भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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कर्पूरादिवर्गः ४२९ ‘चन्द्रमूल’ (Kaempferia galangal Linn. केम्प्फेरिआ गॅलन्गल् लिन)¹ के मूल के टुकड़े भी व्यवहार में लाये जाते हैं। जो इसी के समान होते हैं। बाजार में एक चीनी कपूर कचरी नामक औषध भी बिकती है जो देखने में अच्छी होते हुये भी उसमें सुगन्ध कम रहती है। रासायनिक संगठन—इसमें स्टार्च, गोंद, सेल्युलोज, अल्ब्यूमिन्, तैल, राल एवं सुगन्धित द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—कपूरकचरी उष्ण, ग्राही, लघु, कटु, तिक्त, दीपन एवं वातानुलोमक होती है। इसका उपयोग कास, श्वास, हिचकी, वमन, अपतन्त्रक, शूल एवं व्रण में किया जाता है। दंतशूल में इसके मंजन से लाभ होता है। इससे मुख की दुर्गन्धि दूर होती है। मात्रा—१-४ माशा। अथ प्रियंगुर्गन्धप्रियंगुश्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह प्रियङ्गुः फलिनी कान्ता लता महिलाऽऽह्वया ।। १०१ ।। गुन्द्रा गन्धफला श्यामा विष्वक्सेनाङ्ग नाप्रिया । शीतला तिक्ता तुवराऽनिलपित्तहृत् ।। १०२ ।। ²रक्तातीसारदौर्गन्ध्यस्वेददाहज्वरापहा । (वान्तिभ्रान्त्यतिसारघ्नी वक्त्रजाड्यविनाशिनी ।। गुल्मतृड्विषमोहघ्नी³ तद्वद् गन्धप्रियंगुका ।। १०३ ।। ‘प्रियंगु’ तथा ‘गन्धप्रियंगु’ के नाम और गुण—प्रियंगु, फलिनी, कान्ता, लता, महिलाह्वया (स्त्रीवाचक सभी शब्द), गुन्द्रा, गन्धफला, श्यामा, विष्वक्सेनाङ्गना और प्रिया ये सब संस्कृत नाम ‘प्रियंगु’ के हैं। प्रियंगु—तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और शीतवीर्य होती है। यह वात, पित्त, रक्तातिसार, दुर्गन्ध, पसीना, दाह, ज्वर, (वमन, चक्कर, अतिसार, मुँह की जड़ता) गुल्म, तृषा, विष और मोह इन सब रोगों को दूर करती है। इसी भाँति ‘गन्धप्रियंगु’ के भी गुण होते हैं। [१०१-१०३] अथ तत्फलगुणानप्याह तत्फलं मधुरं रूक्षं कषायं शीतलं गुरु । विबन्धाध्मानबलकृत्संग्राहि कफपित्तजित् ।। १०४ ।। प्रियङ्गु का फल—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, शीतवीर्य और गुरु होता है। यह विबन्धकारक, आध्मानकारक, बलकारक एवं संग्राही तथा कफपित्त नाशक होता है। [१०४] ४१. प्रियंगु प्रियंगु के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। इसी निघण्टु के धान्यवर्ग में कंगु (कंगुनी धान्य) के पर्याय में भी प्रियंगु नाम दिया हुआ है। इससे भ्रम होता है कि क्या यहाँ पर वर्णित प्रियंगु तथा धान्यवर्गोक्त प्रियङ्गु एक ही हैं ? प्रियंगु से कौन-सा प्रियंगु लिया जाय ? वास्तव में कंगु के पर्याय में केवल प्रियंगु नाम देने से ही प्रियंगु से कंगु धान्य लेना उचित नहीं है। दोनों के गुण बिलकुल भिन्न हैं। जहां पर टीकाकारों ने स्पष्ट रूप से प्रियंगु के लिये कंगु लेने का निर्देश किया १. चन्द्रमूल के क्षुप दक्षिण की तरफ बगीचों में लगाये मिलते हैं। इसमें १४% द्रव्य, सुगंधि तैल, ४% गोंद तथा अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ रहते हैं। यह मूत्रल, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं कफनिःसारक है। सर्दी-खाँसी में इससे सिद्ध तैल को नाक तथा छाती पर लगाते हैं एवं मधु के साथ १-२ रत्ती चूर्ण चटाते हैं। मुख को सुवासित करने के लिये इसके छोटे टुकड़े को मुख में रखते हैं। इसके उबटन का भी प्रयोग किया जाता है। २. रक्तातियोग इति पाठा०। ३. मेहघ्नी इति पाठा०।