भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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४३८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) तालीसादि चूर्ण १०-२० रत्ती की मात्रा में श्वास, कास, रक्तपित्त, अग्निमांद्य एवं अतिसार आदि में दिया जाता है। बच्चों के श्वसनी फुफ्फुस पाक में १ १/२ रत्ती चूर्ण तथा कस्तूरी वटी १ रत्ती की ६ मात्रा बना कर हर ४ घण्टे पर देने से लाभ होता है। (२) इसके पत्तों का स्वरस ५-१० बूँद जल या दुग्ध के साथ बच्चों के दंतोद्भेद के समय होने वाले ज्वर एवं कफविकार आदि में दिया जाता है। बंगाल में प्रसूता को बल्य औषध की तरह इसे देते हैं। (३) स्वरभंग, जीर्णश्वसनिका शोथ, राजयक्ष्मा तथा अन्य कफविकारों में इसके क्वाथ या फांट का उपयोग करते हैं। (४) इसके पत्तों का चूर्ण मधु एवं वासा स्वरस के साथ कास, श्वास तथा रक्तष्ठीवन में दिया जाता है। मात्रा-१-२ माशा। तालीसपत्र- ३ इसकी कई उपजातियाँ होती हैं जिनमें से २, ३ के पत्तों का प्रयोग तालीसपत्र के स्थान पर नेपाल तथा पञ्जाब के कुछ वैद्य करते हैं। इनका संक्षेप में वर्णन किया गया है। (क) हिं०-तालीसर, तालीसपर। काश्मी०-तजत्सुम। झेलम०-निचनी, रतनकाट, नेरा। पं०-तालिखी। ले०-Rhododendron anthopogon D. Don. (रोडोडेण्ड्रॉन् एन्थोपो‌गोन् डी. डोन)। Fam. Ericaceae (एरिकेसी)। यह हिमालय में १०-१४ हजार फीट की ऊँचाई पर कश्मीर से भूटान तक उत्पन्न होता है। इसके सदा हरित गंधयुक्त छोटे-छोटे क्षुप १ से १।। फीट ऊँचे होते हैं। शाखाओं पर वल्क पत्र और खुरदरापन होता है। पत्ते-सनाल, १-१।। इञ्च लम्बे, अंडाकार या चौड़े आयताकार, ऊपरी पृष्ठ पर चमकदार और अधःपृष्ठ पर भूरे रोमावरण से युक्त होते हैं। शाखाओं के अन्त में फूलों का गुच्छा लगता है। फूल-किंचित् पीले आते हैं। फल- बहुत छोटे और अंडाकार होते हैं। बीज-बहुत सूक्ष्म तथा दीर्घवृत्ताकार होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का धूम्रपान लाभदायक माना जाता है। पत्ते-उत्तेजक तथा सुगंधित होते हैं। इसके चूर्ण के नस्य से छींकें आती हैं। ऐसी धारणा है कि हिमालय के पूर्वभाग में अधिक ऊँचाई पर चढ़ते समय शिरःशूल तथा हल्लास उत्पन्न करने वाली वनस्पतियों में से एक यह हो। मात्रा-२-८ रत्ती। (ख) गढ़वाल-सिमारस। ने०, हि०-चैरैलु। काश्मी०-गग्गर। कुमाऊँ-चिमुल। ले०-Rhododendron campanulatum D. Don. (रोडोडेण्ड्रॉन् कम्पैनुलैटम् डी. डोन)। यह भी हिमालय में कश्मीर से भूटान तक पाया जाता है। इसका गुल्म-कुछ बड़ा; पत्ते-३-५ इञ्च लम्बे, दीर्घवृत्ताकार, आयताकार तथा दोनों सिरों पर गोल होते हैं। नीचे के पृष्ठ पर दालचीनी रंग के सघन रोमों से शिराएँ ढकी रहती हैं। पुष्प-बैंगनी या नीलापन लिये श्वेत रंग के आते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते बकरियों के लिये विषैले समझे जाते हैं। अर्धावभेदक तथा प्रतिश्याय में तम्बाकू के साथ इसके पत्तों का नस्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। जीर्ण आमवात, फिरंग तथा गृध्रसी में इसके पत्तों का आभ्यन्तरिक उपयोग किया जाता है। नेपाल में इसके पञ्चाङ्ग का प्रयोग जीर्ण ज्वर तथा राजयक्ष्मा में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA