भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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कर्पूरादिवर्गः ४३५ क्षुप—प्रायः सभी स्थानों में पाये जाते हैं । प्रत्येक भाग कटु एवं लम्बे पत्रनाल से युक्त होते हैं । बाह्यपुट स्थायी, वर्धनशील और लाल होता है । आभ्यन्तर पुट रक्ताभ श्वेत होता है । इसके पत्र एवं मूल का उपयोग किया जाता है । **गुण और प्रयोग—**भांट तिक्त पौष्टिक, उत्तम, आनुलोमिक, पित्तसारक, कृमिघ्न एवं ज्वरघ्न है । तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर में यह लाभदायक है । बच्चों को इसके पत्र का चूर्ण २-५ रत्ती मधु एवं सुगन्ध द्रव्यों के साथ दिया जाता है । केंचुवे में इसके पत्र-रस को पिलाते हैं तथा बस्ति भी देते हैं । उदरशूल एवं अतिसार में इसकी जड़ को मट्ठे में पीस कर देते हैं । त्वचा के रोगों (खुजली) में इसका बाह्याभ्यन्तर प्रयोग करते हैं । अथ ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः । 'भटेउर' इति नेपालदेशे भवेत् तस्य नामानि गुणाँश्चाह **निशाचरो धनहरः कितवो गणहासकः । चोरकः शङ्कितश्चण्डो दुष्पत्रः क्षे