भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ४१७ (५) मसूरिका तथा रोमान्तिका आदि में दाने बाहर निकालने के लिये इसे देते हैं। (६) बच्चों के अतिसार, आध्मान तथा उदरशूल में इसे खिलाते हैं तथा पेट पर लगाते हैं। प्रमाप तथा परीक्षा-केशर बहुमूल्य होने के कारण इसमें अनेक चीजों की मिलावट रहती है, इसलिये इसको अच्छी तरह परीक्षा कर खरीदना चाहिये। कुछ परीक्षाएँ यहाँ दी जा रही हैं। स्पिरिट में केशर डालने पर यद्यपि स्पिरिट रंगीन हो जाता है तथापि केशर के तन्तु अपने प्राकृतिक रंग में ही रहते हैं। इसे गन्धक के तेजाब (Sulphuric acid) में डालने से गहरा नीला रंग उत्पन्न होता है। जल में घुलनशील पदार्थ ५८% से कम न हों। मद्यसार (९०%) में घुलनशील पदार्थ ६०% से कम न हों। राख ७.५०% से अधिक न हो। १००° उष्णता पर सुखाने से १४% से अधिक वजन कम न हो। कुक्षिवृन्त (Styles) १०% से अधिक न हों। इतर ऑर्गेनिक द्रव्य २% से अधिक न हों। रंग की तीव्रता-इसको ०.०२ ग्राम की मात्रा में १०० सी० सी० जल में मिलाने पर पीत वर्ण का घोल बनता है जिसके रंग की तीव्रता ०.१% पोटैशियम् डाइक्रोमेट (Potassium dichromate) के घोल के समान या उससे कम नहीं होनी चाहिये। व्यामिश्रण-इसमें केशर पुष्प के ही कुक्षिवृन्त, पुंकेशर, आभ्यन्तर कोश एवं गेंदा (कॅलेण्डुला ऑफिसिनेलिस्) के मेथिल् आरेञ्ज के द्वारा रंगे हुये पुष्प, कुसुम पुष्प के केशर तथा एक बीज पत्रीय पुष्प आदि मिलाये रहते हैं। कभी- कभी सत्त्व निकाला हुआ केसर रंग करके बेचा जाता है। केसर का वजन बढ़ाने के लिये जल, तैल, शर्करा, ग्लूकोज, ग्लिसरीन तथा पोटैशियम् या अमोनियम् नाइट्रेट के घोल आदि का उपयोग करते हैं। मात्रा-२-४ रत्ती। अथ गोरोचना। तस्या नामानि गुणांश्चाह गोरोचना तु मङ्गल्या वन्द्या गौरी च रोचना। गोरोचना हिमा तिक्ता वश्या मङ्गलकान्तिदा। विशालक्ष्मीग्रहोन्मादगर्भस्रावक्षतासुहृत् ।।७९।। गोरोचना के नाम तथा गुण-गोरोचना, मङ्गल्या, वन्द्या, गौरी और रोचना ये सब गोरोचन के संस्कृत नाम हैं। गोरोचन-शीतवीर्य, तिक्तरस युक्त, वश्य (वशीकारक), मङ्गल तथा कान्ति को बढ़ाने वाला एवं विष, अलक्ष्मी (दरिद्रता), ग्रहबाधा, उन्माद (पागलपन), गर्भस्राव तथा क्षतज रक्तस्राव को दूर करने वाला होता है। [७९] ३०. गोलोचन हिं०-गोलोचन, गोरोचन। बं०-गोरोचना। म०-गोरोचन। गु०-गोरूचन्दन, गोरोचन। ते०-गोरोचनमु। ता०-गोरोचनम्। फा०-संगगाव। अ०-इजरुल् बक्कर। अं०-Gall-stone (गॉल-स्टोन); Serpent stone (सर्पेण्ट स्टोन)। ले०-Bezoar (बेझ़ोर)। गाय अथवा बैल के पित्ताशय में से अश्मरी के समान सुपारी से लेकर नींबू तक का गोल अथवा कुछ गोलाई लिये त्रिकोणाकार जो पदार्थ निकलता है उसको गोरोचन कहते हैं। यह ऊपर से कुछ मटमैला पीला और तोड़ने पर भीतर से पर्तदार पीले रंग का होता है। यह कठोर नहीं, कुछ मुलायम होता है। किसी-किसी का रंग नारंगी या लाली युक्त होता है। इसी प्रकार किसी-किसी बकरी और ऊँट के पेट से भी कंकड़ी निकलती है, 'कुछ ग्रन्थों में गाय के मस्तक का पित्त गोरोचन है' ऐसा उल्लेख मिलता है। हाथी के मस्तक में मिलने वाली गजमुक्ता और सर्प के फण में मिलने वाली मणि के सादृश्य के लिए गो-मस्तक से इसकी उत्पत्ति की परिकल्पना की गई होगी। इसका स्वाद कुछ कड़वा होता है तथा इसमें कुछ सुगन्ध भी होती है। औषध के अतिरिक्त तंत्र शास्त्र में मोहन तथा वशीकरण के लिये इसका पर्याप्त उपयोग किया जाता है। गोपित्त में कुछ पदार्थों का मिश्रण कर बनाया हुआ नकली गोरोचन भी बिकता है। ३० भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA