भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 441, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें३९० भावप्रकाशनिघण्टुः सामान्यरूप से गूगल के गुण-गूगल-विशद गुण युक्त, तिक्त-कषाय तथा कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, पित्तजनक, सारक (दस्तावार), विपाक में कटुरस युक्त, रूक्ष एवं अत्यन्त लघु होता है। यह टूटे हुये हड्डियों को जोड़ने वाला, वृष्य, सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतोगामी), स्वर को उत्तम करने वाला, रसायन, अग्निदीपक, पिच्छिलगुणयुक्त तथा बलकारक होता है एवम्-कफवात, व्रण, अपची, मेदरोग, प्रमेह, पथरी, वातरोग, क्लेद, कुष्ठ, आमवात, पिडका, ग्रन्थिरोग, शोथ, बवासीर, गण्डमाला तथा कृमिरोग का नाशक होता है। गूगल-मधुर रस युक्त होने से वात को, कषाय रसयुक्त होने से पित्त को और तिक्त रस युक्त होने से कफ को नष्ट करने वाला होता है, अतः यह सम्पूर्ण दोषों का नाशक कहा हुआ है। [३८-४१] नवीनस्य प्राचीनस्य च गुग्गुलोर्लक्षणं गुणाँश्चाह स नवो बृंहणो वृष्यः पुराणस्त्वतिलेखनः ।।४२।।। स्निग्धः काञ्चनसंकाशः पक्वजम्बूफलोपमः । नूतनो गुग्गुलुः प्रोक्त सुगन्धिर्यस्तु पिच्छिलः ।।४३।। शुष्को दुर्गन्धकश्चैव व्यक्तप्रकृतिवर्णकः । पुराणः स तु विज्ञेयो गुग्गुलुर्वीर्यवर्जितः ।।४४।। नवीन और पुराने गूगल के गुण तथा लक्षण-नवीन गूगल-बृंहण (धातुवर्धक) तथा वृष्य (वीर्यजनक) होता हैं और पुराना गूगल-अतिलेखन (शरीर के धातु तथा मलों को सुखा कर खुरचने वाला) होता है। नवीन गूगल वह कहलाता है जो स्निग्ध, सोने के समान वर्ण वाला, पके हुये जामुन के समान स्वरूप वाला, सुगन्ध युक्त तथा पिच्छिल गुण युक्त होता है। पुराना गूगल-वह कहलाता है कि जो शुष्क, दुर्गन्धयुक्त, स्वाभाविक वर्ण हीन तथा वीर्य रहित होता है। [४२-४४] गुग्गुलुसेविनां त्याज्यान्याह अम्लं तीक्ष्णमजीर्णञ्च व्यवायं श्रममातपम् । मद्यं रोषं त्यजेत्सम्यग् गुणार्थी पुरसेवकः ।।४५।। गूगल सेवन करने वालों के लिये अहितकर अतएव त्याज्य विषय-गूगल का सेवन करने वाला पुरुष यदि गूगल का भली भाँति गुण प्राप्त करना चाहे तो वह अम्ल रस युक्त, तीक्ष्ण तथा अजीर्णकारक द्रव्य, मैथुन, परिश्रम, धूप में फिरना, शराब पीना तथा क्रोध करना छोड़ दे। [४५] १५. गूगल हिं०-गूगल, गुग्गुल। बं०-गुग्गुल, मुकुल। म०-गुग्गुल। गु०-गुगलते क०-गुग्गुल। त०-गुक्कुलु चेट्टु। ता०-मैशाक्षी, गुक्कल। सिंध-गुगुरू। फा०-बूएजहूदीन। अ०-मुक्ल-अर्जक, अफलात(तू) न। अं०- Indian Bdellium (इण्डियन डेलिअम्)। ले०-Balsamodendron mukul Hook. ex Stocks (बाल्सेमोडेण्ड्रोन् मुकुल, हुक एक्स स्टॉक्स)। Fam. Burseraceae (बर्सेरसी)। गूगल के वृक्ष-सिन्ध, राजपूताना, खानदेश, बरार, मैसूर, काठियावाड़ एवं बेलरी आदि स्थानों में अधिक पाये जाते हैं। इसका वृक्ष-छोटा, ४ से ८ फीट ऊँचा एवं झाड़ीदार होता है जिसकी मोटी फैली हुई शाखाओं के अग्रभाग कंटकित होते हैं। छाल-हरापन युक्त पीली होती है। इससे कागज के समान लम्बे, पतले, चमकीले परत निकलते रहते हैं। लकड़ी-सफेद और कोमल होती है। पत्ते-पत्रक १ से ३ तक, ऊपर से लट्वाकार, अग्र की तरफ दन्तमय धार वाले, चिकने, चमकीले तथा विशेष कर छोटी मोटी प्रशाखाओं के अन्त में रहते हैं। फूल-४-५ दल वाले, छोटे- छोटे तथा भूरापन लिये लाल रंग के आते हैं। फल-छोटे-छोटे, मांसक, लंबगोल तथा पकने पर लाल हो जाते हैं। ' CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA