भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 487

४३६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ तालीसपत्रम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तालीसमुक्तं पत्राढ्यं धात्रीपत्रञ्च तत्स्मृतम् ।। १९४ ।। तालीसं लघु तीक्ष्णोष्णं श्वासकासकफानिलान् । निहन्त्यरुचिगुल्मामवह्निमान्द्यक्षयामयान् ।। १९५ ।। तालीसपत्र के नाम तथा गुण-तालीस, पत्राढ्य और धात्रीपत्र से संस्कृत नाम 'तालीसपत्र' के हैं । तालीसपत्र- लघु, तीक्ष्ण और उष्णवीर्य होता है एवं यह-श्वास, खाँसी, कफ, वात, अरुचि, गुल्म, आम, अग्नि की मन्दता और क्षयरोग इन सबों को दूर करता है । [१९४-१९५] ४६. तालीसपत्र तालीसपत्र-यह नाम विभिन्न वर्गों के पत्तों को भिन्न स्थानों में दिया हुआ दिखलाई देता है। पहले लोग प्राचीनामलक-फ्लॅकोर्टिआ कॅटाफ्रॅक्टा राक्स (Flacourtia cataphracta Roxb.) के पत्तों को तालीसपत्र कहा करते थे। दक्षिण में कहीं-कहीं तमालपत्र-सिर्नमोमम् तमाल (Cinnamomum tamal) के पत्रों को तालीसपत्र कहा जाता है। उत्तर प्रदेश, राजपूताना, महाराष्ट्र एवं गुजरात आदि के वैद्य टेक्सस् बॅकेटा (Taxus bacata) के पत्तों का व्यवहार तालीस पत्र के नाम से करते हैं। इसे कुछ लोग स्थौणेयक भी मानते हैं। बंगाल के वैद्य एविस् वेबिआना (Abies webbiana) के पत्तों का व्यवहार तालीसपत्र के रूप में करते हैं। नेपाल एवं पञ्जाब के कुछ वैद्य तालीसफर, रोडोडेण्ड्रोन अन्थोपोगोन (Rhododendron anthopogon) के पत्तों का व्यवहार करते हैं जिसकी २, ३ अन्य उपजातियाँ भी होती हैं। प्राचीनामलक का वर्णन आगे फलवर्ग में आया है तथा तमाल पत्र का वर्णन पहले (पृष्ठ २२८) किया जा चुका है। यहाँ पर बाकी तीनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। चरक में दशेमानि में इसका उल्लेख नहीं है। सुश्रुत में शिरोविरेचकगण में इसका पाठ है। तालीसपत्र के शास्त्रीय गुण इस प्रकार दिये हुए हैं-यह तिक्त, कटु, मधुर, उष्ण, लघु, तीक्ष्ण, शिरोविरेचन तथा कफ, वात, कास, श्वास, क्षय, वमन, अरुचि, गुल्म, आम, अग्निमांद्य और कृमि का नाश करने वाला है। तालीसपत्र- १ हिं०-तालीसपत्र, थूनो, बिमीं। गढ़०-थुनेर। काश्मी०-पोस्टिल। बंब०-तालीसपत्र, वर्मी। बं०-बिमीं। नेपा०-तेहीरे। खासि०-दिंगरुहेर्। अ०-जर्नब। अं०-Himalayan yew (हिमालयन् यू)। ले०-Taxus baccata Linn. (टॅक्सस् बॅकेटा लिन.)। Fam. Taxaceae (टॅक्सॅसी)। हिमालय के काश्मीर, पूर्वी पञ्जाब का पहाड़ी प्रदेश, गढ़वाल, अफगानिस्तान तथा अपर वर्मा आदि स्थानों में ६- १०. हजार फीट की ऊँचाई पर इसके मध्यम ऊँचाई के सदाहरित वृक्ष पाये जाते हैं। कहीं-कहीं १०० फीट तक ऊँचे झोपड़ाकृतिक वृक्ष होते हैं। इसका स्तंभ छोटा किन्तु उसकी गोलाई १०, १२ फीट होती है। छाल-पतली, किंचित् लालीयुक्त खाकी रंग की होती है। लकड़ी-दृढ़, बाहरी भाग सफेद तथा अंदर का भाग रक्ताभ श्वेत होता है। पत्ते-दो कतारों में निकले रहते हैं। ये १-१।। इञ्च लम्बे, दशांमांश इञ्च चौड़े, रेखाकार, कड़े, चिपटे, नोकीले, ऊपरी पृष्ठ पर गहरे रंग के और अधःपृष्ठ पर हलके पीले या मुरचई रंग के होते हैं। शिरा एक और पत्रनाल छोटा होता है। पत्तियों से विशेषतः सूखने पर एक प्रकार की गंध आती है। लालकोष में घिरा हुआ हरिताभ बीज होता है जो शीर्ष पर खुला रहता है। पहाड़ी लोग इसको छाल से एक प्रकार का चाय सदृश पानक बनाकर पीते हैं और इसके फलों को खाते हैं। यद्यपि युक्तप्रान्त, राजपूताना, महाराष्ट्र एवं गुजरात आदि के वैद्य तालीसपत्र के स्थान पर इसका प्रयोग करते हैं तथापि थुनेर नाम से इसके स्थौणेयक होने की अधिक संभावना है। विमीं नाम से उत्तरी भारत में आर्तव प्रवर्तक एवं शामक औषध के रूप में तथा अपस्मार, अपतंत्रक तथा नाड़ीदौर्बल्य आदि में इसके पत्तों का व्यवहार किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpu. Digitized by S3 Foundation USA