भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 429

३७८ भावप्रकाशनिघण्टुः ८. लालचन्दन हिं०—लाल चंदन, रक्तचंदन। बं०, म०—रक्तचंदन। गु०—रतांजली। ते०—रक्तचंदनम्। ता०—शेन् चंदनम्। पं०, मा०—लाल चंदन। मला०—रक्तशंदनम्। फा०—संदले सुर्ख। अ०—संदले अह्मर। अं०—Red Sanders Wood (रेड सॅण्डर्स वुड); Red Sandal Wood (रेड सॅण्डल वुड)। ले०—Pterocarpus santalinus, Linn. f. (प्टेरोकार्पस् सॅण्टॅलिनस्, लिन.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह दक्षिण भारत में विशेष कर कुडापा, उत्तर आरकोट, कर्नूल के दक्षिण भाग एवं चिंगलपुट में १५०० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। यह दक्षिण भारत तथा फिलीपाइन द्वीपों में नैसर्गिक रूप में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष—२५ फुट तक ऊँचा होता है। छाल—कालापन युक्त भूरे रंग की, लकड़ी—दृढ़ तथा काष्ठसार— अत्यंत कठिन एवं कालापन युक्त लाल रंग का होता है। पत्ते—संयुक्त, प्रायः पत्रक तीन, १ १/२-३ इञ्च लम्बे, गोलाई युक्त अंडाकार एवं कुण्ठिताग्र होते हैं। पत्तों के अधोपृष्ठ हलके वर्ण के एवं मृदु रोमश होते हैं। फूल—अल्प, पीताभ श्वेत एवं सवृंतकाण्डज गुच्छों में आते हैं। फलियाँ—करीब १ १/२ इञ्च व्यास की, टेढ़ी, आधार की तरफ कम चौड़ी एवं छोटे से डंठल से युक्त होती हैं। इसके काष्ठसार का औषध में व्यवहार किया जाता है। यह गहरे काले से लाल रंग का, अत्यंत कठोर, वजन में भारी एवं रेशेदार होता है। यह लम्बाई में आसानी से टूट जाता है। इसके सफाई से कटे हुये अनुप्रस्थ विच्छेद में (Transverse section) वार्षिक चक्र (Annual rings) नहीं होते किन्तु गहरे रंग की घन काष्ठतंतुओं (Wood fibres) की स्पर्श समतलीय (Tangential) पट्टियाँ (Bands) होती हैं जो कम चौड़ी, हलके रंग की काष्ठ तंतुमित्तिक (Wood parenchyma) की करीब-करीब संतत पट्टियों से एकांतरित रहती हैं। इन पट्टियों के अन्दर के किनारों पर महावाहिनियाँ (Vessels) दूर-दूर पर विन्यस्त रहती हैं। इन पट्टियों को समकोण में काटती हुई अत्यंत महीन, हलके रंग की मज्जक किरणें (Medullary rays) होती हैं जो १० गुना बड़ा करके ही देखी जा सकती हैं। इसका बुरादा बाजार में मिलता है। इससे मद्यसार का रंग गहरा लाल हो जाता है लेकिन जल में बहुत कम इसका भाग घुलता है। इसमें गन्ध नहीं होती तथा स्वाद कुछ कसैला होता है। नोट—यद्यपि इसे रक्तचंदन कहा गया है तथापि इसमें चंदन के समान सुगंध नहीं होती। रा० नि० में एक सुगंधि युक्त लालचंदन का उल्लेख 'हरिचंदन' नाम से किया है लेकिन यह भी लिखा है कि यह दिव्य होता है एवं दुर्लभ होता है। कुछ लोगों ने रक्तचंदन से पतंग का ग्रहण किया है क्योंकि वह भी रक्तचंदन से मिलता-जुलता होता है लेकिन वह इस वृक्ष से अलग वृक्ष है जिसका आगे वर्णन दिया गया है। 'निघण्टुआदर्श' में कुचंदन का ले० नाम अंडेनेन्थेरा पॅह्वोनिना लिन० (Adenanthera pavonina Linn.) बं०—रक्तकंबल; बम्ब०—थोरलीगुञ्ज, बाल; हिं०—बड़ी गुमची, रक्तचंदन लिखकर 'वनौषधि दर्पण' से उद्धृत उसकी टीका में लिखा है कि 'कुचंदन यह रा० नि० का पतंग है जिसका रक्तचंदन के स्थान पर प्रयोग किया जाता है।' लेकिन पतंग का वृक्ष अलग होता है जिसे सिझल्पिनिआ सप्पन कहते हैं। बड़ी घुमची को रक्तचंदन अथवा पतंग मानना उचित नहीं। इस प्रकार रक्तचंदन एवं पतंग के अलग-अलग वृक्ष पाये जाते हैं। केवल रा० नि० का सुगंध युक्त लालचंदन (हरिचंदन) अभी तक नहीं प्राप्त हो सका है। संभव है वनस्पतियों का व्यापक अनुसंधान होने पर इस विषय का अंतिम निर्णय किया जा सके। रासायनिक संगठन—इसमें सॅण्टॅलिन् (सॅण्टॉलिक एसिड) [Santalin (santalic acid)] नामक एक रञ्जक द्रव्य तथा डेस्ऑक्सि सॅण्टलिन् नामक एक अन्य पदार्थ पाया जाता है। सॅण्टॅलिन् से मद्यसार में रक्त के समान लाल रंग, ईथर में पीला, अमोनिया एवं दाहक क्षार में नीललोहित रंग आता है। यह जल में नहीं घुलता। इसके अतिरिक्त लालचन्दन में प्टेरोकार्पिन (Pterocarpin), होमो-प्टेरोकार्पिन (Homo-pterocarpin) एवं सॅण्टाल् ये तीन रंगहीन रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें मद्यसार में घुलनशील पदार्थ २% से कम एवं राख २% से अधिक न होनी CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA