भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 475

४२४ भावप्रकाशनिघण्टुः ३५. छरीला हिं०—छरीला, भूरिछरीला, पत्थरफूल । बं०—शैलज । म०—दगडफूल । गु०—पत्थरफूल, छडीलो । क०— कल्लूहुवु । ते०—शैलेय मनेद्रव्यमु, रतिपंचे । ता०—कलपसी । फा०—उशनह, गुलेसंग । अ०—उश्नः । अं०— Stone flowers (स्टोन फ्लावर्स); Yellow Lichen (यलो लाइचेन) । ले०—Parmelia perlata Ach. (पार्मेलिया परलॅटा आक०) । Fam. Parmeliaceae (पार्मेलियॅसी) । छरीला—यह क्षुद्र वनस्पति पहाड़ी जमीन के पत्थरों पर उत्पन्न होती है और जान पड़ता है मानो यह पत्थर से ही अपना आहार लेती है। यह हिमालय और नीलगिरि के पहाड़ों पर पाई जाती है। यह वृक्षों और दीवालों पर भी पाई जाती है । यह हरी पेडीसी सञ्चित होकर जब सूख कर उतरती है तब इसके ऊपर का पृष्ठ काला और नीचे का सफेद होता है । जो अधिक सफेद होती है वही अच्छी समझी जाती है । इसकी कई जातियाँ पाई जाती हैं । इसका स्वाद फीका तिक्त-कषाय होता है । औषध के लिये हमेशा नया तथा सुगन्धयुक्त छरीला काम में लेना चाहिये । रासायनिक संगठन—इसमें पीत रवेदार पदार्थ, गोंद, लाइचेनिन एवं क्राइसोफेनिक् एसिड, ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—छरीला शीतल, सुगन्धित, हृद्य, सौम्य, मूत्रल, दीपन, वेदनास्थापन, ग्राही एवं शोथहर है । यह कफ, पित्त, दाह, तृषा, वमन, श्वास, व्रण, कण्डू, अश्मरी, विष, हल्लास, गुदरक्तस्राव एवं रक्तविकार दूर करने वाला है । पेशाब रुकने पर १ तो० छरीला के फांट में मिश्री एवं जीरा मिलाकर पिलाते हैं तथा इसे गरम जल में भिंगोकर कमर पर बाँधते हैं। इसे ठण्डे जल में पीस कर सर पर लेप करने से शिरःशूल दूर होता है । व्रण पर इसे लगाने से लाभ होता है । यकृत् शूल निवारण के लिये इसका उपयोग करते हैं । अञ्जन के योगों में भी इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा—२-४ माशा । अथ मुस्तकं-नागरमुस्तकञ्च । (मोथा-नागरमोथा) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह मुस्तकं न स्त्रियां मुस्तं त्रिषु वारिदनामकम् । कुरुविन्दश्च संख्यातोऽपरः क्रोडकसेरुकः ।।९२।। भद्रमुस्तश्च गुन्द्रा च तथा नागरमुस्तकः । मुस्तं कटु हिमं ग्राहि तिक्तं दीपनपाचनम् ।।९३।। कषायं कफपित्तास्रतृड्ज्वरारुचिजन्तुहृत् । अनूपदेशे यज्जातं मुस्तकं तत्प्रशस्यते । तत्रापि मुनिभिः प्रोक्तं वरं नागरमुस्तकम् ।।९४।। मोथा तथा नागरमोथा के नाम और गुण—मुस्तक (इसका स्त्रीलिङ्ग को छोड़ कर शेष लिङ्गों में प्रयोग होता है, मुस्तं (यह तीनों लिङ्गों में होता है), वारिदनामक (मेघवाची सभी शब्द) और कुरुविन्द ये सब संस्कृत नाम मोथा के हैं । दूसरे प्रकार का जो मोथा है जिसे नागरमोथा कहते हैं, उसके संस्कृत नाम—क्रोडकसेरुक, भद्रमुस्त, गुन्द्रा तथा नागरमुस्तक ये सब हैं । मोथा—कटुतिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतवीर्य, ग्राही, अग्निदीपक तथा पाचक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तकोप, तृषा, ज्वर, अरुचि और कृमि का नाशक होता है । जो 'मोथा' अनूप देश में उत्पन्न होता है वही श्रेष्ठ होता है । उसमें भी मुनियों ने 'नागरमोथा' को ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है । ३६. मोथा हिं०—मोथा । बं०—मुता, मुथा । म०—मोथा, बिम्बल भद्रमुष्टि । गु०—मोथ । क०—कोरनारि । ते०—तुंगमुस्ते । ता०—कोरइ किलांगु । फा०—मुष्के जमीं । अ०—सोअ(अ)द कूपी । अं०—Nutgrass (नट्ग्रास) । ले०—Cyperus rotundus Linn. (साइपेरस् रोटण्डस् लिन.) । Fam. Cyperaceae (साइपेरॅसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA