भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 1167 में से

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कर्पूरादिवर्गः ४३७ रासायनिक संगठन-इसके बीज तथा पत्र में एक विषैला द्रव्य है जो बीज के ऊपर के लालकोष में नहीं होता । इसमें टॅक्सीन (Taxine) नामक एक क्षाराभ पाया जाता है । गुण और प्रयोग-तालीसपत्र अवसादक, उद्वेष्ठननिरोधि, आर्तवजनन, वातानुलोमक, कफनिःसारक एवं बल्य है । इसकी क्रिया कुछ डिजिटॅलिस् के समान होती है । अल्प मात्रा में प्रयोग करने पर नाड़ी एवं श्वास की गति कम होती है । मध्यम मात्रा में श्वास बढ़ता है तथा हृत्स्पन्द होता है । इससे गर्भाशय का संकोच होता है । गर्भपात कराने के लिए प्रयुक्त करने पर गर्भपात नहीं होता लेकिन मृत्यु हो सकती है । बड़ी मात्रा से विषैला परिणाम होने से चक्कर, वमन, आक्षेप, नशा, आँखों की पुतलियों का विस्फार, मंदश्वास एवं श्वसनकृच्छ्र होकर मृत्यु होती है । विषैले परिणाम से आमाशय, आँत तथा वृक्कों में शोथ भी हो जाता है । डिजिटॅलिस् के समान इसका संचायी प्रभाव नहीं होता । अपस्मार आदि आक्षेप युक्त व्याधियों में इसका प्रयोग किया जाता है । शुष्क कास, श्वासनलिका के जीर्णशोथ एवं तमक श्वास आदि में देने से खाँसी की तकलीफ कम हो जाती है । प्रसूता को इसका फांट दिया जाता है । बस्तिशोथ में भी इससे लाभ होता है । मात्रा-१-२ रत्ती । तालीसपत्र-२ हिं०, बं०-तालीसपत्र । गढ़०-चिलिराघ । काश्मी०-बादर, बुदुल । कनवार-स्पुन । नेपा०-गोञिअ सुलह । कुमा०-राघ । भूता०-दुमशिंग । अं०-Himalayan Siver Fer (हिमालयन् सिल्वर फर) । ले०- Abies webbiana Lindl. (एबिस् वेबिआना लिंड) । Fam. Pinaceae (पिर्नेसी) । इसके ऊँचे सदाहरित वृक्ष हिमालय पर सिक्किम, भूटान के प्रदेश में ९ से १३ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं । इसके वृक्ष-१५० फीट तक ऊँचे एवं स्तम्भ की गोलाई ३० फीट तक होती है । छाल-खाकी युक्त भूरे रंग की और खुरदरी होती है । नवीन शाखाएँ प्रायः सूक्ष्म और भूरे रोमों से ढकी हुई रहती है । शाखाएँ प्रायः झुकी हुई रहती हैं । पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे, दशांश इञ्च चौड़े, पतले, रेखाकार और काण्ड से पेचदार क्रम से निकले हुये परन्तु देखने में केवल दो कतारों में निकले हुए से मालूम होते हैं । इनका ऊपरी पृष्ठ चमकीला तथा गहरे रंग का होता है और अधःपृष्ठ पर मध्यशिरा के दोनों ओर दो-दो सफेद धुँधली रेखाएँ होती हैं । पते नताग्र होते हैं और अग्र पर प्रायः दो तीक्ष्ण और कठोर नोक निकले रहते हैं । फल-लंब गोल या आयताकार, २-४ इञ्च का और पकने पर गहरे बैंगनी रंग का होता है । बीज-करीब इञ्च का षष्ठांश लम्बा होता है । इस जाति में मोरिण्डा नामक, ले०-एबिस् पिण्ड्रो (Abies pindrow) वृक्ष भी होता है जो इससे बहुत मिलता जुलता है । इसमें नवीन शाखाएँ रोमरहित और पत्तियाँ २-३ इञ्च लम्बी, दो कतारों में निकली हुई और दो दिशाओं में फैली हुई रहती हैं । एबिस् वेबिआना में वे ऊपर की ओर हर दिशा में फैली हुई रहती हैं । इसके फल भी दूसरे की अपेक्षा छोटे और मोटे होते हैं । ये जौनसार में प्रायः १० हजार फीट के नीचे (दववन, मुंडाली आदि में) पाये जाते हैं । प्रायः पूर्वी भारत में एबिस् वेबिआना के ही पत्र तालीशपत्र के नाम से बेचे जाते है । बंगाल के वैद्य इसी का व्यवहार करते हैं । रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल पाया जाता है । गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, कफनिःसारक, ग्राही एवं बल्य है । इसका उपयोग जीर्ण श्वास, कास, राजयक्ष्मा, अग्निमांद्य, अरुचि एवं बस्तिविकार में किया जाता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

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