भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ भावप्रकाशनिघण्टुः १४. पद्माख हिं०-पद्माक, पद्माख, पदुम काठ, फाजा । बं०-पद्म काष्ठ । म०-पद्म काष्ठ, पद्मक । गु०-पद्मकनुं लाकडुं, पद्मकाष्ठ । क०-पद्मक । पं०-चभिअरी । लिपचा०-कोंगकी । अं०-Mild Himalaya Cherry (माइल्ड हिमालय चेरी) । ले०-Prunus puddum Roxb. ex Wall. (प्रूनस् पड्डुम्, राक्सज्) । Fam. Rosaceae (रोज़ॅसी) । यह गरम हिमालय में शिमला, गढ़वाल से सिक्किम और भूटान तक एवं दक्षिण में कुडाईकनाल और उटकमंड में पाया जाता है । इसका वृक्ष मध्यमाकार का अचिरस्थायी होता है । छाल-फीके भूरे रंग की या कालापन युक्त भूरे रंग की और चमकीली होती है । इससे पतली चमकीली पपड़ियाँ छूटती रहती हैं । काष्ठसार रक्ताभ तथा सुगन्ध युक्त होता है । पत्ते- ३-५ इञ्च लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, भालाकार लट्वाकार, लम्बे नोकवाले, चिकने और दोहरे दाँतों वाले होते हैं । फूल- सफेद गुलाबी या लाल रंग के आते हैं और पतझड़ के बाद नवीन पत्ते निकलने के पहले ही खिल जाते हैं । फल- छोटे-छोटे गोलाकार या अंडाकार होते हैं और वे पीले या गुलाबी रंग के दिखाई पड़ते हैं । इन फलों की लोग खाते हैं तथा इनसे एक प्रकार का मद्य बनाते हैं । बाजार में पद्मकाष्ठ के कांड के टुकड़े बिकते हैं । ये वजन में भारी तथा इनके छाल का वर्ण कृष्ण-रक्त रहता है । छाल पर आड़ी खाँचें रहती हैं । इसे हाथ से रगड़ने से आह्लादकारक तथा मृदु सुगन्ध आती है । इनके भीतर का भाग रक्तपीताभ श्वेतवर्ण का होता है । पद्मकाष्ठ हमेशा नया काम में लाना चाहिये क्योंकि कालान्तर से उसका औषधधर्म नष्ट हो जाता है । पद्माख का क्वाथ बनाकर प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि इसे उबालने से इसका सत्व उड़ जाता है । इसका हमेशा गुनगुने जल में फांट बनाकर प्रयोग करना चाहिये । रासायनिक संगठन-इसकी छाल में एक अत्यन्त विषैला द्रव्य हाइड्रोसायेनिक एसिड् (Hydrocyanic acid) तथा ॲमिग्डॅलिन् (Amygdalin) इत्यादि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-पद्माख शीतल, रक्तस्तम्भक, तिक्तपौष्टिक, छर्दिनिग्रहण, स्तम्भन, वेदनास्थापक, वर्ण्य, गर्भस्थैर्यकर एवं ज्वरहर है । इसका वेदनाहर गुण इसके विषैले सत्व में है तथा स्तम्भन एवं तिक्तपौष्टिक गुण काष्ठ में है । इसके विषैले सत्व की क्रिया सम्पूर्ण शरीर पर एवं विशेषकर जीवनीय केन्द्र स्थान पर शामक रूप में होती है । (१) अपचन के कारण आमाशय को श्लेष्मल त्वचा में शोथ होकर वमन एवं अतिसार होने पर तथा आमाशय के व्रण में इसको दिया जाता है । इससे व्रण की वेदना कम होती है तथा स्तम्भन गुण के कारण अतिसार तथा वमन में लाभ होता है । इसके फांट से भी वमन तथा हल्लास में लाभ होता है । (२) श्वसनकेन्द्र के ऊपर इसके शामक प्रभाव के कारण शुष्क कास एवं क्षयज प्रस्वेद कम हो जाता है । हिक्का एवं श्वास में इसको मधु के साथ चटाते हैं । (३) हृदय के केन्द्रस्थान के शमन के कारण हृदय की धड़कन तथा हृदय के वामपटल रोग से रक्त का पीछे बहना (Mitral regurgitation) एवं हृदय पर मेद संचित होकर एक प्रकार की जो खाँसी होती है उसमें यह गुणकारक है । (४) रक्तपित्त में चन्दन, शर्करा एवं तंडुल जल के साथ इसको देते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA