भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 469, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 469

४१८ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग- गोरोचन शीतल, सुगन्धि, मृदु विरेचक, तिक्त, श्वित्रहर, मूत्रल, अश्मरीघ्न, बृंहण, आर्तवजनक एवं विषहर है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतंत्रक, आक्षेप, रोमान्तिका, मसूरिका, कुकास, अतिसार, कफज्वर, कामला, पाण्डु, गर्भस्राव, पित्त की न्यूनता एवं आन्त्रिक विकार आदि में किया जाता है। (१) अपस्मार में इसको २ माशे की मात्रा में गुलाब जल में घिस कर पिलाने से पुनराक्रमण नहीं होता, ऐसा हकीम मानते हैं। यूनानी में इसका लेप श्वित्र, चेहरे के काले दाग, चर्म रोग तथा नेत्र के जाले में लाभदायक मानते हैं। (२) मसूरिका आदि में उष्णता कम करने के लिये इसको खिलाया जाता है। (३) बच्चों के अतिसार, कुकास एवं हरे दस्त आना आदि में इसको खिलाने से लाभ होता है। मात्रा- १-२ रत्ती। नोट- पाश्चात्य चिकित्सा में गोपित्त को शुद्ध करके व्यवहार करने की पद्धति है। गोरोचन के स्थान में उसका प्रयोग करना उचित नहीं है। प्रसंगतः उसका भी वर्णन यहाँ किया गया है। ले०- Extroctum fellis bovini (एक्स्टॅक्टम् फेलिस् बोह्विनि)। अं०- Purified Ox-Gall (प्युरिफाइड ऑक्स-गॉल)। हिं०- गौ या बैल का शुद्ध पित्त, जहरमोहरा। ताजे पित्त को सुखाकर जब चतुर्थांश शेष रहे तो उसमें मद्यसार (९०%) मिलाकर छानकर गोली बनाने लायक हो उतना सुखा लें। इसमें पित्त के लवण तथा रञ्जक पदार्थ पाये जाते हैं। यह गहरे पीताभ हरे रंग का लचीला पदार्थ होता है। इसका स्वाद कडुवा तथा अरुचिकर होता है। यह जल तथा मद्यसार दोनों में घुल जाता है। इसको विशिष्ट आवरण युक्त गोलियों के रूप में भोजन के २ घण्टे पश्चात् प्रयोग करते हैं। गुण और प्रयोग- यह कड़वा पदार्थ होते हुये भी वानस्पतिक कड़वे पदार्थों के उतना अच्छा दीपन पदार्थ नहीं है। इससे पित्त का स्राव ठीक होने लगता है। जिनमें पित्त का उचित स्राव न होने के कारण अपचन तथा विबन्ध रहता है उनमें इसका उपयोग करते हैं। यह अग्न्याशय के स्नेह पाचक स्रावों को बढ़ाता है तथा स्नेह द्रव्यों के प्रचूषण में सहायक होता है। स्नेह द्रव्यों का प्रचूषण ठीक होने के कारण उसमें घुलने वाले जीवतिक्ति (हिटामिन) 'ए', 'डि' तथा 'के' का भी ठीक प्रचूषण होता है। रक्तस्राव की अवस्था में रक्त को जमाने वाले पदार्थों में से रक्त में प्रोथ्राँबिन (Prothrombin) के निर्माण के लिये हिटामिन् 'के' की बहुत आवश्यकता रहती है। जब मल बहुत कड़ा हो जाता है तब इसको २०-३० ग्रेन की मात्रा में १ या २ औंस जल में घोल कर पिचकारी द्वारा बस्ति के रूप में देते हैं। मात्रा- ५-१५ ग्रेन। अथ नखं नखी च (गन्धद्रव्यम्) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह नखं व्याघ्रनखं व्याघ्रायुधं तच्चक्रकारकम् ।।८०।। नखं स्वल्पं नखी प्रोक्ता हनुर्हट्टविलासिनी। नखद्वयं ग्रहश्लेष्मवातास्रज्वरकुष्ठहृत् ।।८१।। लघूष्णं शुक्रलं वर्ण्यं स्वादु व्रणविषापहम्। अलक्ष्मीमुखदौर्गन्ध्यहृत्पाकरसयोः कटु ।।८२।। सुगन्धि द्रव्य नख तथा नखी के नाम तथा गुण- नख, व्याघ्रनख, व्याघ्रायुध और चक्रकारक ये सब संस्कृत नाम नख के हैं और दूसरा छोटा नख होता है उसे नखी कहते हैं उसके संस्कृत नाम-हनु तथा हट्टविलासिनी ये दो हैं। दोनों प्रकार के नख- ग्रहबाधा, कफ, वात, रक्तविकार (किंवा वातरक्त), ज्वर तथा कुष्ठ रोग को दूर करते हैं एवं लघु, उष्ण वीर्य, शुक्रजनक, वर्णकारक, स्वादिष्ट, व्रण तथा विषनाशक एवं अलक्ष्मी (दरिद्रता) तथा मुख का दुर्गन्ध को हरण करने वाले, पाक एवं एवं रस में कटु रसयुक्त होते हैं। [८०-८२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA