भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 1167 में से

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कर्पूरादिवर्गः ४२१ खस के नाम तथा गुण— 'वीरण' नामक घास के जड़ को 'खस' कहते हैं। उसके संस्कृत नाम-उशीर, नलद, अमृणाल, सेव्य और समगन्धिक ये सब हैं। खस—पाचक, शीतवीर्य, स्तम्भन, लघु, तिक्त तथा मधुर रस युक्त होता है और यह ज्वर, वमन, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, दाह, मूत्रकृच्छ्र और व्रण को दूर करने वाला होता है। [८६-८८] ३३ वीरण-खस हिं०-खस, वीरन मूल, गांडर, बेना। बं०-वेणर मूल, खसखस। म०-वाला। गु०-वालो। क०- मुडिवाल। ते०-वेट्टिवेलु। फा०-रेशये वाला, बीखेवाला। अं०-Cuscus grass (कस्कस ग्रास) ले०-Andropgon muricatus Retz. (एण्ड्रोपोगोन् म्यूरिकैटस् रेझ); Vetiveria zizanioides (Linn.) Nash (वेटिवेरिया झाइझेनिओइडिस् (लिन) नॅश)। Fam. Gramineae (ग्रॅमिनी)। यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। यह अधिकतर खुले हुये दलदल वाले स्थानों में होता है। खस—तृणजातीय औषधि का क्षुप २ से ५ फुट तक ऊँचा एवं दृढ़ होता है। यह गुच्छबद्ध और समूह बद्ध होकर उगता है। पत्ते—सरकण्डे के समान १-२ फुट लम्बे और पतले होते हैं। ये दो कतारों में तथा आधार पर परस्पराच्छादित रहते हैं। मूलीयपत्र कुछ अधिक लम्बे रहते हैं। मध्यशिरा दबी हुई तथा पत्तों के किनारों पर दूर-दूर पर तीक्ष्ण काँटे रहते हैं। फूलों का घनहरा पीलापन या किंचित् लाली युक्त होता है। इसकी जड़ सुगन्धित होती है। इसी को खस कहते हैं। औषध के अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु में इसके बने परदे एवं पंखों आदि का उपयोग किया जाता है। सुगन्धि के लिये इसके इत्र का भी बहुत व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल, राल, रंजक पदार्थ, अम्लद्रव्य, चूने का लवण, लौहभस्म तथा काष्ठयुक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—खस शीतल, तिक्त, स्तम्भक, पाचक, पित्तनाशक, मूत्रजनक, पसीने की दुर्गन्ध दूर करने वाला, ज्वरहर, दाहशामक, स्तन्यजनक, वमन को रोकने वाला, श्रमहर एवं जल को सुगन्धित करने वाला है। इसका उपयोग फांट के रूप में पित्तज्वर, प्रसूति ज्वर, तृष्णा, दाह, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, विष, स्वेद दुर्गन्धि, वमन, कुष्ठ एवं आमाशयिक प्रक्षोभ आदि में किया जाता है। इसका लेप दाह, त्वचा के रोग तथा पसीने को रोकने वाला है। (१) वमन को रोकने के लिये १/२ तो० खस को १ पाव उबलते जल में डालकर उसके फांट को पिलाते हैं। इसके साथ धनियाँ का भी उपयोग लाभदायक है। विसूचिका में वमन रोकने के लिये २ बूँद इत्र बताशा में भरकर खिलाते हैं। (२) पसीने की अधिकता तथा मसूरिका में इसका लेप किया जाता है। (३) लोहबान के साथ चिलम में रखकर या सिगरेट बनाकर इसका धूम्रपान करने से शिरःशूल दूर होता है। मात्रा-२-४ माशा। अथ जटामांसी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह जटामांसी भूतजटा जटिला च तपस्विनी। मांसी तिक्ता कषाया च मेध्या कान्तिबलप्रदा। स्वाद्धी हिमा त्रिदोषास्रदाहवीसर्पकुष्ठनुत् ।।८९।। जटामांसी (बालछड़) के नाम तथा गुण—जटामांसी, भूतजटा, जटिला, तपस्विनी और मांसी ये सब संस्कृत नाम जटामांसी के हैं। जटामांसी (बल छड़)—तिक्त तथा कषाय रस युक्त, मेधाजनक, कान्तिकारक, बलप्रद, स्वादिष्ट और शीतवीर्य होता है और यह त्रिदोष, रक्तप्रकोप, दाह, वीसर्प एवम् कुष्ठ को दूर करने वाली होती है। [८९] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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