भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(३) मूत्रल औषध के रूप में अश्मरी में इसको खरबूजे के बीज के साथ खिलाते हैं। (४) नाड़ीशूल में २ माशे की मात्रा में इसको क्विनीन के साथ देने से लाभ होता है। मात्रा-५-१५ रत्ती। अथैला (गुजराती इलायची) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह सूक्ष्मोपकुञ्चिका तुत्था कोरङ्गी द्राविडी त्रुटिः। एला सूक्ष्मा कफश्वासकासार्शोमूत्रकृच्छ्रहृत् । रसे तु कटुका शीता लघ्वी वातहरी मता ।। ६३ ।। छोटी इलायची (गुजराती इलायची) के नाम तथा गुण-सूक्ष्मा, उपकुञ्चिका, तुत्था, कोरङ्गी, द्राविडी, त्रुटि तथा सूक्ष्मैला ये सब 'छोटी इलायची' के संस्कृत नाम हैं। छोटी इलायची-कफ, श्वास, कास, अर्श (बवासीर) और मूत्रकृच्छ्र इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है तथा कटु रसयुक्त, शीतवीर्य, लघु एवं वातनाशक होती है। [६३] २४. छोटी इलायची हिं०-छोटी इलायची, गुजराती, इलायची, चौहरा इलायची, सफेद इलायची। बं०-छोट इलायच। गु०- एलची कागदी, एलची, मलवारी एलची। म०-बारीक वेलदोड़े, एलची। ते०-एलाक्तिक। ता०-एलाक्के, चिन्न एलं। मा०-छोटी इलायची। क०-एलाक्तिक। फा०-हीलबवा, हील, खैरबवा, इलायची खुर्द, हीलउन्सा। अ०- काकुलह सिगार, शूशमीर। अं०-(कार्डेमोम् फ्रूट); (Lesser Cardamom) (लेसर कार्डेमोम्)। ले०-(Elettaria cardamomum Maton) (इलेट्टेरिआ कार्डेमोमम् मेटन)। Fam. Zingiberaceae (झिंजीबेरेसी)। यह पश्चिम तथा दक्षिण भारत में, कनारा, मैसूर, कुर्ग, वैनाड, ट्रावंकोर तथा कोचीन में आर्द्र पहाड़ी जंगलों में उत्पन्न होती है। सीलोन तथा दक्षिणी प्रायद्वीप के चाय, कॉफी एवं रबर के बगानों में इसकी खेती की जाती हैं। वर्मा के जंगलों में भी यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-अदरख के क्षुप के समान तथा बहुवर्षायु होता है और इसकी जड़ के नीचे मोटा, मांसक तथा अनुप्रस्थ फैला हुआ राइजोम (मौमिक काण्ड) रहता है। राइजोम से ८-२० की संख्या में सीधे, चिकने, हरे रंग के चमकीले तथा ६-९ फीट ऊँचे काण्ड निकलते रहते हैं जिन पर एकान्तरित पत्र लगे होते हैं। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३ इञ्च तक चौड़े, आयताकार-भालाकार तथा कोषाकार होते हैं। पुष्पखण्ड-कांड के आधार भाग से १-२ फीट लम्बा पुष्पखण्ड निकला रहता है जो जमीन पर फैला रहता है। पुष्प-पुष्पव्यूहों में तथा किंचित् नील लोहिताभ वर्णयुक्त छोटे-छोटे होते हैं। पंखड़ियों के ओष्ठ श्वेत होते हैं। फल-हलके पीले या हरिताभ पीत रङ्ग के, १-२ से० मि० लम्बे, अण्डाकार, बड़े फल कुछ तिकोने, ३ कोषवाले, अनेक महीन खड़ी धारियों से युक्त सामान्य स्फोटी फल (Capsule) होते हैं जिनका स्फुटन पाष्ठिक सन्धियों (Loculicidal) पर होता है। बीज-फलों के अन्दर अनेक छोटे बीज होते हैं जो प्रत्येक कोष में दो-दो कतारों में एवं अक्षलग्न जरायु से लगे हुए एक साथ रहते हैं। यह हलके या गहरे रक्ताभ भूरे रङ्ग के, ४ मि० मि० लम्बे, ३ मि० मि० चौड़े, अनियमित कोण युक्त, कड़े एवं ६-८ आड़ी झुर्रियों (Rugae-रूगी) से युक्त होते हैं। प्रत्येक बीज महीन वर्णहीन आवरण (Aril-ॲरिल्) से युक्त रहता है। इसका स्वाद कुछ कटु तथा शीतल एवं गन्ध मनोहर होती है। इलायची के प्रयोग के समय ही उसके बीजों को निकालना चाहिये। निकाल कर रखे हुए बीज खराब हो जाते हैं। भेद-(१) मैसूरी इलायची ही अधिकतर बिकती है। यह अण्डाकार, १०-२० मि० मि० लम्बी, हलके क्रीम के रंग की, करीब-करीब चिकनी तथा मजबूत रहती है। यह मलाबारी इलायची की अपेक्षा अधिक टिकाऊ रहती है।