भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 470, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ४१९ ३१. नख-नखी हिं०-नख, नखी, छोटा नख। बं०-नखी गन्ध द्रव्य, छोटा नखी। म०-नखला, बाघनख। ते०- नखमुचिप्प। गु०-नखला, सावजना नख। क०-नख बाधनख। फा०-नाखून पर्य्या। अ०-अजफारुतिब, इकलिलुलमुलुक। अं०-Land snail (लेंड स्नेल)। ले०-Helix aspera (हेलिक्स ॲस्पेरा); Achatina fulica (अॅर्चटिना फूलिका)। नख एक सुगन्धि द्रव्य है। यद्यपि इसे नख, व्याघ्रनख आदि नाम दिये गये हैं तथापि यह किसी जानवर का नाखून नहीं है। यह एक प्रकार के सीप की जाति के समुद्री जीव के मुख के ऊपर का आवरण है जो नख सदृश होने के कारण नख कहा जाता है। भावप्रकाशकार ने इनके दो भेद लिखे हैं। बड़े को नख या व्याघ्रनख तथा छोटे को नखी लिखा है। अन्य ग्रन्थों में नखी के आकृति के अनुसार पाँच भेद लिखे हैं। बेर के पत्ते के सदृश, कमलदल सदृश, कमलदल सदृश, घोड़े के खुर की आकृति के, हाथी के कान के समान आकार वाले तथा सुअर के कान के समान ये पाँच प्रकार होते हैं। इनमें से सुअर के कान के समान निषिद्ध माना गया है। कुछ लोगों ने हाथी के कान सदृश और घोड़े के खुर के समान आकृति वाले नख का उपयोग गन्धयोगों में तथा बेर या कमलदल सदृश नख का उपयोग धूपन में बंतलाया है। यह गहरे भूरे रंग का तथा अनेक पटलों से बना हुआ कठोर, अपारदर्शक तथा नख के सदृश होता है। इसके उन्नतोदर पृष्ठ पर परत साफ दिखलाई देते हैं। इसको जलाने से दुर्गन्ध आती है लेकिन तैल के साथ पकाने से तैल सुगन्धित होता है। अन्य ग्रन्थों में इसके शोधन का विधान मिलता है। भैंस के गोबरयुक्त जल, तिन्तिड़ी जल या मृत्तिकायुक्त जल के साथ स्वेदन करके, प्रक्षालन करने के पश्चात् भून कर गुडहरीतकी मिले जल में बुझाते हैं। फिर पीस कर उपयोग में लाते हैं। चरक में प्रायोगिक धूम्रपान की वर्ति के योग में (सू० अ० ५ श्लो० २०), श्वयथुचिकित्सा (चि० अ० १६) में शैलेयकादि तैल और प्रदेह में, महासुगन्धहस्ती नामक अगद के योग में (चि० अ० २३), अमृतादि तैल (चि० अ० २८) तथा वातरक्त चिकित्सा (चि० अ० २९) में शतपुष्पादि तैल के योग में अन्य द्रव्यों के साथ नख का प्रयोग लिखा है। सुश्रुत में एलादिगण में व्याघ्रनख का उल्लेख है। तैलों को सुगन्धित करने के लिये इसका अधिक उपयोग होता है। अथ बालम् (सुगन्धबाला) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बालं ह्रीबेरबर्हिष्ठोदीच्यं केशाम्बुनाम च। बालकं शीतलं रूक्षं लघु दीपनपाचनम् ।। हल्लासरुचिवीसर्पहृद्रोगामातिसारजित् ।।८३।। सुगन्धबाला के नाम तथा गुण—बाल, ह्रीबेर, बर्हिष्ठ, उदीच्य, केशनाम (केशवाचक सभी शब्द) एवं अम्बुनाम (जलवाची सभी शब्द) तथा बालक ये सब 'सुगन्धबाला' के संस्कृत नाम हैं। सुगन्धबाला—शीतवीर्य, रूक्ष, लघु अग्निदीपक तथा पाचक होती है और यह हल्लास (जीमिचलाना), अरुचि, वीसर्प, हृद्रोग, आम तथा अतिसार इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है। [८३] ३२. सुगन्धबाला हिं०-सुगन्धबाला, नेत्रवाला। बं०-बाला। म०-काला बाला। गु०-बालो, कालो बालो। क०-बलरकक्सी-गिडा। ते०-मुतुपलागमु, एर्कुटी। ता०-पेरामुटिवेर। ले०-Paonia odorata Willd. (पॅवोनिया ओडोरेटा विल्डा)। Fam. Malvaceae (मालवेंसी)। सुगन्धबाला—पश्चिमोत्तर प्रदेश, सिन्ध, पश्चिम प्रायद्वीप और सिलोन में अधिक उत्पन्न होती है। इसके क्षुप में थोड़ी सी कस्तूरी की सुगन्ध रहती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA