भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 423, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें३७२ भावप्रकाशनिघण्टुः (४) सूखी खुजली में दूध में पीसकर इसके उबटन का प्रयोग किया जाता है। सर्पदंश पर इसके चूर्ण को मद्यसार में भिगोकर लगाते हैं तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं। महीन चूर्ण को नेत्र में लगाने से लाभ होता है। (५) इसके मूल तथा पत्तों का लुआब निकाल कर मिश्री मिलाकर सोजाक, रतिजन्य रोग एवं बस्तिविकारों में दिया जाता है। शुक्रमेह में बीजों का चूर्ण खिलाते हैं। (६) औषधीय तैलों को सुगन्धित करने के लिये इसके बीजों का उपयोग किया जाता है। (७) कॉफी के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। अधिक मात्रा- २ ड्रा० से अधिक टिंकचर के प्रयोग से शिरःशूल एवं चक्कर आते हैं। मात्रा- चूर्ण २-४ माशा; टिंकचर- १-२ ड्रा०। अथ गन्धमार्जारवार्यम् (जबादकस्तूरी) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह गन्धमार्जारवीर्यन्तु वीर्यकृत्कफवातहृत्। कण्डूकूष्ठहरं नेत्र्यं सुगन्धं स्वेदगन्धनुत् ।।१०।। गन्धमार्जार का वीर्य अर्थात् जबादकस्तूरी के गुण-गन्धमार्जारवीर्य-वीर्यजनक, कफवातनाशक, खुजली तथा कुष्ठ को दूर करने वाला, नेत्रों के लिये हितकर, सुगन्धयुक्त तथा पसीने की दुर्गन्ध को दूर करनेवाला होता है। [१०] ५. जबाद कस्तूरी हिं०- जबाद कस्तूरी, जबाद, बेद अञ्जीर, मुश्क बिलाव कस्तूरी, गन्ध ओतु। गु०-जवादियाँ कस्तूरी। ता०- पुनुग, जबादी। अ०-ज(जु) ब्बाद्, ज(जु) बाद। अं०-Civet (सिह्वेट)। प्राणिनाम-हि०-मुश्क बिल्ली, खतास। ने०-भ्रान। बं०-माचमोंदर, बगदास, 'पूडोगंद। ता०-पुनुगु पूने। फा०-गुर्बए जबाद। अं०-Civet cat (सिह्वेट कॅट)। ले०-Viverra zibetha, Linn. (वाइवेरा झिबेथा, लिन.)। यह सुगन्धित पदार्थ गन्धमार्जार नामक एक अकार की बिल्ली के पूँछ के नीचे की थैली से प्राप्त द्रव्य है। यह प्राणी अफ्रिका, दक्षिण एशिया एवं भारतवर्ष के मालावार प्रान्त में पाया जाता है। इसका कद बिल्ली का सा किन्तु दुम बड़ी लम्बी होती है। शरीर पर गहरे रंग के धब्बे होते हैं। गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में पूँछ के नीचे एक बड़ी थैली होती है जो दो भागों में विभक्त रहती है। इस थैली में जो द्रव पदार्थ बनता है उसको भी सिह्वेट ही नाम दिया जाता है। प्राकृतिक दशा में सिह्वेट की गन्ध अत्यन्त तीक्ष्ण या असह्य होती है, किन्तु जब वह अन्य वस्तुओं के साथ मिलाकर तैयार की जाती है, तो उसमें कस्तूरी की सी सुगन्ध आने लगती है। इस बिल्ली को एक तंग पिंजरे में खड़ाकर देते हैं और थैली में से द्रव पदार्थ को निचोड़ लेते हैं। मलावार की तरफ कृषक लोग खेतों में बाँस गाड़ देते हैं। यह मार्जार उस पर अपना शिश्न घर्षण करके वीर्य निकाल देता है जो बाँस पर लग जाता है। कृषक लोग उसे संग्रह करके बेच देते हैं। कई लोग इस मार्जार को मारकर उसका अण्डकोष उल्टा करके ग्रन्थियाँ फेंक देते हैं और उल्टे हुवे कोष में तृण भरकर शुष्क करके बेच देते हैं। कलकत्ता में यह शुष्क कोष 'खट्टाशी' नाम से मिलता है। बंगाली वैद्य नारायण तैल आदि को सुगन्धित करने के लिये खट्टाशी उसमें छोड़कर मन्द अग्नि से पकाते हैं। गन्धमार्जारवीर्य नया होने पर पीताभ श्वेत वर्ण का, नरम और प्रायः मधु के समान गाढ़ा होता है। पुराना होने पर रंग में कुछ श्यामता आ जाती है। यह श्वेत रंग का निकृष्ट समझा जाता है। दक्षिण भारत के बंगलोर, मैसूर, मदुरा आदि शहरों में यह पुनुग या जबादी नाम से सुगन्धि द्रव्य बेचने वालों के यहाँ मिलता है। इसमें छोटे बाल, तन्तु, लकड़ी तथा अमोनिया आदि मिले रहते हैं। परीक्षा-'गंजबादावर्द' में जबाद की परीक्षण विधि इस प्रकार लिखी है—