भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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४२८ भावप्रकाशनिघण्टुः मुरा (एकाङ्गी) के नाम तथा गुण- मुरा, गन्धकुटी, दैत्या, सुरभि और शालपर्णिका ये सब संस्कृत नाम मुरा के हैं। मुरा- तिक्त रस युक्त, शीतवीर्य, स्वादिष्ट और लघु होती है एवं यह पित्त, वात, ज्वर, रक्तविकार, भूत और राक्षस सम्बन्धी बाधा, कुष्ठ तथा खाँसी इन सबों को दूर करने वाली होती है। [९७-९८] ३९. मुरा मुरा नामक गन्धद्रव्य के सम्बन्ध में मतभेद है। कुछ लोग इसे मरोड़फली (Helicteres isora Linn. हेलिक्टेरिस् आइसोरा लिन.) मानते हैं, जो उचित नहीं मालूम होता। डॉ० कर्नल चोपरा की पुस्तक में एरिथ्रिना स्ट्रिक्टा राक्सब. (Erythrina stricta Roxb.) का संस्कृत नाम सुरा लिखा मिलता है। पंजाबी में मुरा नाम साइनॅन्थस् का दिया है जिसके पुष्पों का दमे में उपयोग होता है। कुछ लोग इसे कचूर, कपूरकचरी या जटामांसी का भेद मानते हैं। अधिक संभव है यह कपूरकचरी का भेद हो। अथ गन्धपलाशी (कपूरकचरी) (सुगन्धिद्रव्यं काश्मीरे प्रसिद्धम्) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह- शठी पलाशो षड्ग्रन्था सुव्रता गन्धमूलिका । गन्धारिका गन्धवधूर्वधूः पृथुपलाशिकाः ॥९९॥ भवेदगन्धपलाशी तु कषाया ग्राहिणी लघुः । तिक्ता तीक्ष्णा च कटुकाऽनुष्णाऽऽस्यमलनाशिनी । शोथकासव्रणश्वासशूलसिध्मग्रहापहा१ ॥१००॥ कपूर कचरी जो कि काश्मीर देश में प्रसिद्ध एक प्रकार का सुगन्धित द्रव्य है, उसके नाम तथा गुण- शठी, पलाशो, षड्ग्रन्था, सुव्रता, गन्धमूलिका, गन्धारिका, गन्धवधू, वधू, पृथुपलाशिका और गन्धपलाशी ये सब संस्कृत नाम 'कपूर कचरी' के हैं। कपूर कचरी- कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, ग्राही, लघु, तीक्ष्ण तथा थोड़ा उष्णवीर्य होती है एवम् यह मुख के मल को दूर करने वाली, शोथ, खाँसी, व्रण, श्वास, शूल, सिध्म (या हिक्का) और ग्रहबाधा इन सबों को दूर करने वाली है। [९९-१००] ४०. कपूर कचरी हिं०- गंधपलाशी, कपूर कचरी, सितरूटी। बं०- शठी, गन्ध शटी। म०- कपूर कचरी। गु०- कपूर काचरी। क०- गन्ध शठी। ता०- शिमैकिचिलिक् किशंगु। पं०- कचूर कचु, शेदूरी। ले०- Hedychium spicatum Ham. ex Smith (हेडिचिअम् स्पाइकैटम् हॅम्. एक्स स्मिथ)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेॅसी)। यह हिमालय के साधारण प्रान्त, पंजाब, नेपाल और कुमाऊँ में अधिक उत्पन्न होती है। यह क्षुप- जाति की वनौषधि है। जड़- बहुवर्षायु, कन्दवत् भूमि के भीतर समतल बढ़ती है। इसी को सुखा कर कार्य में लेते हैं। डंठल- लम्बा पत्रयुक्त होता है। पत्ते- हल्दी के पत्तों के समान एक फुट लम्बे, अनियमित चौड़े एवं आयताकार-मालाकार होते हैं। फूल- सफेद आते हैं। फल- त्रिकोष्ठयुक्त, गोलाकार और चिकना होता है। इसके मूलस्तंभ (मूल) को काटकर सुखाये हुये, छोटे-बड़े सुगंधित टुकड़े बाजार में बिकते हैं। यह सफेद रंग के एवं पिष्टमय रहते हैं। इनका बाह्यत्वक् रक्ताभ भूरे रंग का होता है। इसका स्वाद कड़वा एवं तीता रहता है। अबीर के निर्माण एवं गुडाखु को सुगन्धित करने के लिये इसका उपयोग किया जाता है। कपूर कचरी नाम से इसी वर्ग के १. हिध्म इति पाठा० ।