भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ३८५ इसका आन्तरिक उपयोग अन्य औषधों के साथ क्वाथ के रूप में दाह, कास, मूर्च्छा, आध्मान, अङ्गघात आदि वातिक व्याधियाँ, अश्मरी, कफज्वर, कृमि, श्लेष्मातिसार एवं वातज हिक्का में किया जाता है। इसका लेप व्रण, शोथ, कंठमाला, जन्तुओं के दंश, त्वचा के अनेक विकार एवं वातव्याधियों में किया जाता है। व्रण में इसकी छाल का धुआँ दिया जाता है। इसकी लकड़ी को कपड़ा लपेट कर तथा घृत में डुबोकर जलाते हैं तथा जो तेल टपकता है उसे कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है। व्रणरोपण तैलों में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-३ माशा। अथ तगरं पिण्डतगरं च तयोर्नामानि गुणाँश्चाह कालानुसार्यं तगरं कुटिलं नहुषं नतम्। अपरं पिण्डतगरं दण्डहस्ती च बर्हिणम्॥२८॥ तगरद्वयमुष्णं स्यात्स्वादु स्निग्धं लघु स्मृतम्। विषापस्मारशूलाक्षिरोगदोषत्रयापहम् ॥२९॥ तगर तथा पिण्ड तगर के भेद एवं दोनों के नाम और गुण-तगर दो प्रकार का होता है उसमें प्रथम प्रकार के तगर के-कालानुसार्य, तगर, कुटिल, नहुष और नत ये सब संस्कृत नाम हैं। दूसरे प्रकार के तगर के-पिण्डतगर, दण्डहस्ती और बर्हिण ये सब संस्कृत नाम हैं। दोनों प्रकार के तगर-उष्णवीर्य स्वादिष्ट, स्निग्ध तथा लघु होते हैं। यह विष, अपस्मार (मिर्गीरोग), शूल, नेत्ररोग तथा त्रिदोष को दूर करने वाले होते हैं। [२८-२९] १३. तगर हिं०-तगर, सुगन्ध वाला, मुश्क वाला। बं०-तगर पादुका, शुमियो, असारून। म०-तगर गण्ठोडा, तगरमूल। गु०-तगर गण्ठोडा। फा०-असारून। उर्दू-रिशवाल। पं०-बालमुदक, मुश्कवली। अं०-Indian Valerian Rhizome (इण्डियन वेलेरियन हाइमोम)। ले०-Valeriana wallichii DC. (बॅलेरिआना वालिशिआइ)। Fam. Valerianaceae (वॅलेरिॲनेसी)। तगर क्या है इसके सम्बन्ध में पहले मतभेद था। कुछ लोग श्वेत पुष्पवाले एक छोटे वृक्ष टेबर्नी मोण्टॅना कोरोनेरिया (Tabernae montana coronaria B. Br.), हिं०-चाँदनी के मूल को तगर मानते थे। कहीं-कहीं श्यामवर्ण की चंदन जैसी वजनदार लकड़ी बिकती है। बंगाल में कोई जल में उत्पन्न होने वाली घास तथा पंजाब में कोई पीले काष्ठ आदि का व्यवहार किया जाता रहा। लेकिन अब निर्विवाद रूप से यह सिद्ध हो गया है कि ऊपर लिखे हुये वेलेरिआना वालिशिआइ का मूलस्तम्भ (मूल) ही तगर है। बाजार में यह 'सुगन्ध वाला' के नाम से बिकता है तथा इसे वैद्य 'बालकम् या हीबेर' के स्थान पर प्रयोग करते रहे हैं। वास्तव में यह सुगन्धवाला नहीं है। बालक या हीबेर (सुगन्धवाला) का स्वतन्त्र वर्णन आगे दिया हुआ है। बाजार में 'तगर' नाम से जो द्रव्य बिकता है वह कोई निर्गन्ध काष्ठ है और किसी सुगन्धित द्रव्य के साथ रख कर गन्धयुक्त बना दिया जाता है। भारतीय तगर-पाश्चात्य चिकित्सा में व्यवहार में लाये जाने वाले विदेशी वॅलेरियन, वॅलेरिआना ऑफिसिनॅलिस् लिन. (Valeriana offcinalis Linn.) के स्थान में उत्तम प्रतिनिधि माना जाता है। यद्यपि भारतीय तगर अपने यहाँ पर्याप्त होता है तथापि व्यापारी तगर अधिकतर अफगानिस्तान से निर्यात किया हुआ रहता है। भारत में विदेशी तगर (वे० ऑफिसिनॅलिस) बहुत थोड़ी मात्रा में काश्मीर के उत्तर में सोनमर्ग स्थान पर ८ से ९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसकी अन्य उपजाति वे० हार्डविकाइ वाल. (V. hardwickii Wall.) भी वे० वालिचिआइ के साथ पाई जाती है। बाजार में इस तगर को सुगन्धवाला एवं असारून नाम से लोग बेचते हैं। श्री ठा० दलजीतसिंहजी द्वारा लिखित यूनानी द्रव्यगुण विज्ञान में असारुन का ले० नाम असारूम् यूरोपियम् लिन., एरिस्टोलोकिएसी (Asarum europaeum Linn.; Fam. Aristolochiaceae) लिखा हुआ है। स्वरूपादि का वर्णन भी उसी का (अ० २८ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA