भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ भावप्रकाशनिघण्टुः यूरोपियम्) मालूम पड़ता है लेकिन गुण धर्म जो लिखे हैं वे तगर (वेलेरियन) से मिलते लिखे हैं। इन्होंने इसका एक प्रतिनिधि भारतीय भेद माना है जिसको 'तुग्गुर' नाम दिया है। डॉ० देसाई ने तगर (वेलेरिआना वालिचिआइ) एवं असरून (अ० यूरोपियम्) का अलग-अलग वर्णन किया है तथा दोनों के गुण धर्म भी अलग लिखे हैं। डॉ० देसाई ने असरून को वामक, शिरोविरेचक, स्वेदजनन, कफघ्न, संर्सा एवं शोथघ्न लिखा है जो तगर से भिन्न हैं। इसके परिचय में लिखा है कि असरून की जड़ में मिरिच जैसी गन्ध तथा स्वाद कटु (तीता) होता है तथा इसके पंञ्चाग के चूर्ण को सूँघने से छींक आती है। तगर का स्वाद कड़वा एवं गन्ध अलग प्रकार की होती है। डॉ० चोपड़ा भी डॉ० देसाई के मत से सहमत हैं। डॉ० देसाई ने यह स्पष्ट लिखा है कि असरून के समान ही दिखलाई देने वाली लेकिन गुणों में भिन्न एक दूसरी वनस्पति है जिसको तुग्गुर कहते हैं तथा उसका लोग असरून के स्थान पर व्यवहार करते हैं। इस दृष्टि से बाजार में सुगन्धवाला के नाम से बिकने वाला द्रव्य असली तगर (वेलेरिअन) है एवं इसे असरून नाम देना या असरून के स्थान पर प्रयोग करना उचित नहीं है। असरून अलग द्रव्य है। इसी प्रकार सुगन्धवाला भी अलग द्रव्य है। बाजार में तगर नाम से बिकने वाले कृष्ण वर्ण के काष्ठ चूर्ण आदि को भी तगर नहीं मानना चाहिये। इसके क्षुप-हिमालय पहाड़ के साधारण भाग में काश्मीर से भूटान तक ४ से १२ हजार फीट की ऊँचाई पर तथा खासिया के पहाड़ों पर ४ से ६ हजार फीट की ऊँचाई पर बहुत पाये जाते हैं। इसका क्षुप (Herb)-किंचित् रोमश एवं बहुवर्षायु होता है। मूलस्तम्भ-मोटा, अधोगामी मोटे तन्तुओं से युक्त एवं जमीन में दिगन्तसम फैला रहता है। काण्ड-१५.४५ से० मी० ऊँचे एवं प्रायः गुच्छेदार होते हैं। पत्ते-आधारीय पत्र प्रायः २।।-७।। से० मी० व्यास में, लम्बे नाल से युक्त, लट्वाकार, आधार पर गहरे ताम्बूलाकार, तीक्ष्णाग्र तथा धारयुक्त दन्तुर या लहरदार होते हैं। काण्डपत्र संख्या में थोड़े, बहुत छोटे एवं अखंड या खंडित होते हैं। फूल-श्वेत रंग के या कुछ-कुछ गुलाबी होते हैं और समशिख क्रम से शाखाओं पर पाये जाते हैं। ये प्रायः एकलिंगी होते हैं तथा पुंपुष्प एवं स्त्रीपुष्प अलग-अलग क्षुपों पर होते हैं। वृत्तपत्रक (Bracteoles)-फल के इतने लम्बे, आयताकार- रेखाकार होते हैं। बाह्यकोश-पुष्पित होते समय बाह्यदल के खंड क्वचित् व्यक्त लेकिन बाद में करीब १२, रेखाकार, रोमयुक्त खण्डों में दिखलाई देते हैं। आभ्यन्तर कोश-यह कुप्पी के आकार का, पाँच खण्डों से युक्त तथा फैला हुआ होता है। पुंकेशर-संख्या में ३ होते हैं। स्त्रीकेशरी-कुक्षिवृन्त पतला, अविभाजित तथा कुक्षि अग्र में स्थित रहती है। अंडाशय-३ गहरों वाला होता है। फल-रोमश या करीब-करीब रोमहीन होते हैं। इसके मूल तथा मूलस्तम्भ का व्यवहार औषध में किया जाता है। मूलस्तम्भ के अत्यन्त गाँठदार, टेढ़े-मेढ़े, खुरदरे, हलके पीताभ बादामी (Dull yellowish-brown) रंग के, ४-८ से० मी० लम्बे तथा ५-१० मि० मी० मोटे टुकड़े होते हैं। यह कुछ चिपटे से होते हैं। इनके ऊपरी पृष्ठ पर अनेक टूटे हुये पत्तों के निशान तथा अधोपृष्ठ पर टूटे हुए मूल के निशान रहते हैं तथा अधोपृष्ठ से कुछ मोटे मूल निकले हुये रहते हैं। इसका भग्न-छोटा तथा कंटकित होता है। इसका स्पष्ट अनुप्रस्थ (Trausverse) विच्छेद करके देखने से गहरे रंग का बाह्यक (Cortex), मज्जक (Pith), एधा (Cambium) की स्पष्ट रेखा एवं चौड़े मज्जक किरणों (Medullary rays) से पृथक् किये हुये १२-१५ छोटे हलके रंग के दारूपूलों (Xylem bundles) का वर्तुल आदि भाग दिखलाई देते हैं। इसके मूल बहुत से, ६-७ मि० मी० लम्बे एवं १-२ मि० मी० मोटे या कभी-कभी नहीं भी रहते। इसके अन्दर का भाग हलके वर्ण का काष्ठमय एवं छाल गहरे रंग की होती है। तगर में एक विशिष्ट उग्र गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कड़वा होता है। रासायनिक संगठन-भारतीय वेलेरियन (तगर) में एक उड़नशील तैल ०.५-२.१२% पाया जाता है। वसन्त ऋतु में संगृहीत ताजे मूल में इसकी अधिकतम मात्रा होती है। इस तैल में प्रधानतया सेस्क्व्टपैन्स (Sesquiterpenes),