भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 478

कर्पूरादिवर्गः ४२७ इसका क्षुप-तीन चार फीट ऊँचा हल्दी के समान होता है और जड़ के नीचे अनेक कंद होते हैं। उनको कचरा कर सुखा लेते हैं। इसी को कचूर कहते हैं। पत्ते-१-२ फीट लम्बे, आयताकार, लम्बाग्र और नीचे की ओर क्रमशः संकुचित होकर पत्रवृन्त में परिणत हो जाते हैं। ये कुछ कालापन लिये हुये तथा मध्य शिरा पर नीलारुण रंगीन धब्बों से युक्त होते हैं। पुष्पदंड पत्तियों के पहले निकलता है। कोणपुष्पक रक्ताभ और ऊपर के अपुष्प पत्र अधिक लाल होते हैं। फूल-नलिकाकार पीले रंग के आते हैं। फल-त्रिकोणाकार और बीज अंडाकार और सफेद होते हैं। अन्तर्भूमिशायी कन्द लंबगोल, भीतर हलके पीले और पूर्णतः विकसित रहते हैं। मूलाग्र कन्द अनेक और भीतर मुक्तावर्ण के होते हैं। अन्तर्भूमिशायी कंद कर्पूर तुल्य प्रियगंध वाले होते हैं। इन्हीं कंदों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों को मछली भूनने के काम में लाते हैं। इसी क्षुप के समान काली हल्दी का क्षुप होता है जिसका वर्णन पृ० ११८ पर किया गया है। कचूर का पर्याय शटी क्यों पड़ा इस सम्बन्ध में श्री ठा० बलवन्तसिंह जी का मत है कि प्राचीन ग्रन्थों में 'कचूर' का उल्लेख नहीं है, शठी का है। इस शठी (कपूरकचरी) की उपलब्धि कम होने के कारण उसके स्थान पर प्रतिनिधिरूप में कचूर का उपयोग होने लगा तथा उसे भी शठी नाम दे दिया गया। शटी (कचूर) और शठी (कपूरकचरी) यह थोड़ा सा नामभेद कोई योजनापूर्वक पार्थक्य दिखलाने के लिये नहीं रखा होगा। बल्कि गलती से ऐसे दो नाम पड़ गये होंगे। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, कटु मुलायम राल, गोंद, स्टार्च, शर्करा एवं ऑर्गेनिक अम्ल आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-कचूर सुगंधित, रुचिकर, दीपन, स्वर्य, कफहर, वातहर, मूत्रजनन एवं हृद्य है। इसका उपयोग कास, श्वास, अजीर्ण, अर्श, हिक्का, ज्वर, संग्रहणी, प्लीहा, गुल्म, कुष्ठ, कृमि एवं व्रण में किया जाता है। (१) मुख को साफ करने के लिये इसको चबाते हैं। गायक इसको आवाज साफ करने के लिये चूसते हैं। इससे खाँसी एवं गले की खराश में लाभ होता है। (२) इसके ताजे कंदों का पाक या खण्ड प्रसूता के लिए पौष्टिक माना जाता है। (३) विषमज्वर, प्रतिश्याय तथा शरीर में पीड़ा हो तो कचूर, छोटी पीपल एवं दालचीनी का क्वाथ मधु मिलाकर पिलाते हैं तथा पीड़ा में इसका लेप करते हैं। (४) श्वेत प्रदर तथा पूयमेह में यह बहुत लाभप्रद है। परमा में इसके फांट से जलन कम होकर पेशाब साफ होता है। (५) जलोदर में इसके पत्तों का रस पिलाया जाता है। गाँठों तथा फोड़े आदि पर इसके पत्तों को पीसकर बाधा जाता है। अर्श तथा अतिसार में इसका शाक के रूप में प्रयोग लाभप्रद माना जाता है। (६) बच्चों के आक्षेप में कंबोडियन माताएँ इसको चबाकर सर तथा शरीर पर लगाती हैं। (७) मोच में इसको पीसकर फिटकिरी मिलाकर लगाते हैं। मात्रा-१-४ माशा। अथ मुरा (मुरहरी, एकाङ्गी) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह मुरा गन्धकुटी दैत्या सुरभिः शालपर्णिका ।।९७।। मुरा तिक्ता हिमा स्वाद्वी लघ्वी पित्तानिलापहा। ज्वरासृग्भूतरक्षोघ्नी कुष्ठकासविनाशिनी ।।९८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA