भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 477

४२६ भावप्रकाशनिघण्टुः नागरमोथा-मोथे के समान तृणजातीय वनौषधि बंगाल, पेगु, उत्तर प्रदेश एवं पूर्व तथा दक्षिण के भागों के तालाब तथा सजल स्थान में पाया जाता है। इसकी डंडी १६ से ३६ इञ्च तक ऊँची, पतली त्रिकोणाकार होती है। जड़ के नीचे कंदवत् लम्बे-लम्बे, अंगुली प्रमाण मोटे, दबे हुये गहरे भूरे रंग के जो अन्तर्भूमिशायी काण्ड होते हैं उन्हीं को नागरमोथा कहते हैं जिनका चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-मोथा के समान। गुण और प्रयोग-नागरमोथा शीतल, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, ग्राही, स्वेदजनन, कफघ्न, मेध्य, तृष्णानिग्रहण, स्तन्यजनन, स्तन्यशोधन, कण्डूघ्न, मूत्रजनन, उत्तेजक तथा जन्तुनाशक है। इसका उपयोग मोथे के समान ही किया जाता है। यद्यपि इसमें इतने उपयुक्त धर्म हैं तथापि इसका प्रयोग अन्य औषधों के साथ अधिक किया जाता है। (१) अरुचि, आमातिसार, वमन, रक्तार्श तथा कुपचन में नागरमोथा गुणकारी है। संग्रहणी में इससे बहुत लाभ होता है। (२) ज्वर, प्रसूतिज्वर तथा पैत्तिक ज्वर में हमेशा इसका प्रयोग करना चाहिये। इससे प्यास कम होती है, पसीना आता है, उत्तेजना आती है, जीभ का स्वरूप अच्छा होता है, पेशाब साफ होता है तथा गर्भाशय का थोड़ा सा संकोच भी होता है। प्रसूता को दुग्ध शुद्धि तथा वृद्धि के लिये इसको खिलाते हैं तथा जल में घिस कर स्तन पर लेप करते हैं। इससे स्तन की दूध की गाँठें कम होती हैं। (३) परमा में नागरमोथा बहुत लाभदायक है। यह प्रथम एवं द्वितीयावस्था में दिया जाता है। (४) अपस्मार में उत्तर दिशा में होने वाले मोथे को पीसकर समान वर्ण वाली सबत्सा गौ के दुग्ध के साथ पिलाने से लाभ होता है। (५) इसका जन्तुघ्न धर्म अधिक मात्रा में देने से ही मालूम होता है। कंडू में इसका लेप किया जाता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ कर्चूरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कर्चूरो वेधमुख्यश्च द्राविड कल्पकः शटी। कर्चूरो दीपनो रुच्यः कटुकस्तिक्त एव च ।।९५।। सुगन्धिः कटुपाकः स्यात्कुष्ठाशोंव्रणकासनुत् । उष्णो लघुहरेच्छ्वासं गुल्मवातकफक्रिमीन् ।।९६।। कचूर के नाम तथा गुण-कर्चूर, वेधमुख्य, द्राविड, कल्पक और शटी ये सब संस्कृत नाम कचूर के हैं। कचूर-कटु तथा तिक्त रस युक्त, अग्निदीपक, रुचिकारक, सुगंध युक्त, पाक में कटुरस युक्त, उष्णवीर्य और लघु होता है एवं यह कुष्ठ, बवासीर, व्रण, खाँसी, श्वास, गुल्म, वात, कफ और कृमि इन सब रोगों का नाशक होता है। [९५-९६] ३८. कचूर हिं०-कचूर। बं०-शटी, एकांगी, शोरी, कचूरा। म०-कचोरा। गु०-कचूरो, षट् कचूरो। ते०-कचोरमु। ता०-किच्छिलिक किझंगु। क०-कचोरा। अ०-जरंबाद, एरकुल् काफुर। फा०-कजूर। अं०-Zedoary (झिडोअरी)। ले०-Curcuma zedoaria Rosc. (कर्क्युमा झेडोरिआ रास्) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरॅसी) । पूर्व हिमालय, सिंहल द्वीप, कनारा का तटीय प्रदेश तथा वर्मा के पश्चिम में यह आप ही आप उत्पन्न होता है और कई प्रान्तों में रोपित किया हुआ भी पाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 477, कुल 1167 में से · BharatKosha