छी होती है। इसके वृक्ष को (ले०) सिनेमोमम् झेलनिकम् कहते हैं। उसका वर्णन आगे स्वतंत्र किया गया है। एक दालचीनी चीन देश से आती है जिसके वृक्ष को (ले०) सिनेमोमम् तमाल कहते हैं। इसी की छाल को कुछ लोग तज कहते हैं तथा इसके पत्तों को तमालपत्र (तेजपत्र) कहते हैं। इसको कहीं- कहीं दालचीनी नाम से ही या असली सिंगापुरी दालचीनी में मिलावट करके बेचते हैं क्योंकि सिंगापुरी दालचीनी बहुत महँगी होने के कारण बाजार में कम आती है। इसके अनेक जाति के वृक्ष होने के कारण भिन्न-भिन्न लेखकों ने दालचीनी, तज तथा तमालपत्र इनके लेटिन नाम अलग-अलग दिये है। प्रायः मोटी छाल को तज एवं पतली छाल को दालचीनी कहा जाता है। तेजपत्र और तज एक ही वृक्ष के छाल और पत्र हैं। कुछ इन्हें अलग-अलग वृक्षों के मानते हैं। यहाँ पर वर्णन चीनी दालचीनी का किया जा रहा है। तेजपत्र तथा असली दालचीनी का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है। कुछ लोग मोटी जाति की तज को नालुका नाम से भी बेचते हैं जिसका लेपादि में बहुत व्यवहार किया जाता है।

२५. तज हिं०, गु०, उर्दू— तज। बं०— दालचीनी। म०, उड़िया— दालचीनी। पं०— लुरण्डु। ता०, मल०— लवंगपत्ते। अं०— Cassia cinnamon (कॅशिआ सिनेमोन), Chinese cassia (चाइनीज कॅशिआ)। ले०— Cinnamomum cassia, Blume (सिर्नेमोमम् कॅशिआ, ब्लूम)। Fam. Lauraceae (लॉरिसी)। चीन एवं वर्मा में अवा नामक स्थान में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष चिकना तथा सदाहरित होता है। पत्ते— आयताकार-भालाकार या भालाकार, पतले ६-८ मि० मि० लम्बे पर्णवृन्त से युक्त, चर्मवत् एवं अस्पष्ट नाड़ीजाल से युक्त होते हैं। पुष्प— छोटे तथा परिपुष्प (Perianth) के बराबर या कुछ अधिक लम्बे तथा पतले पुष्पवृन्त (Pedicle) से युक्त, बहुवर्ध्यक्ष सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों में, पत्र के अक्ष में या छोटी शाखाओं के अन्त में रहते हैं। परिपुष्प करीब ३ मि० मि० लम्बे तथा कुछ सिल्क के समान रहते हैं जिनके दल (पंखुड़ियाँ) आयताकार, भालाकार होते हैं। फल— मटर के बराबर, चिकने, अण्डाकार एवं रसदार अष्ठिफल (Drupes) होते हैं। परिपुष्पासन बहुत बढ़ा हुआ नहीं होता तथा वह ६ खण्डों में विभक्त रहता है जिनके अग्र कटे हुये मालूम पड़ते हैं या प्रायः खण्ड पूर्ण रूप में स्थायी रहते हैं। इसके काण्ड की सूखी हुई छाल को चीनी दालचीनी कहते हैं। यह २-४० से० मी० लम्बी तथा मुड़ी होती है। बाहर से यह हलके धूसर भूरे रंग की, करीब-करीब चिकनी तथा कुछ आड़ी झुर्रियों से युक्त रहती है। अन्दर से यह रक्ताभ भूरे रंग की एवं रेशेदार होती हैं। इसे तोड़ने से भग्न छोटा तथा असम होता है। इसकी गन्ध मनोहर एवं स्वाद उष्ण, मधुर तथा सुगन्धि रहता है।

कर्पूरादिवर्गः ४०९ रासायनिक संगठन-इसमें ०.८% उड़नशील तैल, ४% राल, १४.६% गोंद युक्त निस्सार (टैनिन सहित), ६४.३% लिगनिन (Lignin) तथा बॅरसोरिन (Bassorin), १६.३% जल एवं रंजक द्रव्य ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-चीनी दालचीनी बहुत ही आल्हादकारक एवं फलप्रद सुगन्धि द्रव्यों में से हैं। यह उष्ण, आमाशय के लिये उत्तेजक, वातानुलोमक एवं ग्राही है। यह सार्वदैहिक उत्तेजक की अपेक्षा स्थानिक उत्तेजक है। यद्यपि इसका स्वतंत्र प्रयोग कम किया जाता है तथापि इसके फांट या चूर्ण से हल्लास दूर होता है तथा आध्मान में लाभ होता है। अतिसार में अन्य ग्राही औषधों के साथ तथा अन्य अनेक मिश्रणों में सहायक द्रव्य के रूप में इसका व्यवहार किया जाता है। मात्रा-२ १/२-१० रत्ती। अथ दारुसिता (दालचीनी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह त्वक्स्वाद्धी तु तनुत्वक्स्यात्तथा दारुसिता मता ।।६६।। उक्ता दारुसिता स्वाद्धी तिक्ताचानिलपित्तहृत् । सुरभिः शुक्रलाबल्या¹ मुखशोषतृषापहा ।।६७।। दालचीनी के नाम तथा गुण-त्वक्, स्वाद्धी, किंवा त्वक्स्वाद्धी, तनुत्वक् तथा दारुसिता ये सब 'दालचीनी' के संस्कृत नाम हैं। दालचीनी-स्वादिष्ट, तिक्तरसयुक्त, वातपित्तनाशक, सुगन्धयुक्त, शुक्रजनक, बलकारक ('वर्ण्या¹ पाठान्तर में-शरीर के रङ्ग को सुन्दर करने वाली), मुखशोष तथा तृषा को दूर करने वाली होती है। [६६-६७] २६. दालचीनी हिं०-दालचीनी, दारचीनी। बं०-दारुचीनी। म०-दालचीनी। गु०-तज। ते०, मल०-लवंग पत्तै। ता०- कन्त्रलवंग पत्तै। अ०-दारसीनी, किर्फा। फा०-दारचीनी। अं०-Cinnamon Bark (सिर्नमोन् वार्क)। ले०- Cinnamomum Zeylancum Blume (सिन्नेमोमम् झेलॅनिकम्, ब्लूम)। Fam. Lauraceae (लॉरिसी)। इसके वृक्ष लंका तथा दक्षिणी भारत में पाये जाते हैं। लंका, दक्षिण भारत, मार्टिनिक्यू, कैन्ने, जमइका, ब्राझील तथा सेचिलीस में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष-साधारण ऊँचाई का एवं सदा हरित होता है। छाल-कुछ मोटी, चिकनी तथा हलके रंग की होती है छोटी शाखाएँ कुछ दबी हुई एवं नये भाग चिकने रहते हैं किन्तु कलिकाएँ महीन सिल्क की तरह रहती हैं। पत्ते- प्रायः विपरीत, कड़े तथा चर्मवत्, ३-८ इञ्च लम्बे, १।।-३ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या लट्वाकार-भालाकार, नुकीले अग्रयुक्त, चिकने, ऊपर से चमकीले किन्तु नीचे से कुछ हलके एवं फलकमूल की तरफ तीक्ष्ण या गोलाई लिये हुए होते हैं। नाड़ियाँ-३-५ प्रधान नाड़ियाँ रहती हैं जिनके बीच महीन जालीदार नाड़ियाँ रहती हैं। पर्णवृन्त-१/२-१ इञ्च लम्बा तथा ऊपर से चपटा रहता है। पुष्प-बहुत एवं प्रायः पत्तों से लम्बे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों में जो सिल्क की तरह मृदुरोमश होते हैं। पुष्पदंड (Peduncle) लम्बे, प्रायः एक साथ गुच्छों में, चिकने या मृदुरोमश एवं पुष्पवृन्त (Pedicle) लम्बे होते हैं। परिपुष्प ५-६ मि० मि० लम्बे; नलिका १ इञ्च लम्बी एवं दल मृदुरोमश, आयताकार या कुछ अभि-लट्वाकार एवं प्रायः कुण्ठिताग्र रहते हैं। फल-१.३-१.७ से० मि० लम्बे, आयताकार या लट्वाकार- आयताकार, शुष्क या किंचित् मांसल, गहरे बैंगनी रंग के एवं ८ मि० मि० व्यास के संवृद्ध घंटिकाकार परिपुष्प से घिरे हुये रहते हैं। इस वृक्ष के झाड़ियों को काटने के बाद उत्पन्न नवीन प्ररोहों की सूखी हुई अन्दर की छाल को औषध के लिये लिया जाता है। इसे सिलोनी दालचीनी कहा जाता है। यह सर्वोत्तम दालचीनी होती है। इसकी एक साथ बँधी हुई १. वर्ण्या इति पाठ०।

Wait! If it's Refractive Index, what is the Hindi word? Let's read letter by letter: ? Wait, look at the second letter: is it ? Look at in पहचान उसमें के क्लोरिन की उपस्थिति, बढ़े हुये विशिष्ट गुरुत्व, ...: In उपस्थिति, is rounded. In गुरुत्व: , , , , , , . Now the word: Char 1: looks like with something below. Char 2: wait, is it ? ? Look at in किञ्चित् (L14): + . What about भंजन? Does Refraction = भंजन? Yes! In physics, "Refraction of light" was translated in the 19th/early 20th century as "प्रकाश का भंजन" or "अपवर्तन"! Wait, if it's "भंजन", does it say भंजन? But there are FOUR letters: 1, 2, 3, 4! Wait, is the 3rd letter ? Could it be भंजनीयता? No, it

(६) इसके तैल को दाँत के गढ़े में रखने से दर्द दूर होता है। नाड़ीशूल एवं जिह्वा के लकवे में इसका प्रयोग किया जाता है। चूसने वाली गोलियों में सुगंध द्रव्य के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। (७) बड़ी मात्रा में दालचीनी का उपयोग कैन्सर में किया गया है। औषध के अतिरिक्त मसालों में इसका बहुत प्रयोग करते हैं। तैल का सुगंध द्रव्य रूप में बहुत व्यवहार करते हैं तथा औषध संरक्षण के रूप में भी कभी-कभी व्यवहार किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २ १/२-१० र०; तैल १-३ बूँद। अथ पत्रकम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पत्रं तमालपत्रञ्च तथा स्यात्पत्रनामकम्। पत्रकं मधुरं किञ्चित्तीक्ष्णोष्णं पिच्छिलं लघु। निहन्ति कफवाताशौंहृल्लासारुचपीनसान् ।।६८।। तेजपात के नाम तथा गुण-पत्र, तमालपत्र, पत्रनामक (अर्थात् पत्रवाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाचक हैं) एवम् पत्रक ये सब 'तेजपात' के संस्कृत नाम हैं। तेजपात-मधुर रस युक्त, किञ्चित् तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पिच्छिल और लघु होता है एवम् यह कफ, वात, अर्श, हृल्लास (उबकाई), अरुचि तथा पीनस इन सबों को दूर करने वाला होता है। [६८] २७. तेजपात हिं०-तमालपत्र, पत्रज, तेजपत्ता, तेजपत्र, गुरन्द्रा। बं०-तेजपत्र। म०-तमालपत्र। ते०-आकुपत्री, तालीस पत्री। ने०-चेटा सिंकोली। गु०-तमालपत्र। आसा०-दोपती। ता०-कट्टु-करुवपत्तै। अ०-साजजेहिन्दी। ले०- Cinnamomum tamala Nees & Eberm (सिर्नमोमम् तमाल नीज, एवर्म)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी)। इसका वृक्ष हिमालय में ३ से ७ हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। मौतारगढ़ में ये समूहबद्ध होकर बहुत अधिक संख्या में पाये जाते हैं। पूर्वी बंगाल तथा खासिया एवं जैन्तिया पहाड़ियों पर तथा वर्मा में भी पाये जाते हैं। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का, करीब २५ फीट ऊँचा, साढ़े चार फीट के घेरे में एवं सुगन्धयुक्त होता है और वह बारहो मास हरा-भरा रहता है। छाल-पतली, शिकनदार, खुरदरी, गहरी भूरे रंग की या कृष्णाभ होती है। काट-आधा इञ्च मोटा, गुलाबी या ललाई लिये हुये भूरे रंग का और बाहर की ओर श्वेत रेखांकित होता है। पत्ते-प्रायः ५-८ लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, लटवाकार-आयताकार या भालाकार, नोकदार, चिकने, चर्मवत्, विपरीत या एकान्तर तथा आधार से अग्रतक तीन शिराओं से युक्त एवं ७.५-१३ मि० मि० लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। नवीन पत्तियाँ कुछ-कुछ गुलाबी रंग की रहती हैं। फूल-७.५ मि० मि० लम्बे, हल्के पीताभ रंग के, ५-१५ से० मी० लम्बे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों (Panicles) में रहते हैं। परिपुष्प खंड ६, आयताकार, सिल्क की तरह मृदुरोमश जो पुष्पित होने पर मध्य के नीचे से टूट जाते हैं। पूर्ण पुंकेसर ९ रहते हैं। फल-आध इञ्च लम्बे, अंडाकार, मांसल एवं काले रंग के रहते हैं। ये फल कुछ बढ़े हुये परिपुष्प नाल पर लगे रहते हैं जिनके परिपुष्प खंड अग्र पर कटे हुए (Truncated) मालूम पड़ते हैं। इसके सूखे हुए पक्व फल का काला नागकेशर नाम से दक्षिण भारत में व्यवहार होता है। अर्श के लिए यदि नागकेशर का प्रयोग करना हो तो इसका प्रयोग अधिक उचित मालूम होता है क्योंकि तमाल पत्र के शास्त्रीय गुणों में अर्श का उल्लेख मिलता है। इसकी छाल को हिं०-तज, बं०-नालुका तथा अ०-सलीखा कहते हैं। यही भारतीय दालचीनी है जिसको सिलोनी दालचीनी के स्थान पर या मिलावट के रूप में उपयोग में लाते हैं। इसी के पत्ते तेजपात या तमालपत्र नाम से अधिकतर बेचे जाते हैं। कुछ लोगों के मत से तेजपात तथा तज अलग-अलग वृक्षों के पत्ते तथा छाल हैं। इसकी

४१२ भावप्रकाशनिघण्टुः छाल सिलोनी दालचीनी की अपेक्षा मोटी, तेजी में कम तथा जल के साथ पीसने से पिच्छिलता युक्त हो जाती है। नवीन मत से सिलोनी तथा चीनी दालचीनी के गुण पहले लिखे जा चुके हैं तथा भारतीय के गुणों में नवीन दृष्टि से कोई विशेष अन्तर न होने के कारण इनको अलग नहीं लिखा है। नोट— भावप्रकाशकार त्वक्पत्र (तज) के गुणों में ‘पित्तलं’ तथा ‘शुक्रहृत्’ लिखते हैं। दारुसिता (सिलोनी दालचीनी) से गुणों में ‘पित्तहृत्’ एवं ‘शुक्रला’ लिखते हैं। दारुसिता के अन्य नाम ‘स्वाद्वी’, ‘तनुत्वक्’ लिखे हैं जिससे दारुसिता यह सिलोनी दालचीनी होगी ऐसा लगता है। इस दृष्टि से सिलोनी तथा भारतीय दालचीनी के गुण भावप्रकाशकार के मत से बिलकुल अलग हैं। भावप्रकाशोक्त तीसरे द्रव्य पत्रक (तेजपात) के गुण त्वक्पत्र से मिलते- जुलते हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि त्वक्पत्र (तज, भारतीय दालचीनी) के वृक्ष के पत्ते ही तेजपत्र हैं। रासायनिक संगठन— इसमें एक प्रकार का लौंग के समान गन्ध वाला उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग— तेजपत्र उष्ण, लघु, वातहर, दीपन, स्वेदजनन, मूत्रजनन तथा उत्तेजक है। इसका प्रयोग कफ, वात, अर्श, हल्लास, अरुचि एवं पीनस में किया जाता है। कुपचन, उदरस्थवायु, उदरशूल एवं अतिसार आदि पचननलिका के रोगों में, सब तरह के कफविकारों में एवं गर्भाशय की शिथिलता में इसका उपयोग करते हैं। गर्भाशय की शिथिलता दूर होकर गर्भाधान होने के लिये तथा गर्भस्राव न हो इसलिये इसका प्रयोग करते हैं। यह वातहर होने के कारण बच्चों के सभी प्रकार के रोगों में एवं आमवात में इसको खिलाते हैं। मात्रा— १-४ माशा। अथ नागकेशरः। तस्य नामानि गुणाँश्चाह नागपुष्पः स्मृतो नागः केशरो नागकेशरः। चाम्पेयो नागकिञ्जल्कः कथितः काञ्चनाह्वयः ॥६९॥ नागकेशर के नाम तथा गुण— नागपुष्प, नाग, केशर, नागकेशर, चाम्पेय, नागकिञ्जल्क तथा काञ्चनाह्वय (काञ्चन के वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) ये सब पुंलिंगी शब्द ‘नागकेशर’ वृक्षवाची हैं। [६९] ❖ अयं पुष्पे तु क्लीबे ॥६९॥ किन्तु यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि यदि उक्त सभी शब्द नपुंसकलिंगी हों तो ‘नागकेशर के पुष्प’ को कहने वाले होते हैं। [६९] नागपुष्पं कषायोष्णं रूक्षं लध्वामपाचनम् ।।७०।। ज्वरकण्डूतृषास्वेदच्छर्दिहृल्लासनाशनम् । दौर्गन्ध्यकुष्ठवीसर्पकफपित्तविषापहम् ।।७१।। नागकेशर (नागकेशर का फूल)— कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, रूक्ष, लघु तथा आम को पचाने वाला होता है एवं यह ज्वर, खुजली, तृषा, पसीना, वमन, हल्लास, दुर्गन्ध, कुष्ठ, विसर्प, कफ, पित्त और विष को दूर करने वाला होता है। [७०-७१] २८. नागकेसर (१) हिं०— नागकेसर, नागेसर, पीला नागकेशर, नागचम्पा। बं०— नागेश्वर। म०— नागकेसर, नागचांफा (वृक्ष)। गु०— पीलु नागकेसर। क०— नागसम्पिगे। ते०— नागकेसरमु। ता०— चेरू नगपू। अ०— मिस्कुरुम्मान। फा०— नारेमुष्क। अं०— Cobra’s Saffron (कोबराज सॅफ्रॉन)। ले०— Mesua ferrea Linn. (मेसुआ फेरिआ लिन)। Fam. Guttiferae (गटिफेरी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ४१३ यह पूर्वी हिमालय, आसाम, ब्रह्मा, दक्षिण हिन्दुस्तान और पूर्व बंगाल के पहाड़ों पर पाया जाता है। इसको बगीचों में भी लगाया जा सकता है। इसका छोटा सुन्दर वृक्ष होता है और वह सदा हराभरा रहता है। स्तम्भ-सीधा, छाल-चिकनी और राख के रंग की होती है। पत्ते-विपरीत, ३ से ५ इञ्च तक लम्बे तथा १-१।।। इञ्च चौड़े, आयताकार-भालाकार एवं तीक्ष्णाग्र युक्त होते हैं। इनका ऊपरी पृष्ठ चमकीला और नीचे का श्वेताभ तथा रज से आवृत होता है। शिराएँ सघन और स्पष्ट होती हैं। नये पत्ते लाल रंग के होते हैं। फूल-१ से ३ इञ्च के घेरे में सफेद रंग के सुगन्धयुक्त वसन्त ऋतु में आते हैं। इनमें अन्तर्दल चार होते हैं। इन्हीं फूलों के भीतर के पीले केसरिया रंग के नरकेसर के गुच्छ को नागकेसर कहते हैं। यही असली (पीला) नागकेशर है जिसका औषध में व्यवहार करना चाहिये। फल-एक इञ्च से बड़े, अंडाकार तथा कुछ नुकीले एवं प्रवृद्ध बाह्यदल से घिरे हुये होते हैं। एक-एक फल से १ से ४ तक चिकने, कोणयुक्त एवं भूरे रंग के बीज निकलते हैं। नोट-नागकेसर के सम्बन्ध में लोगों में भ्रम है। अधिकांश विद्वानों ने उपयुक्त मेसुआ फेरिआ के पुष्पों के नरकेसर गुच्छ को नागकेसर माना है जिसके गुण एवं प्रयोग यहाँ दिये गये हैं। इसी वर्ग के दक्षिण की तरफ होने वाले वृक्ष ओक्रोकार्पस् लाँगीफोलिअस् (Ochrocarpus longifolius) की पुष्प-कलिकाओं को लाल नागकेशर के नाम से बेचा जाता है। इसी प्रकार काला नागकेशर के नाम से भारतीय या चीनी दालचीनी के फल बेचे जाते हैं जिसके गुण दालचीनी के समान ही होते हैं। एक बात ध्यान देने की यह है कि नागकेसर के शास्त्रीय गुणों में अर्श का उल्लेख नहीं है। चरक में तथा व्यवहार में रक्तार्श के लिये इसका प्रयोग मिलता है। तज के गुणों में अर्श का उल्लेख है तथा उसके फल का उपयोग काला नागकेशर नाम से व्यवहार में कहीं-कहीं आता है। मेसुआ, फ्रेरिया के गुणादि के पश्चात् ओक्रोकार्पस् लॉगोफोलिअस् का वर्णन किया गया है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक तैलीय राल रहती है जिससे सुगंधित, हल्के पीले रंग का एक उड़नशील तैल प्राप्त होता है। कठोर फलभित्ति में टैनिन रहता है। बीजों में एक स्थिर तैल पाया जाता है। राल मद्यसार में कम घुलती है लेकिन बेञ्जॉल में संपूर्णतया घुलती है। इसके अतिरिक्त इसमें दो कड़वे पदार्थ भी पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-नागकेसर, संग्राही, गर्भ स्थापक, किंचित् उष्ण, रक्तसंग्राहक, आमपाचक एवं दीपक है। इसकी छाल तथा मूल तिक्त एवं सुगन्धि हैं। इसकी छाल कुछ संग्राही होती है। इसके कच्चे फल सुगंधित, कटु तथा विरेचक होते हैं। (१) रक्तार्श में मक्खन तथा मिश्री के साथ इसे खिलाने से रक्त गिरना बन्द हो जाता है। शतधौत घृत में मिलाकर इसमें लेप भी किया जाता है। (२) गुद द्वार की जलन, रक्तातिसार, वमन, हिक्का, तृष्णा, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं अतिस्वेद आदि में नागकेसर का प्रयोग करते हैं। (३) बहुत कफयुक्त खाँसी में इसे देते हैं। (४) अतिस्वेद में इसका लेप या इसके सूक्ष्म चूर्ण का भी बाह्य प्रयोग किया जाता है। (५) इसकी छाल एवं मूल का क्वाथ खाँसी एवं आमाशय प्रक्षोभ (Gastritis) में दिया जाता है। (६) तीव्र प्रतिश्याय में इसके पत्तों का उपनाह सर पर लगाते हैं। (७) इसके बीजों का तैल शरीर की पीड़ा, जोड़ों में दर्द तथा खुजली (पामा) एवं अन्य चर्मरोगों में लगाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४१४ भावप्रकाशनिघण्टुः (८) इसके पत्ते तथा फूलों का उपयोग बिच्छू एवं सर्पदंश में किया जाता है। (९) हाथ-पैरों की जलन में नागकेशर को शतधौत घृत में मिलाकर लगाने से जलन दूर होती। मात्रा-४ र० से १ माशा। लाल नागकेशर (२) सं०-सुरपुन्नाग, नमेरु, सुरपर्णिका। हिं०-लाल नागकेशर। म०-सुरंगी (वृक्ष), गोडी उंडी (फल), तांबडे नागकेशर। गु०-रांतु नागकेशर। अं०-Alexandrian Laurel (ॲलेक्झॉण्ड्रियन् लॉरिल्)। ले०-Ochrocar pus tongifolius Benth. & Hook. f. (ओक्रोकार्पस् लॉँगिफोलिअस् बेन्थ, हुक्)। Fam. Guttiferae (गटिफेरी)। यह पश्चिम प्रायद्वीप के जंगलों में कनारा से कोकण तक पाया जाता है। उत्तरी सरकार में यह लगाया हुआ मिलता है। इसका वृक्ष-साधारण ऊँचा तथा सदा हरित होता है। पत्ते-६-८ इञ्च लम्बे, १।।।२।। इञ्च चौड़े, आयताकार, मोटे, चर्मवत् एवं सुन्दर शिराजाल से युक्त होते हैं। पुष्प-अनेक, ४ अन्तर्दल वाले, लाल रेखांकित, श्वेत रंग के, गुच्छों में आते हैं। फल-१ इञ्च लम्बे, अण्डाकार, नुकीले तथा एक बीज से युक्त होते हैं। फलों के गूदों को लोग खाते हैं। सूखी हुई पुष्पकलिकाओं को लाल नागकेशर कहा जाता है। यह गोल, नुकीले, नारंगरक्त रंग के तथा करीब ¹/₂ इञ्च लम्बे पुष्पवृन्त से युक्त होते हैं। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग असली नागकेशर (मेसुआ फेरिआ) के स्थान पर किया जाता है। गुणों में उसके समान होते हुए भी यह कुछ न्यून गुण वाला है। इसके पुष्पों का अर्क निकालकर ज्वर में रोगी के स्नान के लिये प्रयोग करते हैं। इससे रोगी को आह्लाद मालूम होता है। यह उत्तेजक, सुगंधित, ग्राही, कडुवा एवं दीपन है। अत्यधिक प्यास, आमाशयिक प्रक्षोभ, अर्श, कुपचन तथा अतिसार में इसका प्रयोग करते हैं। मात्रा-१-३ माशा। नोट-कुछ लोग इसी वर्ग के पुन्नाग वृक्ष की कलिकाओं का भी उपयोग नागकेशर के नाम से करते हैं। इसे ले०-Calophyllum inophyllum Linn. (कॅलोफाइलम् आइनोफाइलम् लिन.); हिं०-सुलतानचंपा; म०-उंडी, उंडल कहते हैं। इसका बहुत सुन्दर वृक्ष दक्षिण भारत के समुद्री किनारे पर तथा अन्य स्थानों पर लगाया हुआ मिलता है। पत्ते-वड़ के पत्र जैसे लम्बगोल ४ से ६ इञ्च लम्बे तथा ३ से ४ इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-सफेद रंग के चार दल वाले और सुगंधित होते हैं। फल-गोल, १ से १ ¹/₂ इञ्च लम्बे, चिकने तथा पीले रंग के आते हैं। इसके बीजों से तैल निकालते हैं, जिसे सर्पन का तैल कहते हैं। पुन्नाग-यह मधुर, शीत सुगन्धि और पित्तनाशक है। इसका तैल पुराने संधिवात में मालिश करते हैं। खुजली तथा सर की फुन्सियों में तैल लगाते हैं। सोजाक में इस तैल को खिलाते हैं। अथ त्रिजातकं चातुर्जातकं च। तयोर्लक्षणं गुणाँश्चाह त्वगेलापत्रकैस्तुल्यैस्त्रिसुगन्धि त्रिजातकम्। नागकेशरसंयुक्तं चातुर्जातकमुच्यते ।।७२।। तद् द्वयं रोचनं रूक्षं तीक्ष्णोष्णं मुखगन्धहृत्। लघुपित्ताग्निकृद्वर्ण्यं कफवातविषापहम् ।।७३।। 'त्रिजातक' तथा 'चातुर्जातक' बोधक द्रव्य तथा उनके एकत्र गुण-दालचीनी, इलायची और तेजपात इन्हीं तीनों द्रव्यों का समभाग में योग होने से उसे 'त्रिसुगन्धि' या 'त्रिजातक' कहते हैं और यदि उन्हीं द्रव्यों में समभाग से CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ४१५ 'नागकेशर' भी मिला दी जाय तो उसे 'चातुर्जातक' कहते हैं। त्रिजातक तथा चातुर्जातक-रुचिकारक, रूक्ष, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, मुख की दुर्गन्ध को दूर करने वाले, लघु, पित्त तथा अग्निवर्धक, वर्ण्य (शरीर के रंग को उत्तम करने वाले), कफ, वात तथा विष को नष्ट करने वाले होते हैं। [७२-७३] अथ कुङ्कुमम् (केशर)। तस्य नामानि सलक्षणभेदान् गुणाँश्चाह कुङ्कुमं घृसृणं रक्तं काश्मीरं पीतकं वरम्। संकोचं पिशुनं धीरं बाह्लीकं शोणिताभिधम् ।।७४।। काश्मीरदेशजे क्षेत्रे कुङ्कुमं यद्भवेद्धि तत्। सूक्ष्मकेशरमारक्तं पद्मगन्धि तदुत्तमम् ।।७५।। वाह्लीकदेशसञ्जातं कुङ्कुमं पाण्डुरं स्मृतम्। केतकीगन्धयुक्तं तन्मध्यमं सूक्ष्मकेशरम् ।।७६।। कुङ्कुमं पारसीकं यन्मधुगन्धि तदीरितम्। ईषत्पाण्डुरवर्णं तदधमं स्थूलकेशरम् ।।७७।। कुङ्कुमं कटुकं स्निग्धं शिरोरुग्व्रणजन्तुजित्। तिक्तं वमिहरं वर्ण्यं व्यङ्गदोषत्रयापहम् ।।७८।। केशर के नाम-कुङ्कुम, घुसृण, रक्त, काश्मीर, पीतक, वर, सङ्कोच, पिशुन, धीर, वाह्लीक और शोणिताभिध (रक्तवाची सभी शब्द) ये सब केशर के संस्कृत नाम हैं। देश भेद से केशर की उत्तमता एवं उसके लक्षण-काश्मीर देश के खेतों में जो 'केशर' उत्पन्न होता है वह सूक्ष्म केशरों से युक्त, कुछ रक्त वर्ण वाला तथा कमल के समान सुन्दर गन्ध से युक्त होता है एवं वह 'उत्तम' माना जाता है। जो 'वाह्लीक' (बुखारा) देश में उत्पन्न होने वाला 'केशर' होता है वह पाण्डुर (शुक्ल तथा पीतवर्ण युक्त) वर्ण का एवं 'केतकी' के समान गंध से युक्त होता है। यह सूक्ष्म केशरों से युक्त होता है और 'मध्यम' माना जाता है। जो 'पारसीक' (फारस) देश में उत्पन्न होने वाला केशर होता है वह मधु (शहद) के समान गन्ध वाला, कुछ पाण्डुर वर्णयुक्त तथा मोटे केशरों से युक्त होता है और वह 'अधम' माना जाता है। केशर-कटु तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध और वर्ण्य (शरीर के वर्ण के लिये हितकर) होता है तथा यह शिरोरोग, व्रण, कृमि, वमन, व्यङ्ग (झाईं) तथा त्रिदोष इन सबों को नष्ट करने वाला होता है। ७४-७८ २९. केशर हिं०-केशर। म०, गु०-केशर। बं०-जाफरान। क०-कुङ्कुम। ते०-कुङ्कुम पुव। ता०-कुङ्कुमपु। फा०- करकीमास। अ०-जाफरान। अं०-Saffron (संफ्रॉन)। ले०-Crocus sativus Linn. (क्रोक्स् सेटाइवस् लिन.)। Fam. Iridaceae (हरिर्डेसी)। केशर का नैसर्गिक उत्पत्ति स्थान दक्षिण योरप है। यह स्पेन से बम्बई में बहुत आता है और भारतवर्ष के बाजारों में बिकता है। ईरान, स्पेन, फ्रान्स, इटली, ग्रीस, तुर्की, चीन और फारस आदि देशों में इसकी खेती की जाती है। हमारे देश के काश्मीर में पम्पूर (४३०० फीट) नामक स्थान पर तथा जम्मू के किश्तवाड़ में इसकी खेती की जाती है। यहाँ का उत्पन्न हुआ केशर भावप्रकाशकार की दृष्टि से सर्वोत्तम समझा गया है। इसका बहुवर्षायु क्षुप १।। फुट तक ऊँचा होता है। जड़ के नीच प्याज के समान गाँठदार कन्द (Corm) होता है। इसमें कांड नहीं होता। पत्ते-घास के समान लम्बे, पतले, पनालीदार और जड़ ही से निकले हुए मूलपत्र (Radical leaf) रहते हैं। इनके किनारे पीछे की तरफ मुड़े हुए होते हैं। आश्विन, कार्तिक में इस पर फूल आते हैं। फूल-एकाकी या गुच्छों में, नीललोहित वर्ण के, पत्तों के साथ ही शरदऋतु में आते हैं। नीचे के पत्रकोश (Spathe), पुष्पध्वज (Scape) को घेरे रहते हैं तथा दो हिस्सों में विभक्त रहते हैं। परिपुष्प (Perianth) निवापसम (Funnel-shaped), नाल (Tube) पतला, दल ६ खण्डों में विभक्त दो श्रेणियों में एवं नाल का कण्ठ श्मश्रुल (वालों से युक्त) रहता है। कण्ठ पर ३ पुंकेशर (Stamen) रहते हैं एवं परागाशय (Anther) पीतवर्ण का रहता है। कुक्षिवृन्त (Style) परिपुष्प CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

४१६ | भावप्रकाशनिघण्टुः

के बाहर निकले हुए (Exserted), नारंगरक्त रंग के, मुद्गराकार, अखण्ड या खण्डित रहते हैं। फल—सामान्य स्फोटी फल (Capsule) आयताकार एवं बीज गोल होते हैं। इन फूलों के स्त्री केशर के सूखे हुए अग्रभाग जिन्हें कुक्षि (Stigma) कहा जाता है उन्हें ही केशर कहते हैं। कुक्षि (Stigma) ३, कुक्षिवृन्त के ऊपर लगी हुई या अलग, करीब १ इञ्च लम्बी गहरे लाल से लेकर हलके रक्ताभ भूरे रंग की एवं सामान्य दन्तुर या लहरदार होती है। कुक्षिवृन्त (Styles) करीब १ से० मी० लम्बे, करीब-करीब रम्भाकार, ठोस, पीताभ भूरे से लेकर पीताभ नारंगी रंग के रहते हैं। इसमें विशिष्ट प्रकार की तीव्र सुगन्ध रहती है तथा इसका स्वाद सुगन्धित तथा कड़वापन लिये हुए होता है। केशर के पौधे को बीज या उसके कन्द द्वारा लगाया जा सकता है। साधारणतः १ एकड़ भूमि से करीब ५०- ५५ पौंड ताजा केशर प्राप्त होता है जो सूखने पर १०-११ पौंड रह जाता है। इसकी खेती तथा माल के तैयार करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता रहती है। सूर्योदय के पहले जब फूल लगभग खिलने को होते हैं तब उनको तोड़ लेते हैं। उसमें से केशर को तोड़कर छलनी में डालकर मन्द आँच पर सुखाते हैं। केशर को हमेशा प्रकाशहीन बन्द पात्र में रखना चाहिये। रासायनिक संगठन—केशर में एक स्नेहीय तैल ८-१३%, करीब १% उड़नशील तैल, एक रंगहीन कडुआ पिक्रॉक्रोसिन (Picrocrocin) नामक ग्लाइकोसाइड् एवं क्रोसेटिन (Crocetin) नामक रंजक द्रव्य का क्रोसिन (Crocin) ग्लाइकोसाइड् ये पदार्थ पाये जाते हैं। क्रोसेटिन नामक रवेदार रंजक द्रव्य ३ प्रकार का होता है। अॅल्फा क्रोसेटिन (a-crocetin, C₂₄ H₂₈ O₅) ०.७%, बीटा क्रोसेटिन (B-crocetin, C₂₅ H₃₀ O₅) ०.७%, एवं गामा क्रोसेटिन (V-crocetin, C₂₆ H₃₂ O₅) ०.३% रहता है। क्रोसिन (Crocin) यह लाल रंग का चूर्ण होता है जो जल तथा मद्यसार में आसानी से घुल जाता है। संकेन्द्रित गन्धक के तेजाब में इसका गहरे नीले रंग का घोल बनता है जो रखने पर नील लोहित, रक्त तथा अन्त में भूरे रंग का हो जाता है। शोरे के तेजाब से यह हरे रंग का हो जाता है। गुण और प्रयोग—केशर उष्ण, सुगन्धित, दीपन, पाचन, उद्वेष्टन-निरोधि, मनःप्रसादकर, रुचिकर, वर्ण्य, बल्य, कामोत्तेजक, विषघ्न, आर्तवजनक, मूत्रल एवं अल्प वेदनाहर है। आमाशयोत्तेजक एवं उद्वेष्टननिरोधि गुणों के लिये यह बहुत प्रसिद्ध है तथा यह श्रेष्ठ उत्तेजक एवं वृष्य औषध मानी जाती है। यह वातनाड़ियों के लिये शामक है। सुगन्धित रञ्जक द्रव्य के रूप में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। इसके उड़नशील तैल में अन्य उड़नशील तैलों की तरह ही गुण होते हैं। इसका उपयोग अतिसार, शूल, मूत्रकृच्छ्र, अनार्तव, पीडितार्तव, कास, श्वास, कण्ठरोग, यकृतविकार, आमवात, नाड़ीशूल एवं शिरोरोगों में किया जाता है। (१) पीडितार्तव में इसको पूर्ण मात्रा में देने से शूल कम होता है तथा आर्तव स्राव ठीक होने लगता है। गर्भाशय के पीड़ा युक्त विकारों में इसकी गोली योनि में धारण कराई जाती है। स्तनों पर इसके लेप से दूध बढ़ता है। (२) मूत्राघात में १ तोला केशर मधुयुक्त जल में रात में भिगो कर सुबह उसे पिलाने से लाभ होता है। (सु. उ. अ. ५८-३०) (३) बच्चों की सरदी में गरम दूध में केशर खिलाते हैं तथा ललाट एवं छाती पर लगाते हैं। (४) केसर तथा शर्करा को घृत में भून कर उसके नस्य से सूर्यावर्त एवं अर्धावभेदक आदि में लाभ होता है। शिरःशूल में इसे मस्तक पर लगाते हैं।

कर्पूरादिवर्गः ४१७ (५) मसूरिका तथा रोमान्तिका आदि में दाने बाहर निकालने के लिये इसे देते हैं। (६) बच्चों के अतिसार, आध्मान तथा उदरशूल में इसे खिलाते हैं तथा पेट पर लगाते हैं। प्रमाप तथा परीक्षा-केशर बहुमूल्य होने के कारण इसमें अनेक चीजों की मिलावट रहती है, इसलिये इसको अच्छी तरह परीक्षा कर खरीदना चाहिये। कुछ परीक्षाएँ यहाँ दी जा रही हैं। स्पिरिट में केशर डालने पर यद्यपि स्पिरिट रंगीन हो जाता है तथापि केशर के तन्तु अपने प्राकृतिक रंग में ही रहते हैं। इसे गन्धक के तेजाब (Sulphuric acid) में डालने से गहरा नीला रंग उत्पन्न होता है। जल में घुलनशील पदार्थ ५८% से कम न हों। मद्यसार (९०%) में घुलनशील पदार्थ ६०% से कम न हों। राख ७.५०% से अधिक न हो। १००° उष्णता पर सुखाने से १४% से अधिक वजन कम न हो। कुक्षिवृन्त (Styles) १०% से अधिक न हों। इतर ऑर्गेनिक द्रव्य २% से अधिक न हों। रंग की तीव्रता-इसको ०.०२ ग्राम की मात्रा में १०० सी० सी० जल में मिलाने पर पीत वर्ण का घोल बनता है जिसके रंग की तीव्रता ०.१% पोटैशियम् डाइक्रोमेट (Potassium dichromate) के घोल के समान या उससे कम नहीं होनी चाहिये। व्यामिश्रण-इसमें केशर पुष्प के ही कुक्षिवृन्त, पुंकेशर, आभ्यन्तर कोश एवं गेंदा (कॅलेण्डुला ऑफिसिनेलिस्) के मेथिल् आरेञ्ज के द्वारा रंगे हुये पुष्प, कुसुम पुष्प के केशर तथा एक बीज पत्रीय पुष्प आदि मिलाये रहते हैं। कभी- कभी सत्त्व निकाला हुआ केसर रंग करके बेचा जाता है। केसर का वजन बढ़ाने के लिये जल, तैल, शर्करा, ग्लूकोज, ग्लिसरीन तथा पोटैशियम् या अमोनियम् नाइट्रेट के घोल आदि का उपयोग करते हैं। मात्रा-२-४ रत्ती। अथ गोरोचना। तस्या नामानि गुणांश्चाह गोरोचना तु मङ्गल्या वन्द्या गौरी च रोचना। गोरोचना हिमा तिक्ता वश्या मङ्गलकान्तिदा। विशालक्ष्मीग्रहोन्मादगर्भस्रावक्षतासुहृत् ।।७९।। गोरोचना के नाम तथा गुण-गोरोचना, मङ्गल्या, वन्द्या, गौरी और रोचना ये सब गोरोचन के संस्कृत नाम हैं। गोरोचन-शीतवीर्य, तिक्तरस युक्त, वश्य (वशीकारक), मङ्गल तथा कान्ति को बढ़ाने वाला एवं विष, अलक्ष्मी (दरिद्रता), ग्रहबाधा, उन्माद (पागलपन), गर्भस्राव तथा क्षतज रक्तस्राव को दूर करने वाला होता है। [७९] ३०. गोलोचन हिं०-गोलोचन, गोरोचन। बं०-गोरोचना। म०-गोरोचन। गु०-गोरूचन्दन, गोरोचन। ते०-गोरोचनमु। ता०-गोरोचनम्। फा०-संगगाव। अ०-इजरुल् बक्कर। अं०-Gall-stone (गॉल-स्टोन); Serpent stone (सर्पेण्ट स्टोन)। ले०-Bezoar (बेझ़ोर)। गाय अथवा बैल के पित्ताशय में से अश्मरी के समान सुपारी से लेकर नींबू तक का गोल अथवा कुछ गोलाई लिये त्रिकोणाकार जो पदार्थ निकलता है उसको गोरोचन कहते हैं। यह ऊपर से कुछ मटमैला पीला और तोड़ने पर भीतर से पर्तदार पीले रंग का होता है। यह कठोर नहीं, कुछ मुलायम होता है। किसी-किसी का रंग नारंगी या लाली युक्त होता है। इसी प्रकार किसी-किसी बकरी और ऊँट के पेट से भी कंकड़ी निकलती है, 'कुछ ग्रन्थों में गाय के मस्तक का पित्त गोरोचन है' ऐसा उल्लेख मिलता है। हाथी के मस्तक में मिलने वाली गजमुक्ता और सर्प के फण में मिलने वाली मणि के सादृश्य के लिए गो-मस्तक से इसकी उत्पत्ति की परिकल्पना की गई होगी। इसका स्वाद कुछ कड़वा होता है तथा इसमें कुछ सुगन्ध भी होती है। औषध के अतिरिक्त तंत्र शास्त्र में मोहन तथा वशीकरण के लिये इसका पर्याप्त उपयोग किया जाता है। गोपित्त में कुछ पदार्थों का मिश्रण कर बनाया हुआ नकली गोरोचन भी बिकता है। ३० भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४१८ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग- गोरोचन शीतल, सुगन्धि, मृदु विरेचक, तिक्त, श्वित्रहर, मूत्रल, अश्मरीघ्न, बृंहण, आर्तवजनक एवं विषहर है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतंत्रक, आक्षेप, रोमान्तिका, मसूरिका, कुकास, अतिसार, कफज्वर, कामला, पाण्डु, गर्भस्राव, पित्त की न्यूनता एवं आन्त्रिक विकार आदि में किया जाता है। (१) अपस्मार में इसको २ माशे की मात्रा में गुलाब जल में घिस कर पिलाने से पुनराक्रमण नहीं होता, ऐसा हकीम मानते हैं। यूनानी में इसका लेप श्वित्र, चेहरे के काले दाग, चर्म रोग तथा नेत्र के जाले में लाभदायक मानते हैं। (२) मसूरिका आदि में उष्णता कम करने के लिये इसको खिलाया जाता है। (३) बच्चों के अतिसार, कुकास एवं हरे दस्त आना आदि में इसको खिलाने से लाभ होता है। मात्रा- १-२ रत्ती। नोट- पाश्चात्य चिकित्सा में गोपित्त को शुद्ध करके व्यवहार करने की पद्धति है। गोरोचन के स्थान में उसका प्रयोग करना उचित नहीं है। प्रसंगतः उसका भी वर्णन यहाँ किया गया है। ले०- Extroctum fellis bovini (एक्स्टॅक्टम् फेलिस् बोह्विनि)। अं०- Purified Ox-Gall (प्युरिफाइड ऑक्स-गॉल)। हिं०- गौ या बैल का शुद्ध पित्त, जहरमोहरा। ताजे पित्त को सुखाकर जब चतुर्थांश शेष रहे तो उसमें मद्यसार (९०%) मिलाकर छानकर गोली बनाने लायक हो उतना सुखा लें। इसमें पित्त के लवण तथा रञ्जक पदार्थ पाये जाते हैं। यह गहरे पीताभ हरे रंग का लचीला पदार्थ होता है। इसका स्वाद कडुवा तथा अरुचिकर होता है। यह जल तथा मद्यसार दोनों में घुल जाता है। इसको विशिष्ट आवरण युक्त गोलियों के रूप में भोजन के २ घण्टे पश्चात् प्रयोग करते हैं। गुण और प्रयोग- यह कड़वा पदार्थ होते हुये भी वानस्पतिक कड़वे पदार्थों के उतना अच्छा दीपन पदार्थ नहीं है। इससे पित्त का स्राव ठीक होने लगता है। जिनमें पित्त का उचित स्राव न होने के कारण अपचन तथा विबन्ध रहता है उनमें इसका उपयोग करते हैं। यह अग्न्याशय के स्नेह पाचक स्रावों को बढ़ाता है तथा स्नेह द्रव्यों के प्रचूषण में सहायक होता है। स्नेह द्रव्यों का प्रचूषण ठीक होने के कारण उसमें घुलने वाले जीवतिक्ति (हिटामिन) 'ए', 'डि' तथा 'के' का भी ठीक प्रचूषण होता है। रक्तस्राव की अवस्था में रक्त को जमाने वाले पदार्थों में से रक्त में प्रोथ्राँबिन (Prothrombin) के निर्माण के लिये हिटामिन् 'के' की बहुत आवश्यकता रहती है। जब मल बहुत कड़ा हो जाता है तब इसको २०-३० ग्रेन की मात्रा में १ या २ औंस जल में घोल कर पिचकारी द्वारा बस्ति के रूप में देते हैं। मात्रा- ५-१५ ग्रेन। अथ नखं नखी च (गन्धद्रव्यम्) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह नखं व्याघ्रनखं व्याघ्रायुधं तच्चक्रकारकम् ।।८०।। नखं स्वल्पं नखी प्रोक्ता हनुर्हट्टविलासिनी। नखद्वयं ग्रहश्लेष्मवातास्रज्वरकुष्ठहृत् ।।८१।। लघूष्णं शुक्रलं वर्ण्यं स्वादु व्रणविषापहम्। अलक्ष्मीमुखदौर्गन्ध्यहृत्पाकरसयोः कटु ।।८२।। सुगन्धि द्रव्य नख तथा नखी के नाम तथा गुण- नख, व्याघ्रनख, व्याघ्रायुध और चक्रकारक ये सब संस्कृत नाम नख के हैं और दूसरा छोटा नख होता है उसे नखी कहते हैं उसके संस्कृत नाम-हनु तथा हट्टविलासिनी ये दो हैं। दोनों प्रकार के नख- ग्रहबाधा, कफ, वात, रक्तविकार (किंवा वातरक्त), ज्वर तथा कुष्ठ रोग को दूर करते हैं एवं लघु, उष्ण वीर्य, शुक्रजनक, वर्णकारक, स्वादिष्ट, व्रण तथा विषनाशक एवं अलक्ष्मी (दरिद्रता) तथा मुख का दुर्गन्ध को हरण करने वाले, पाक एवं एवं रस में कटु रसयुक्त होते हैं। [८०-८२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA