भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका साधारण वृक्ष होता है। छाल किंचित् खाकी रंग की और चिकनी होती है। लकड़ी मजबूत तथा चमकीले लाल रंग की होती है। पत्ते-पक्षवत् पत्ते ३-१० इञ्च लम्बे और उनके पत्रक संख्या में ५, १ १/२ से ५ १/२ इञ्च लम्बे, पतले अंडाका-प्रासवत् और चिकने होते हैं। पुष्प-व्यास में १ इञ्च से कम, पीताभ और पत्ती के बराबर लम्बी मञ्जरियों में होते हैं जो पत्र कोण के ऊपर निकलती हैं। फल-कुछ-कुछ गोल, निम्बफल सदृश, १/४-३/४ इञ्च व्यास के, रोमश तथा हरिण के रंग के रहते हैं जो सूखने पर भूरे रंग के सिकुड़नदार तथा आकार में छोटे हो जाते हैं। इसमें १ या २ बीज रहते हैं जो चिपटे करीब १/२ इञ्च लम्बे (ताजी अवस्था में) तथा एक तरफ से उन्नतोदर रहते हैं। बीज का स्वाद खट्टा तथा कसैला रहता है। ताजी अवस्था में इसमें सुगन्ध रहती है जो सूखने पर नहीं रहती। इसके फलों का उपयोग बहुत दिनों से प्रियंगु के नाम से किया जा रहा है। हो सकता है कि भावप्रकाशकार ने प्रियंगु का जो फल लिखा है वह यही हो। गुण और प्रयोग-यह शीतल एवं ग्राही होता है। इसका उपयोग ज्वर, पित्त तथा शोथयुक्त रोगों में किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। अथ रेणुका। तस्या नामानि गुणाँश्चाह रेणुकाराजपुत्री च नन्दिनी कपिला द्विजा। भस्मगन्धा पाण्डुपुत्री स्मृता कौन्ती हरेणुका ।।१०५।। रेणुका कटुका पाके तिक्ताऽनुष्णा कटुर्लघुः। पित्तला दीपनी मेध्या पाचनी गर्भपातिनी। बलासवातकृच्चैव१ तृट्कण्डूविषदाहनुत् ।।१०६।। रेणुका के नाम तथा गुण-रेणुका, राजपुत्री, नन्दिनी, कपिला, द्विजा, भस्मगन्धा, पाण्डुपुत्री, कौन्ती तथा हरेणुका ये सब पर्यायवाची शब्द रेणुका के हैं। रेणुका-पाक में कटुरसयुक्त, किंचित् उष्णवीर्य, तिक्त तथा कटुरसयुक्त और लघु होती है एवम् यह पित्तजनक, अग्निदीपक, मेधा के लिये हितकर, पाचक, गर्भ गिराने वाली, कफ तथा वातकारक होती है। यह तृषा, खुजली, विष और दाह को दूर करती है। [१०५-१०६] ४२. रेणुका रेणुका एक संदिग्ध औषध है। रेणुक बीज नाम से होने वाली निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फल बिकते हैं। लेकिन संभवतः ये फल शास्त्रीय रेणुका नहीं हैं। शास्त्रीय रेणुका शायद पिप्पलीवर्ग की पाइपर ऑरेण्टिएकम् वाल् (Piper aurantiacum Wall.) के फल हैं। कुछ लोग निर्गुण्डी के बीज को ही रेणुका कहते हैं जो उसके प्रतिनिधि हो सकते हैं। चरक में शिरोविरेचन एवं वमनोपग गणों में रेणुक बीज का पाठ है। ग्रहणी के मध्वरिष्ट में एवं व्रणपीडन रूप में रेणुका का उल्लेख है। चरक, सुश्रुत तथा रा० नि० इसको गर्भपातक नहीं मानते। सुश्रुत में हरेणुका का उल्लेख एलादिगण, पिप्पल्यादिगण में तथा रेणुका का उल्लेख कटुवर्ग में एवं भगंदर, नाड़ी, उपदंश व्रण तथा विष में इसका प्रयोग किया गया है। यहाँ पर वर्णन विदेश से आने वाले निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फलों का किया गया है। हिं०-रेणुका, रेणुक, संभालू का बीज। गु०-हरेणु। म०-रेणुक बीज। इरा०-पंजनगुस्त। अ०-अथलक्। ले०-Vitex agnus- castus Linn. (वाइटेक्स एग्नस्-कास्टस् लिन.)। Fam. Verbenaceae (हर्बिनॅसी)। १. बलासवातवैकल्य इति पाठ०। तृष्णादाहविषक्लैव्यकफवातविनाशिनी॥ (नि. र.) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA