भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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४१२ भावप्रकाशनिघण्टुः छाल सिलोनी दालचीनी की अपेक्षा मोटी, तेजी में कम तथा जल के साथ पीसने से पिच्छिलता युक्त हो जाती है। नवीन मत से सिलोनी तथा चीनी दालचीनी के गुण पहले लिखे जा चुके हैं तथा भारतीय के गुणों में नवीन दृष्टि से कोई विशेष अन्तर न होने के कारण इनको अलग नहीं लिखा है। नोट— भावप्रकाशकार त्वक्पत्र (तज) के गुणों में ‘पित्तलं’ तथा ‘शुक्रहृत्’ लिखते हैं। दारुसिता (सिलोनी दालचीनी) से गुणों में ‘पित्तहृत्’ एवं ‘शुक्रला’ लिखते हैं। दारुसिता के अन्य नाम ‘स्वाद्वी’, ‘तनुत्वक्’ लिखे हैं जिससे दारुसिता यह सिलोनी दालचीनी होगी ऐसा लगता है। इस दृष्टि से सिलोनी तथा भारतीय दालचीनी के गुण भावप्रकाशकार के मत से बिलकुल अलग हैं। भावप्रकाशोक्त तीसरे द्रव्य पत्रक (तेजपात) के गुण त्वक्पत्र से मिलते- जुलते हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि त्वक्पत्र (तज, भारतीय दालचीनी) के वृक्ष के पत्ते ही तेजपत्र हैं। रासायनिक संगठन— इसमें एक प्रकार का लौंग के समान गन्ध वाला उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग— तेजपत्र उष्ण, लघु, वातहर, दीपन, स्वेदजनन, मूत्रजनन तथा उत्तेजक है। इसका प्रयोग कफ, वात, अर्श, हल्लास, अरुचि एवं पीनस में किया जाता है। कुपचन, उदरस्थवायु, उदरशूल एवं अतिसार आदि पचननलिका के रोगों में, सब तरह के कफविकारों में एवं गर्भाशय की शिथिलता में इसका उपयोग करते हैं। गर्भाशय की शिथिलता दूर होकर गर्भाधान होने के लिये तथा गर्भस्राव न हो इसलिये इसका प्रयोग करते हैं। यह वातहर होने के कारण बच्चों के सभी प्रकार के रोगों में एवं आमवात में इसको खिलाते हैं। मात्रा— १-४ माशा। अथ नागकेशरः। तस्य नामानि गुणाँश्चाह नागपुष्पः स्मृतो नागः केशरो नागकेशरः। चाम्पेयो नागकिञ्जल्कः कथितः काञ्चनाह्वयः ॥६९॥ नागकेशर के नाम तथा गुण— नागपुष्प, नाग, केशर, नागकेशर, चाम्पेय, नागकिञ्जल्क तथा काञ्चनाह्वय (काञ्चन के वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) ये सब पुंलिंगी शब्द ‘नागकेशर’ वृक्षवाची हैं। [६९] ❖ अयं पुष्पे तु क्लीबे ॥६९॥ किन्तु यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि यदि उक्त सभी शब्द नपुंसकलिंगी हों तो ‘नागकेशर के पुष्प’ को कहने वाले होते हैं। [६९] नागपुष्पं कषायोष्णं रूक्षं लध्वामपाचनम् ।।७०।। ज्वरकण्डूतृषास्वेदच्छर्दिहृल्लासनाशनम् । दौर्गन्ध्यकुष्ठवीसर्पकफपित्तविषापहम् ।।७१।। नागकेशर (नागकेशर का फूल)— कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, रूक्ष, लघु तथा आम को पचाने वाला होता है एवं यह ज्वर, खुजली, तृषा, पसीना, वमन, हल्लास, दुर्गन्ध, कुष्ठ, विसर्प, कफ, पित्त और विष को दूर करने वाला होता है। [७०-७१] २८. नागकेसर (१) हिं०— नागकेसर, नागेसर, पीला नागकेशर, नागचम्पा। बं०— नागेश्वर। म०— नागकेसर, नागचांफा (वृक्ष)। गु०— पीलु नागकेसर। क०— नागसम्पिगे। ते०— नागकेसरमु। ता०— चेरू नगपू। अ०— मिस्कुरुम्मान। फा०— नारेमुष्क। अं०— Cobra’s Saffron (कोबराज सॅफ्रॉन)। ले०— Mesua ferrea Linn. (मेसुआ फेरिआ लिन)। Fam. Guttiferae (गटिफेरी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA