भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० भावप्रकाशनिघण्टुः एवं मध्य शिरा के दोनों तरफ के भाग असमान होते हैं। फूल-किंचित् पीताभ रंग के आते हैं। फलियाँ-चिपटी, ३-४ इञ्च × १ १/२-२ इञ्च बड़ी होती हैं। प्रत्येक में ३-४ बीज होते हैं। इसके काष्ठसार का उपयोग किया जाता है। यह लालचन्दन जैसी, फीके लाल रंग की, कड़ी एवं निर्गन्ध होती है। बाजार में सिंगापुरी, धुनसरी और सिलौनी इन तीन नामों से इसकी लकड़ी मिलती है। रासायनिक संगठन—इसमें सँप्पन रेड (Sappan red) नामक एक लाल रंग, गॉलिक एवं टॉनिक् एसिड तथा उड़नशील तैल आदि पाये जाते हैं। इसमें का रंग होमैटोक्साइलिन (Haematoxylin) से मिलता-जुलता है तथा ईथर, मद्यसार एवं जल में घुल जाता है। पतंग का कायकारी सत्त्व हीमॅटीन (Haematin) से मिलता-जुलता तथा ब्रॅसिलिन (Brasilin) के समान होता है। इसकी राल में एक रवेदार पदार्थ पाया जाता है जो यदि आसुत करके पोटॉश के साथ गलाया जाए तो रीसॉसिन (Resorcin) प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग—यह ग्राही, रक्तसंग्राहक, गर्भाशय के लिये उत्तेजक एवं संकोचक, श्लेष्मघ्न एवं व्रणरोपक है। (१) फुफ्फुस, गर्भाशय एवं आन्त्र आदि स्थानों से रक्तस्राव होने पर इसका क्वाथ पिलाने से लाभ होता है। (२) पुराने व्रणों पर इसके महीन चूर्ण का अवचूर्णन करने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं तथा स्थानिक रक्तस्राव भी बन्द होता है। इसके क्वाथ की पट्टी रखने से स्थानिक रक्तस्राव रुक जाता है। श्वेत प्रदर में इसके क्वाथ की बस्ति दी जाती है। पतंग एवं वनफ्शा के क्वाथ से मांसाबुदों का प्रक्षालन करने से पीड़ा एवं दुर्गन्ध कम हो जाती है। लिचेन (Lichen) नामक त्वग् रोग में इसे पीस कर इसका लेप करते हैं। मात्रा—१-२ माशा। अथ सर्वेषां चन्दनानां मध्ये मलयजस्य श्रेष्ठतामाह— चन्दनानि तु सर्वाणि सदृशानि रसादिभिः। गन्धेन तु विशेषोऽस्ति पूर्वः श्रेष्ठतमो गुणैः ।।२०।। सभी प्रकार के चन्दनों में मलयागिरी चन्दन की उत्तमता—यद्यपि रसादिकों में प्रायः सभी प्रकार के चन्दन समान ही होते हैं, उनमें विशेषता केवल गन्ध की ही रहती है। तथापि उनमें सर्वप्रथम जो मलयागिरी चन्दन है, वही गुणों में सर्वश्रेष्ठ होता है। [२०] अथागुरु कृष्णागुरु च (अगर, काला अगर) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह अगुरु प्रवरं लोहं राजार्हं योगजं तथा। वंशिकं कृमिजं वाऽपि कृमिजग्धमनार्यकम् ।।२१।। अगुरूष्णं कटु त्वच्यं तिक्तं तीक्ष्णञ्च पित्तलम्। लघु कर्णाक्षिरोगघ्नं शीतवातकफप्रणुत् ।।२२।। कृष्णं गुणाधिकं तत्तु लोहवद्वारी मज्जति। अगुरुप्रभवः स्नेहः कृष्णागुरुसमः स्मृतः ।।२३।। अगर तथा काले अगर के नाम और गुण एवं अगर के तेल के गुण—अगुरु, प्रवर, लोह, राजार्ह, योगज, वंशिक, कृमिज, कृमिजग्ध और अनार्यक ये सब अगर के संस्कृत नाम हैं। अगर—उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त रस युक्त, त्वचा के लिये हितकारी, तीक्ष्ण, पित्तजनक, लघु एवम् कान व नेत्र संबंधी रोगों को दूर करने वाला तथा शीत, वात व कफ को नष्ट करने वाला होता है। काला अगर—यह अगर की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है तथा पानी में डालने से लोहे की भाँति डूब जाने वाला होता है। अगर का तेल—अगर से निकाला हुआ तेल गुणों में काले अगर के समान ही समझा जाता है। [२१-२३] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA