भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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४२२ भावप्रकाशनिघण्टुः ३४. जटामांसी हिं०—जटामांसी, बालछड़ । बं०, गु०, म०—जटामांसी । ते०—जटामांशी । क०—जेटामवाशा । पं०— बिल्लीलोटन । ता०—जटामाशी । का०—भूतिजटा । सु०—सम्बुल । फा०—नारदे हिन्दी । अ०—सुंबुलुत्तीबे हिन्दी, सुम्बुले हिन्दी । अं०—Spikenard (स्पाइकनार्ड); Indian Nard (इण्डियन नार्ड); Nardus root (नार्डस् रूट) । ले०—Nardostachys jatamansi DC. (नार्डोस्टॅकिस् जटामांसी डीसी.) । Fam. Valerianaceae (वॅलेरियॉनंसी) । जटामांसी—यह हिमालय के जङ्गलों में कुमाऊँ से सिक्किम तक १७ हजार फीट की ऊँचाई पर तथा भूटान में उत्पन्न होती है । इसका बहुवर्षायु क्षुप सीधा खड़ा रहता है । राइजोम (भौमिक तना) काष्ठमय, लम्बा, मजबूत एवं सूखे हुये रेशेदार पर्णवृन्त से युक्त रहता है । भूमि के ऊपर जड़ से कई शाखाएँ निकलती हैं और वे ६-७ इञ्च तक सघन बारीक जटाकार रोवें से भरी रहती है । पत्ते—जटा को छोड़कर ऊपर ६-७ इञ्च लम्बे तथा १ इञ्च चौड़े, जड़ की ओर संकुचित, मृदु रोमश या चिकने मूलीय पत्ते रहते हैं । काण्डपत्र—एक या दो जोड़े, १-३ इञ्च लम्बे, अवृन्त, आयताकार या उपलट्त्वाकार होते हैं । डंडियों के अन्त में सफेद या किंचित् गुलाबी रंग के छोटे-छोटे फूलों के गुच्छे लगते हैं । फल—छोटे-छोटे गोल, सफेद रोएँदार तथा उनके ऊपर बाह्यकोष के अंडाकार, तीक्ष्ण, दन्तुर बाह्यदल लगे रहते हैं । इसके सूखे हुए राइजोम (भौमिक तना) तथा मूल का औषध में व्यवहार किया जाता है । इसका मूल गहरे धूसर (Grey) रंग का, छोटी अंगुली के बराबर मोटा तथा रक्ताभ भूरे रंग के रोओं से युक्त होता है । ये रोएँदार तन्तु इसके सूखे हुये पर्णवृन्त तथा मूल के भाग हैं जिनके आपस में मिलने से जटासी बन जाती है । अन्दर से यह रक्ताभ भूरे रंग की होती है । इसमें एक प्रकार की विशिष्ट गन्ध (असली तगर के समान) होती है तथा इसका स्वाद सुगन्धियुक्त कडुवा होता है । इसको हमेशा ताजी खरीदना चाहिये । नोट—अन्य निघण्टुओं में गन्धमांसी, आकाशमांसी, कृष्णा सुगन्धमांसी आदि भेद लिखे हुए हैं । प्राचीन ग्रन्थों में इसके स्वतन्त्र उपयोग बहुत कम मिलते हैं । रासायनिक संगठन—इसमें का प्रधान तत्त्व एक उड़नशील तैल है जो ०.३-०.४% पाया जाता है । यह तैल हलके पीले रंग का कुछ हरिताभ, जल से हलका, हवा में जमने वाला, कपूर के समान गन्ध वाला, कड़वा तथा तीता होता है । इस तैल में ईस्टर, अल्कोहल तथा सेस्क्वी टर्पेन हाइड्रोकार्बन पदार्थ होते हैं । इस तैल के अतिरिक्त जटामांसी में ३% एक रवेदार किन्तु जल में न घुलने वाला अम्ल द्रव्य तथा राल पाई जाती है । गुण और प्रयोग—जटामांसी शीतल, सुगन्धित, दीपन, पाचन, बल्य, रक्ताभिसरणोत्तेजक, उद्वेष्टननिरोधि, वातानुलोमक, मूत्रल, मृदुविरेचक, आर्तवजनन, वातनाड़ीशामक, संज्ञास्थापन, मेध्य, त्रिदोषघ्न, केश्य, ज्वरहर, त्वग्दोषहर, कान्तिवर्धक, वेदनास्थापन, हृदयबल्य एवं सौमनस्य जनन है । इसके सेवन से क्षुधा बढ़ती है, पाचन ठीक होता है किन्तु कोष्ठबद्धता नहीं होती । इसके सेवन से उदर में उष्णता मालूम होती है, डकार आती है, संपूर्ण शरीर में उष्णता मालूम होकर पसीना आता है, मूत्र की मात्रा बढ़ती है तथा नाड़ी सबल होती है । मस्तिष्क एवं नाड़ी तन्तुओं पर इसकी पोषक तथा उत्तेजक क्रिया होती है । अल्प मात्रा में बहुत दिन देते रहने से मन की चञ्चलता शान्त होती है, काम करने में उत्साह बढ़ता है तथा नाड़ी का बल बढ़ता है । अपस्मार, अपतन्त्रक तथा अन्य आक्षेपयुक्त व्याधियों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है । (१) मस्तिष्क तथा नाड़ी तन्तुओं के विकारों में जटामांसी बहुत लाभप्रद होती है । शराबियों को व्रण होने पर या उन पर कोई शस्त्रक्रिया करने पर उनको एक तरह का भ्रमणयुक्त कम्प उत्पन्न होता है । ऐसी अवस्था में जटामांसी के प्रयोग से पर्याप्त लाभ होता है । अत्यन्त मानसिक परिश्रम या अस्थैर्य से थकावट उत्पन्न होने पर इसका सेवन नाड़ियों