भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ३७९ चाहिये । इसके मद्यसारीय घोल से इसके रंग को खनिज अम्लों (Mineral acids) के द्वारा निस्सादिन (Precipitated) किया जा सकता है । गुण और प्रयोग-रक्तचन्दन शीतल, बल्य, सौम्य एवं ग्राही है । इसका बाह्य लेप शीतल, शोथघ्न एवं व्रणरोपक है। इसका प्रयोग पैत्तिक विकार, रक्तदोष, रक्तार्श, रक्तपित्त, अतिसार, संग्रहणी एवं शिरःशूल, शोथ तथा त्वचा के रोगों में किया जाता है । रंजक द्रव्य के रूप में इसका अधिक उपयोग किया जाता है । (१) शोथ, फोड़े, व्रण, अम्हौरी तथा शिरःशूल में इसको शीतल प्रलेप के रूप में जल में घिसकर लगाते हैं । पलकों की सूजन पर इसे लगाने से सूजन दूर होती है । (२) ग्राही होने के कारण अन्य ओषधों के साथ इसका क्वाथ अतिसार एवं संग्रहणी आदि में प्रयोग किया जाता है। (३) रक्तार्श में इसे दूध में पीसकर पिलाते हैं एवं जल में घिसकर लेप भी करते हैं । (४) इसके मद्यसारीय घोल से खनिज अम्लों के द्वारा इसके रंजक द्रव्य को निस्सादित कर लिया जाता है जिसका उपयोग रंजन के लिये करते हैं । कंपाउंड टिंक्चर ऑफ ल्हेवेण्डर में इसी का रंग होता है । मात्रा-४ रत्ती-८ रत्ती । बड़ी गुमची Adenanthera pavonina Linn; Fam. Leguminosae (अँडेनेन्थेरा पॅह्वानिना लिन, लेग्यूमोनोसी)- यह पूर्वी हिमालय तथा पश्चिमी पेनिन्सुला में पाया जाता है । इसके बीजों का प्रयोग फोड़े तथा सूजन आदि पर किया जाता है तथा छाल का उपयोग आमवात एवं रक्तष्ठीवन में किया जाता है । अथ पतङ्गम् (बकम्) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पतङ्गं रक्तसारञ्च सुरङ्गं रञ्जनं तथा । पट्टरञ्जकमाख्यातं पत्तूरञ्च कुचन्दनम् ।। १८ ।। पतङ्गं मधुरं शीतं पित्तश्लेष्मव्रणास्रनुत् । हरिचन्दनवद्वेद्यं विशेषाद्दाहनाशनम् ।। १९ ।। पतङ्ग के नाम तथा गुण-पतङ्ग, रक्तसार, सुरङ्ग, रञ्जन, पट्टरञ्जक, पत्तूर और कुचन्दन ये सब पतङ्ग के संस्कृत नाम हैं । पतङ्ग-मधुररस युक्त, शीतवीर्य एवम् पित्त-कफ, व्रण और रक्तदोष को दूर करने वाला होता है । यद्यपि पतङ्ग का गुण पीले चन्दन के समान ही होता है तथापि इसे विशेष करके दाहनाशक समझना चाहिये । [१८-१९] ९. पतङ्ग हिं०-पतङ्ग, बक, बकम काठा, आल । बं०-बकम काष्ठ, बोकोम । म०, गु०-पतङ्ग । ते०-बुक्कपुचेट्टु । ता०-वरतंगि, शप्पङ्गु । मला०-चप्पनम् । फा०, अ०-बकम । अं०-(Sappan Wood (सँप्पन वुड) । ले०- Caesalpinia sappan Linn. (सिझल्पिनिया सँप्पन) । Fam. Caesalpiniaceae (सिझल्पिनिएसी) । यह पूर्व और पश्चिम प्रायद्वीप एवं मद्रास प्रान्त में अधिक पाया जाता है । बंगाल और बिहार के किसी-किसी स्थान में देखने में आता है । इसका वृक्ष-छोटा एवं काँटेदार होता है । लकड़ी दृढ़, सारभाग-नारङ्गी या चमकीले लाल रंग का होता है । पत्ते- संयुक्त, उपपक्ष ८ से १२ जोड़े; पत्रक-१० से १८ जोड़े, ³/४ इञ्च तक लम्बे, आयताकार, न्यूनाधिक विनाल, गोलाग्र CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA