भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 422, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ३७१ ४. लता कस्तूरी हिं०, बं०-लताकस्तूरी, कस्तूरी दाना, मुष्कदाना। म०-कस्तूरीभेंडा। मा०-मुष्कदाणा। गु०-लता कस्तूरी। ते०-कर्पूरीभेंड। ता०-वेत्तिलै कस्तूरी, कट्टुक कस्तूरी। पं०-धोनार कस्तूरी। अ०-इब्बुलमि(मु) ष्क। फा०- मुष्कदाना। अं०-Musk-mallow (मस्क-मॅल्लो)। ले०-Hibiscus abelmoscheus, Linn. (हिबिस्कस् एबेल्-मोस्कस्, लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेंसी)। यह बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा विशेषकर इस देश के गरम प्रदेशों में उत्पन्न होती है। इसको बागों में लगाते हैं और यह आप ही आप जंगली भी उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-२-३ फुट तक ऊँचा, रोमश तथा जंगली भिंडी के क्षुप के आकार वाला होता है किन्तु कहीं-कहीं इससे भी ऊँचा क्षुप देखने में आता है। पत्ते-भिंडी के पत्तों के आकारवाले, गोलाकार गहरे कटे किनारीदार एवं तीन से पाँच भागों में विभक्त रहते हैं। फूल-भिंडी के फूलों के समान ही ३-४ इञ्च के घेरे में घंटाकार चमकीले पीले रंग के होते हैं। फली-२॥-३ इञ्च लम्बी, पहलदार रोमश किञ्चित् नुकीली भिंडी की ही तरह होती है और बीज-भिंडी के बीजों के समान किन्तु वृक्काकार, कुछ चिपटे तथा काले रंग के होते हैं। इन बीजों को मसलने से कस्तूरी की तरह गंध आती है। इसके पत्र, मूल तथा बीजों का औषध में व्यवहार किया जाता है। लताकस्तूरी के नाम से यह बोध होता है कि इसकी लता होती है। 'निघण्टुरत्नाकर' में लिखा है कि इसकी लता दक्षिण में पाई जाती है परन्तु लता देखने में नहीं आती, इसका क्षुप ही होता है जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। श्रीविश्वनाथजी द्विवेदी अपनी भावप्रकाश की टीका में लताकस्तूरी का पर्याय वेद्मुश्क लिखते हैं। वास्तव में वेद्मुश्क लताकस्तूरी से अलग है तथा उसका लेटिन नाम सॅलिक्स कॅप्रिया (Salix caprea Linn.) है। चरक-सुश्रुतादि ग्रन्थों में मुखशुद्धि के लिये एवं मुख में रुचि तथा सुगन्धि लाने के लिये मुख में धारण करने के लिये जातीफल, कटुक, पूग, कंकोल, ताम्बूल, सूक्ष्मैला, लवङ्ग एवं कर्पूर का उपयोग लिखा है। टीकाकारों ने कटुक शब्द का अर्थ लताकस्तूरी किया है। कुछ लोगों ने कटुक का अर्थ लघुकक्कोल (छोटी कबाबचीनी) किया है तथा कक्कोल का अर्थ बृहत्कक्कोल (बड़ी कबाबचीनी) किया है। रासायनिक संगठन-इसमें गोंद, एक रवेदार पदार्थ, सुगन्धद्रव्य, राल, अल्ब्यूमिन एवं एक उड़नशील तैल रहता है। यह तैल हरापन लिये पीला होता है तथा वायु में खुला रखने पर गाढ़ा हो जाता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज शीतल, दीपन, वाजीकर, बल्य, वातानुलोमक, नेत्र्य, रोचक, बस्तिशोधक, तृषाशामक एवं उद्वेष्टननिरोधी हैं। इनका उपयोग कफरोग, बस्तिविकार, मुखरोग, अपतन्त्रक, दुर्बलता, स्नायुदौर्बल्य, कुपचन, अग्निमान्द्य एवं ज्वर में किया जाता है। (१) इसके फाण्ट को २ से ४ तोले की मात्रा में कफविकार, तमकश्वास एवं ज्वर में दिया जाता है। इससे श्वासमार्ग में स्निग्धता उत्पन्न होकर श्वासनलिकाओं का उद्वेष्टन दूर होता है। उत्तेजक होने के कारण इससे हृदय को भी बल प्राप्त होता है। (२) इसको मुख में रखकर चबाने से मुख स्वच्छ एवं सुगन्धित होता है तथा खाने पर रुचि बढ़ती है। स्वरभङ्ग एवं मुखशोथ में इसका धूम्रपान उपयोगी है। (३) २ १/२ औंस बीज तथा २० औंस मद्यसार में इसका टिंक्चर बनाकर १-२ ड्रा० की मात्रा में उत्तेजक, उद्वेष्टननिरोधी एवं वातानुलोमक रूप में अपतंत्रक, दुर्बलता तथा अन्य वातिक विकारों में दिया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA