भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ४०५ बड़ी इलायची के नाम तथा गुण-एला, स्थूला, बहुला, पृथ्वीका, त्रिपुटा, भद्रैला, बृहदेला, चन्द्रबाला, निष्कुटि तथा स्थूलैला ये सब संस्कृत नाम 'बड़ी इलायची' के हैं। बड़ी इलायची-पाक तथा रस (स्वाद) में कटु होती है एवं अग्निजनक, लघु, रूक्ष और उष्णवीर्य होती है। यह कफ, पित्त, रक्तविकार, कण्डू (खुजली), श्वास, तृषा, हृल्लास (वमन मालूम पड़ना अर्थात् जी मिचलाना), विष एवं बस्ति, मुख तथा शिर सम्बन्धी रोग, वमन तथा खाँसी को दूर करने वाली होती है। [६०-६२] २३. बड़ी इलायची हिं०-बड़ी इलायची, पूर्वी इलायची, लाल इलायची। बं०-बड़ा इलाची। म०-मोठी एलची, मोठे वेलदोड़े । गु०-एलचा, मोटी एलची। ते०-पेद्दायेलाकी। ता०-पेरेलम, पेरिय एलक्वे। क०-डोड्डा एलाकी। फा०- हीलकलाँ। अ०-काकुले कुबार, काकुले जंजी। अं०-Nepal or Greater Cardamom (नेपाल या ग्रेटर कार्डेमोम्); Amomum (अॅमोमम्)। ले०-Amomum subulatum Roxb. (एमोमम् सबुलॅटम् राक्स)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेॅसी)। इसकी खेती नेपाल, बंगाल, सिक्किम तथा आसाम के पहाड़ी भागों के पास में गीली भूमि में की जाती है। इसका क्षुप-आमा हलदी के समान होता है और उसकी जड़ के नीचे कन्द रहता है। पत्रदण्ड-३-४ फुट ऊँचा होता है। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े, आयताकार-भालाकार, हरे एवं चिकने होते हैं। फूल-अवन्तकाण्डज व्यूहों (Spike) में नलिकाकार सफेद रङ्ग के आते हैं। फल-किञ्चित् लम्बाई लिये गोल, १ इञ्च तक लम्बे तथा लाल भूरे रङ्ग के होते हैं। बीज-शर्करायुक्त गाढ़े गूदे के कारण आपस में चिपके हुए अनेक बीज प्रत्येक कोष में होता हैं। बड़ी इलायची की बहुत-सी उपजातियाँ भारतवर्ष में पाई जाती हैं जिनमें से (ले०) अमोमम् ॲरोमॅटिकम् राक्स (Amomum aromaticum Roxb.); हिं०, बं०-मोरंग इलायची पूर्वी बंगाल तथा आसाम के आस-पास बहुत उत्पन्न होती है। यह बंगाल कार्डेमोम् (Bengal Cardamom) नाम से भी कही जाती है। हिमालय की तराई में आसाम तथा बंगाल के आर्द्र प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है। इसके क्षुप-के २-३ फीट लम्बे काण्ड, राइजो़म से एक साथ गुच्छों में निकलते हैं। पुष्प-हलके पीले रंग के अवृन्तकाण्डज व्यूहों में निकलते हैं। फल-अभिअण्डाकार या लट्वाकार करीब बड़े जायफल के इतने बड़े कुछ खुरदरे तथा ३ हिस्सों में विभक्त होते हैं। बीज-प्रत्येक कोष में अनेक तथा करीब ३ मि० मि० लम्बे होते हैं। रासायनिक संगठन-बड़ी इलायची में एक हलके पीले रंग का उड़नशील तैल पाया जाता है। इस तैल में सिनिओल् (Cineol) नामक पदार्थ बहुत रहता है। गुण और प्रयोग-यह किंचित् उष्ण, पाचक, सुगन्धित, उत्तेजक एवं वातानुलोमक है। इसके गुण छोटी इलायची के सदृश हैं तथा उसके प्रतिनिधि रूप में इसका व्यवहार किया जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में बड़ी एला का बहुत कम प्रयोग किया गया है। इलायची के स्थान में हमेशा छोटी इलायची का ही प्रयोग करना चाहिये जबतक कि विशेष रूप से बड़ी इलायची के लेने का निर्देश न हो। अनेक कड़वी, उत्तेजक तथा विरेचक औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इसके तैल का उपयोग सुगन्ध के लिये करते हैं। मन्दाग्नि, आध्मान, शूल, अतिसार, यकृतशोथ तथा मूत्रकृच्छ्र में इसका उपयोग किया जाता है। (१) दाँत तथा मसूढ़ों के विकारों में इसके क्वाथ से कुल्ला कराया जाता है। (२) पाचन संस्थान के कुछ विकारों में जिनमें आन्त्रिक स्राव गाढ़े तथा कम हो जाते हैं इसको ५ रत्ती की मात्रा में खिलाते हैं। इससे पित्त का स्राव ठीक होकर यकृतशोथ कम होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA