भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 474

कर्पूरादिवर्गः ४२३ के लिए बलकारक तथा श्रमहर होता है। अपतन्त्रक में इससे आवेग कम होते हैं। शिरःशूल के लिये यह उत्कृष्ट औषध है। मानसिक आघात में यह बहुत जल्दी काम करती है। हिंग, कस्तूरी आदि की अपेक्षा जटामांसी इन विकारों में अधिक उपयोगी तथा शीघ्र कार्यकर मानी जाती है। भूतावेश जैसी चेष्टाओं में जटामांसी, ब्राह्मी स्वरस तथा घोड़बच का मधु के साथ प्रयोग करते हैं। अपस्मार, अपतन्त्रक, हृदय की धड़कन, कम्पवात तथा अन्य आक्षेपयुक्त व्याधियों में इसका फाण्ट बहुत प्रभावशाली माना जाता है। इनमें इसे १ से २ औंस की मात्रा में दिन में ३ बार पिलाते हैं। अपस्मार में इसके तैल का २-५ बूँद की मात्रा में सेवन कराया जाता है। (२) रक्ताभिसरण ठीक न होता हो तो यह बहुत ही उपयुक्त औषध है। इससे मस्तिष्कगत रक्तप्रवाह सन्तुलित- होता है जिससे सर का भारीपन, चक्कर, मूर्च्छा, आँखों के सामने अँधियारी, सुनाई कम पड़ना आदि में लाभ होता है। हृदय की धड़कन, कमजोरी तथा हृदय के कारण उदर में वायु सञ्चित होने पर इसे सुगन्ध द्रव्य तथा नवसादर के साथ खिलाते हैं। इससे रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तपित्त, विसर्प तथा रक्तस्राव से लाभ होता है। (३) जटामांसी ४, दालचीनी १, शीतलचीनी १, सौंफ १, सोंठ १ तथा मिश्री ८ भाग इनके चूर्ण को ३-९ माशे की मात्रा में आध्मान, शूल, आमाशयिक शूल तथा आक्षेप-युक्त विकारों में देते हैं। बच्चों के आध्मान, उदरशूल, सुशिक्षितों तथा नाजुक प्रकृति की स्त्रियों के मन्दशूल, कुपचन आदि पाचन संस्थान के विकारों में जटामांसी और नवसादर के साथ सुगन्धि द्रव्यों को मिलाकर देते हैं। इससे पित्त का स्राव ठीक होकर पाचन सुधरता है। (४) औपसर्गिक शोथयुक्त ज्वरों में त्रिदोष की वृद्धि होने से रोगी प्रलाप करता है तथा सन्निपात के लक्षण दिखलाई देने लगते हैं। इन अवस्थाओं में इसके प्रयोग से शीघ्र लाक्षणिक लाभ होता है। इससे रक्ताभिसरण ठीक होता है, नाड़ी तन्तुओं को बल मिलता है, कफ ढीला होता है, दाह कम होता है तथा शोथ में भी लाभ होता है। विषम ज्वर में भी इससे पर्याप्त लाभ होता है। (५) विस्फोट एवं व्रणों में इसके लेप से जलन तथा पीड़ा कम होती है। मुखपाक में भी इससे जलन तथा पीड़ा का शमन होता है। झाँई-व्यङ्ग आदि त्वग्दोषों में उबटन के रूप में व्यवहार करने से त्वचा की कान्ति बढ़ती है। यह बालों के लिये भी लाभदायक है। शिरःशूल में इसका लेप करते हैं। दन्तशूल में इससे मञ्जन कराते हैं। मुखदुर्गन्ध में इसे चबाते हैं। स्वेदाधिक्य में इसके चूर्ण का उपयोग मर्दन के लिये करते हैं। बेहोशी में इसे पीसकर आँखों पर लेप करते हैं। (६) पीड़ितार्तव में इसके सेवन से पीड़ा कम होती है तथा आर्तव स्राव ठीक होने लगता है। स्त्रियों में रजोनिवृत्ति के काल में कुछ विशिष्ट मानसिक तथा शारीरिक अवसाद के लक्षण उत्पन्न होते हैं ऐसी अवस्थाओं में जटामांसी बहुत उपयोगी होती है। मात्रा-५-१० रत्ती। अथ शैलेयम् (भूरिछरीला)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह शैलेयन्तु शिलापुष्पं वृद्धं कालानुसार्यकम् ।। ९० ।। शैलेयं शीतलं हृद्यं कफपित्तहरं लघु। कण्डूकुष्ठाश्मरीदाहविष¹ हृद् गुदरक्तहृत् ।। ९१ ।। शैलेय (भूरिछरीला) के नाम तथा गुण- शैलेय, शिलापुष्प, वृद्ध और कालानुसार्यक ये सब संस्कृत नाम भूरिछरीला के हैं। भूरिछरीला-शीतवीर्य, हृद्य (हृदय को हितकर), कफ तथा पित्तनाशक, लघु एवम् खुजली, कुष्ठ, पथरी, दाह, विष तथा गुदा से रक्त गिरना इन सबको दूर करने वाला है। १. विषहृल्लासरक्तजित् इति पाठ०।