भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ४२५ मोथा इस देश के सब प्रान्तों में बहुलता से होता है। यह तृणजातीय वनस्पति बारहो मास पायी जाती है किन्तु बरसात में सर्वत्र देखने में आती है। इसमें मूलीय पत्रगुच्छ होता है जो एक कठोर कन्द सदृश भौमिककाण्ड से निकलता है। नीचे सूत्राकार अन्तर्भूमिशायी कांड भी प्रायः होते हैं जिनसे पौन से एक इञ्च के घेरे में अंडाकार कंद निकले रहते हैं जो कसेरू के समान ऊपर से काले रंग के और भीतर से लालीयुक्त सफेद होते हैं और इनमें सुगन्ध आती है। डंडी- पतली, ६ से २४ इञ्च तक ऊँची, त्रिकोणाकार तथा पत्तों के बीच से निकली रहती है। पत्ते-लम्बे और पतले होते हैं। डंडी के अग्र पर समस्थमूर्धजक्रम में पुष्पवाहक शाखायें निकलती हैं जो छोटे-छोटे अवृन्त काण्डजव्यूहों का संयुक्तव्यूह होती हैं। पुष्पव्यूह का आधार भाग तीन पत्र सदृश कोणपुष्पकों से घिरा रहता है। इसके काले-काले कंदों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। नोट-भावप्रकाशकार ने मोथा एवं नागरमोथा ये दो भेद यहाँ लिखे हैं तथा मुस्ता का एक अन्य कैवर्तमुस्ता (जलजमुस्ता, केवटीमोथा) भेद आगे लिखा है। नागरमोथा का ही दूसरा नाम भद्रमुस्ता लिखा है। अन्य निघण्टुओं में भद्रमुस्ता अलग लिखा है। सब मोथे के गुण करीब-करीब समान ही हैं तथा एक दूसरे के स्थान पर इनका उपयोग किया जा सकता है। अनूप देश में होने वाला नागर मोथा अधिक प्रशस्त माना गया है। यह हमेशा ताजा तथा सुगन्धयुक्त खरीदना चाहिये। रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगन्धित उड़नशील तैल, वसा, शर्करा, गोंद, कार्बोहाइड्रेट, ॲल्ब्यूमिन सदृश पदार्थ, तन्तु तथा राख एवं अत्यल्प मात्रा में क्षाराम आदि पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-मोथा ग्राही, दीपक, पाचक, स्वेदजनक, मूत्रजनक, स्तन्यवर्धक, आर्तवजनक, किञ्चित गर्भाशयोत्तेजक, केशवर्धक, व्रणरोपक एवं कृमिघ्न है। (१) कुपचन, वमन एवं अतिसार यदि आमाशय तथा आन्त्र के विकारों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। आमातिसार में ताजे कन्द को आर्द्रक के साथ पीसकर मधु मिला कर खिलाते हैं। इसमें २० मोथे के कन्दों को ३ गुने दूध तथा जल में उबाल कर दूध शेष रहने पर छानकर पिलाते हैं। सभी प्रकार के अतिसार में इसके क्वाथ में (क्वाथ ठंडा होने पर) मधु मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। (२) स्वेदजनक, मूत्रजनक एवं उत्तेजक होने से यह ज्वर, ज्वरातिसार एवं पित्त ज्वर में उपयोगी है। (३) विसूचिका तथा मदात्यय में तृषा शान्ति के लिये इसके शीतल क्वाथ को पिलाते हैं। (४) अक्षिव्रण में इसे घृत में भूनकर पीसकर लगाने से ३, ४ दिन में लाभ होता है। आँख की फूली एवं लालिमा में बकरी के मूत्र में इसे पीसकर उसका अंजन किया जाता है। (५) इसकी ताजी जड़ को घिसकर गोघृत मिलाकर व्रण पर लगाते हैं तथा इसको जल में पीसकर दुग्धवृद्धि के लिये स्तन पर लेप करते हैं। (६) रोमन लोग आर्तवजनन औषध के रूप में गर्भाशय की बीमारियों में इसका व्यवहार करते थे। मात्रा-३-६ माशा। ३७. नागर मोथा हिं०-नागर मोथा। बं०-नागरमथा। म०-नागरमोथा, लवाला। मा०-नागर मोथो। गु०-नागरमोथ। क०- कोन्नरि गड्डे। ते०-नागमुस्तेलु। ता०-मुट्टाकाचि। फा०-मुष्के जमीं। अ०-सोअद कूपी। ले०-Cyperus scariosus R. Br. (साइपेरस् स्कॅरिओसस् आर. ब्र.)। Fam. Cyperaceae (साइपेरेंसी)।