भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका उपयोग उदरशूल, आध्मान, अजीर्ण, कास, तृष्णा, वमन, विसूचिका, क्षय तथा सुगन्धित पदार्थ के रूप में मसाले आदि में किया जाता है। (१) लौंग के फांट (४० में १) को १ से २ तोला की मात्रा में विसूचिका में प्यास की शान्ति के लिये देते हैं। इससे जी मिचलाना भी कम होता है तथा वमन कम हो जाता है। गर्भिणीवमन में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाया जाता है। (२) अजीर्ण, आध्मान एवं उदरशूल आदि में इसका फांट या चूर्ण खिलाया जाता है। (३) गले की सूजन, कुकास, काँस, मुख एवं श्वास की दुर्गन्ध तथा जी मिचलाना आदि में लौंग दिये पर भून कर या उसी तरह मुख में रख कर चूसते हैं। इससे मसूड़े मजबूत होते हैं। (४) प्रतिश्याय एवं मस्तकशूल में लौंग को गरम जल में घिस कर ललाट पर लगाते हैं। लौंग का तैल—इसके गुण भी लौंग के समान ही होते हैं। इसका उत्सर्ग वृक्क, चर्म, श्वसनसंस्थान, आंत्र तथा यकृत् आदि से होता है। चरक-सुश्रुत में इसका उल्लेख नहीं मिलता। सिगरेट के लिये प्रयुक्त तम्बाकू को सुगन्धित करने के लिये जावा, सुमात्रा तथा जापान आदि स्थानों में इसका उपयोग किया जाता है। अनेक औषधों को सुगन्धित करने के लिये तथा विरेचक औषधों के साथ मरोड़ आदि न हो इसलिये इसका उपयोग करते हैं। मच्छर भगाने के लिये सोते समय इसे थोड़ा सा खुले अंगों पर लगा देने से मच्छर नहीं काटते। तैलों को सुगन्धित करने के लिये तथा पदार्थ संरक्षण के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। इसका बाह्य प्रभाव कपूर के सदृश होता है। यह स्थानिक उत्तेजक, स्वरागकारक, प्रतिक्षोभक, अल्पवेदनाहर, कृमिघ्न, सड़न को रोकने वाला एवं प्रतिदूषक है। (१) मिश्री पर डाल कर या गोंद के साथ मिश्रण के रूप में इसको आन्त्रिकशूल तथा आध्मान में खिलाते हैं। (२) क्षयजकास में कफ कम करने के लिये इसको खिलाते हैं। (३) दन्तशूल में दाँत के गढ़े में इसका फाहा रखने से बहुत लाभ होता है। सन्धिपीड़ा, गृध्रसी, कटिशूल एवं वातनाड़ीशूल आदि में इसको लगाया जाता है। तिलाओं में इसका प्रयोग किया जाता है। प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण—बाजार में तैल निकाली हुई लौंग भी बिकती है। इसे नख से दबाने पर तैल नहीं निकलता तथा उबले जल में डालने पर हय तैरती है एवं इसका रंग भी कुछ हलका रहता है। लौंग के चूर्ण में डंठल के टुकड़े का चूर्ण मिला दिया जाता है। लौंग के पक्व फल भी मदरक्लोव्हस (Mother cloves) नाम से बिकते हैं लेकिन उनमें तैल बहुत कम रहता है तथा उनके बीज में रहने वाले बड़े स्टार्च के कण से इनकी पहचान की जा सकती है। टूटे हुए पुंकेसर, अन्तर्दल एवं विकसित फूल जिनके पुंकेसर एवं अन्तर्दल निकाल लिये गये हों इनका मिश्रण लौंग के चूर्ण में व्यापारी कर देते हैं। लौंग में १५% से कम तैल नहीं होना चाहिये। मात्रा—चूर्ण १-२ १/२ रत्ती; तैल १-३ बूँद। अथ स्थूलैला (बड़ी इलायची) तस्या नामानि गुणाँश्चाह एला स्थूला च बहुला पृथ्वीका त्रिपुटाऽपि च ।। ६० ।। भद्रैला बृहदेला च चन्द्रबाला च निष्कुटिः । स्थूलैला कटुका पाके रसे चानलकृल्लघुः १ ।। ६१ ।। रूक्षोष्णा श्लेष्मपित्तास्रकण्डूश्वासतृषाऽपहा । हल्लासविषबस्त्यास्यशिरोरुग्वमिकानुत ।। ६२ ।। १. 'चानिलकृल्लघुः' इति पाठा० अशुद्धम् ।