भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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कर्पूरादिवर्गः ४३१ प्रियंगु - १ (फूलप्रियंगु) हिं०-प्रियंगु । फूलप्रियंगु, गन्धप्रियंगु, बुंडुड, बूढीघासी, डइया, दहिया। बं०-मधुरा। नेपा०-दयालो, श्वेतदयालो । पं०-सुमाली । ले०-Callicarpa macrophylla Vahl (कॅलिकार्पा मॅक्रोफाइला वाह.)। Fam. Verbenaceae (ह्वर्बिनेसी) । यह जंगलों के किनारे, घाट और ऊँची चढ़ाइयों तथा खुले हुये जंगल और परती भूमि में होता है। यह नेपाल, देहरादून के जलप्राय स्थानों, बंगाल तथा बिहार के अनेक स्थानों में पाया जाता है। बलिया स्टेशन के अहाते में लगे हुए इसी प्रकार के एक क्षुप का उल्लेख चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय से प्रकाशित 'सचित्र अभिनव बूटीदर्पण' में किया हुआ है। इसका गुल्म-४ से ८ फीट ऊँचा और तूल रोमश होता है। शाखाएँ-अनियमित रूप से फैली रहती हैं। पत्ते- ५ से १० इंच लम्बे, अंडाकार या अंडाकार-भालाकार, लम्बाग्र, ऊपर चिकने, नीचे तूलरोमश एवं किनारा गोल दन्तुर होता है। पुष्प-गुलाबी, सघन द्विविभक्त १ से ३ इंच व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-सफेद एवं .१२-.१८ इंच व्यास के होते हैं। डालियाँ पुष्पगुच्छों के बोझ से झुक जाती हैं। इसकी छोटी-छोटी प्रियंगु धान्य सदृश पुष्प कलिकाएँ फूल प्रियंगु के नाम से मिलती हैं। इनमें मसलने पर गन्ध भी होती है। शास्त्रीय गन्धप्रियंगु यही मालूम होती है। ग्रामीण लोग गठिया में इसकी पत्तियों से सेंक करते हैं। प्रियंगु - २ (घऊँला) हिं०-प्रियंगु, महालिव । म०-गडुला, गावल। गु०-घऊँला । अ०-महलिव । Prunus Mahaleb Linn. (प्रूनस् महालिब् लिन.) । Fam. Rosaceae (रोज़ेसी) । यह बलोचिस्तान में पाया जाता है। इसका गुल्म अनेक फैली हुई तथा सीधी शाखाओं से युक्त होता है। पत्ते- कुछ लम्बाई लिये अंडाकार एवं दन्तुर होते हैं। पुष्प-श्वेत रंग के; फल-छोटे, अंडाकार एवं नोकीले होते हैं। घऊँला नाम से प्रियंगु की मज्जा बंबई के बाजार में बिकती है। यह छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूम वर्ण की, कड़वी और सुगंधित होती है। सुगंधि लेप में श्वेतचन्दन तथा कपूर कचरी के साथ इसका उपयोग बंबई प्रान्त में लोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में अल्प मात्रा में पद्मकाष्ठ में पाया जाने वाला हाइड्रोसायेनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहने के कारण इसका उपयोग सावधानी के साथ करना चाहिये। इसके अतिरिक्त इसमें काउमॅरिन् (Coumarin), सॅलीसिलिक् एसिड (Salicylic acid) एवं ॲमिग्डॅलिन् (Amygdalin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, वेदनाहर, दीपन एवं मूत्रल है। इसका उपयोग पीड़ायुक्त कुपचन, आमाशय के क्षत तथा आमाशय के अर्बुद में करते हैं। मात्रा-२-५ रत्ती। प्रियंगु - ३ हिं०-प्रियंगु । कं०-तेतिलकामि । ले०-Aglaia roxburghiana Miq. (ॲग्लेइआ राक्स बर्घियाना मिक्,)। Fam. Meliaceae (मेलियॅसी) । यह पश्चिमी प्रायद्वीप में कोंकण और मिदनापूर से दक्षिण की ओर सिलोन तक ६००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA