भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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४३४ भावप्रकाशनिघण्टुः एकान्तर, शल्याकृति, अखण्ड, धूसर रंग के एवं १ इञ्च से छोटे होते हैं। पुष्प-श्वेत या लाल रंग के होते हैं। फल- त्रिकोणयुक्त, हरे एवं अग्रपर सूक्ष्म झुर्रीदार, चमकीले एवं काले होते हैं। सिन्ध में बीजों को बीजबंद कहते हैं। बला के बीजों को भी अनेक स्थानों में बीजबंद कहा जाता है। चिकित्सा में इसके मूल, पंचाग एवं बीजों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें पोलिगोनिक् अम्ल तथा सुगन्धित तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ रक्तसंग्राहक, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, आनुलोमिक, ज्वरघ्न एवं कफघ्न है। बीज सं्रसन, मूत्रजनन एवं वामक होते हैं। (१) अश्मरी या मूत्रकृच्छ्र में इसके पंचाग के क्वाथ या मूल रस का प्रयोग अधिक मात्रा में करने से बहुत लाभ होता है। (२) जीर्ण अतिसार में मूल रस या पंचाग रस देते हैं। (३) विषमज्वर में मूल रस का उपयोग करते हैं। (४) फुप्फुस विकारों में विशेष कर श्वसनिका शोथ एवं कुकास में पंचाग क्वाथ पिलाते हैं। (५) सूखी हुई जड़ को पीसकर लगाने से वेदना कम होती है। विसर्प, बस्तिपीड़ा एवं आँव की पीड़ा में पत्तों का लेप किया जाता है। अथ स्थौणेयकम्। (ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः, ईषत्सुगन्धं 'थुनेर' इति लोके प्रसिद्धम्) तस्य नामानि गुणांश्चाह स्थौणेयकं बर्हिबर्हं शुकबर्हञ्च कुक्कुरम्। शीर्णरोमशुकञ्चापि शुकपुष्पं शुकच्छदम्।।१०९।। स्थौणेयकं कटु स्वादु तिक्तं स्निग्धं त्रिदोषनुत् ।।११०।। मेधाशुक्रकरं रुच्यं रक्षोघ्नं ज्वरजन्तुजित्। हन्ति कुष्ठास्रतृड्दाहद्दौर्गन्ध्यतिलकालकान् ।।१११।। 'गठिवन' के ही भेद में थोड़ी सुगन्ध से युक्त जो 'थुनेर' नाम से लोक में प्रसिद्ध औषध है, उसके नाम तथा गुण-स्थौणेयक, बर्हिबर्ह, शुकबर्ह, कुक्कुर, शीर्णरोम, शुक, शुकपुष्प और शुकच्छद ये सब संस्कृत नाम 'थुनेर' के हैं। थुनेर-कटु, तिक्तरस युक्त, स्वादिष्ट, स्निग्ध, तीन दोषों को दूर करने वाला, मेधा तथा शुक्र को बढ़ाने वाला, रुचिकारक, रक्षोग्रहनाशक एवं ज्वर, कृमि, कुष्ठ, रक्तविकार, तृषा, दाह, दुर्गन्ध और तिलकालक नामक रोग इन सबों को दूर करने वाला होता है। [१०९-१११] ४४. थुनेर स्थौणेयक भी एक संदिग्ध औषध है। इसे ग्रन्थिपर्ण का भेद माना गया है लेकिन जब ग्रन्थिपर्ण ही संदिग्ध है तब इसका निर्णय कैसे किया जा सकता है। तालीसपत्र नाम से लिये जाने वाले द्रव्यों में से एक का स्थानिक नाम थुनेर है। इसलिये कुछ लोग इस थुनेर को स्थौणेयक मानते हैं। थुनेर का वर्णन तालीसपत्र के साथ किया गया है। चरक में स्थौणेयक का उपयोग अगुर्वादि तैल में (चि० अ० ३), मृतसञ्जीवन अगद में (चि० अ० २३), बलातैल में (चि० अ० २८) एवं मदनफल उत्कारिकामोदक योग में (क० अ० १) किया गया है। सुश्रुत में एलादिगण) सू० अ० ३८) में इसका पाठ है। कुछ लोगों ने ले०-Clerodendrum infortunatum, Linn.; Fam. Verbenaceae (क्लेरोडेण्ड्रम् इन्फोर्च्युनेटम् लिन, हर्बिनेसी), हि०-भांट, सं०-कारी, भाण्डीर को स्थौणेयक लिखा है। इसके १२ फीट तक ऊँचे