भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 462, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें(६) इसके तैल को दाँत के गढ़े में रखने से दर्द दूर होता है। नाड़ीशूल एवं जिह्वा के लकवे में इसका प्रयोग किया जाता है। चूसने वाली गोलियों में सुगंध द्रव्य के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। (७) बड़ी मात्रा में दालचीनी का उपयोग कैन्सर में किया गया है। औषध के अतिरिक्त मसालों में इसका बहुत प्रयोग करते हैं। तैल का सुगंध द्रव्य रूप में बहुत व्यवहार करते हैं तथा औषध संरक्षण के रूप में भी कभी-कभी व्यवहार किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २ १/२-१० र०; तैल १-३ बूँद। अथ पत्रकम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पत्रं तमालपत्रञ्च तथा स्यात्पत्रनामकम्। पत्रकं मधुरं किञ्चित्तीक्ष्णोष्णं पिच्छिलं लघु। निहन्ति कफवाताशौंहृल्लासारुचपीनसान् ।।६८।। तेजपात के नाम तथा गुण-पत्र, तमालपत्र, पत्रनामक (अर्थात् पत्रवाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाचक हैं) एवम् पत्रक ये सब 'तेजपात' के संस्कृत नाम हैं। तेजपात-मधुर रस युक्त, किञ्चित् तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पिच्छिल और लघु होता है एवम् यह कफ, वात, अर्श, हृल्लास (उबकाई), अरुचि तथा पीनस इन सबों को दूर करने वाला होता है। [६८] २७. तेजपात हिं०-तमालपत्र, पत्रज, तेजपत्ता, तेजपत्र, गुरन्द्रा। बं०-तेजपत्र। म०-तमालपत्र। ते०-आकुपत्री, तालीस पत्री। ने०-चेटा सिंकोली। गु०-तमालपत्र। आसा०-दोपती। ता०-कट्टु-करुवपत्तै। अ०-साजजेहिन्दी। ले०- Cinnamomum tamala Nees & Eberm (सिर्नमोमम् तमाल नीज, एवर्म)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी)। इसका वृक्ष हिमालय में ३ से ७ हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। मौतारगढ़ में ये समूहबद्ध होकर बहुत अधिक संख्या में पाये जाते हैं। पूर्वी बंगाल तथा खासिया एवं जैन्तिया पहाड़ियों पर तथा वर्मा में भी पाये जाते हैं। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का, करीब २५ फीट ऊँचा, साढ़े चार फीट के घेरे में एवं सुगन्धयुक्त होता है और वह बारहो मास हरा-भरा रहता है। छाल-पतली, शिकनदार, खुरदरी, गहरी भूरे रंग की या कृष्णाभ होती है। काट-आधा इञ्च मोटा, गुलाबी या ललाई लिये हुये भूरे रंग का और बाहर की ओर श्वेत रेखांकित होता है। पत्ते-प्रायः ५-८ लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, लटवाकार-आयताकार या भालाकार, नोकदार, चिकने, चर्मवत्, विपरीत या एकान्तर तथा आधार से अग्रतक तीन शिराओं से युक्त एवं ७.५-१३ मि० मि० लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। नवीन पत्तियाँ कुछ-कुछ गुलाबी रंग की रहती हैं। फूल-७.५ मि० मि० लम्बे, हल्के पीताभ रंग के, ५-१५ से० मी० लम्बे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों (Panicles) में रहते हैं। परिपुष्प खंड ६, आयताकार, सिल्क की तरह मृदुरोमश जो पुष्पित होने पर मध्य के नीचे से टूट जाते हैं। पूर्ण पुंकेसर ९ रहते हैं। फल-आध इञ्च लम्बे, अंडाकार, मांसल एवं काले रंग के रहते हैं। ये फल कुछ बढ़े हुये परिपुष्प नाल पर लगे रहते हैं जिनके परिपुष्प खंड अग्र पर कटे हुए (Truncated) मालूम पड़ते हैं। इसके सूखे हुए पक्व फल का काला नागकेशर नाम से दक्षिण भारत में व्यवहार होता है। अर्श के लिए यदि नागकेशर का प्रयोग करना हो तो इसका प्रयोग अधिक उचित मालूम होता है क्योंकि तमाल पत्र के शास्त्रीय गुणों में अर्श का उल्लेख मिलता है। इसकी छाल को हिं०-तज, बं०-नालुका तथा अ०-सलीखा कहते हैं। यही भारतीय दालचीनी है जिसको सिलोनी दालचीनी के स्थान पर या मिलावट के रूप में उपयोग में लाते हैं। इसी के पत्ते तेजपात या तमालपत्र नाम से अधिकतर बेचे जाते हैं। कुछ लोगों के मत से तेजपात तथा तज अलग-अलग वृक्षों के पत्ते तथा छाल हैं। इसकी