भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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कर्पूरादिवर्गः ४३९ (ग) गढ़वाल-सिमरिस। भोटिया-त्सुलसुमा। यू०, हि०-तालीसफर। ले०-Rhododendron lepidotum Wall. (रोडोडेण्ड्रॉन् लेपिडोटम् वाल.)। यह भी हिमालय में काश्मीर से भूटान तक पाया जाता है। इसका क्षुप-छोटा तथा गन्धयुक्त होता है। पत्ते-३/४ इञ्च से १॥ इञ्च लम्बे, प्रायः विनाल, ऊपर से लट्वाकार और कुण्ठिताग्र या भालाकार और कुछ नोकीले और अधःपृष्ठ श्वेत या मुरचई रंग के रोमावरण से ढका हुआ रहता है। फूल-लाल, बैंगनी या पीले, ३-४ के गुच्छों में या अकेले रहते हैं। फल-छोटे, ५ धारीयुक्त होते हैं तथा बीज छोटे-छोटे अंडाकार होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण (क) के समान ही हैं। अथ कङ्कोलं सुगन्धिद्रव्यम् 'सीतलचीनी' इति लोके। तस्य नामानि गुणाँश्चाह कङ्कोलं१ कोलकं प्रोक्तं तथा कोषफलं स्मृतम्। कङ्कोलं लघु तीक्ष्णोष्णं तिक्तं हृद्यं रुचिप्रदम्। आस्यदौर्गन्ध्यहृद्रोगकफवातामयान्ध्यहृत् ।।१९६।। 'कङ्कोल नामक' सुगन्ध द्रव्य जो कि शीतल चीनी नाम से प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण-कङ्कोल, कोलक और कोषफल ये सब संस्कृत नाम 'शीतलचीनी' के हैं। शीतलचीनी-लघु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, तिक्त रस युक्त, हृदय को हितकर तथा रुचिकारक होती है। यह मुख की दुर्गन्धता, हृद्रोग, कफ तथा वातरोग और आन्ध्य (आँखों से न दीखना) इन सबों को दूर करती है। [१९६] ४७. शीतलचीनी हिं०-शीतलचीनी, कबाबचीनी, कङ्कोल, शीतलमिर्च। बं०-कबाबचीनी, सुगन्धमरिच। म०-कङ्कोल, कापूरचीनी। गु०-चणकबाब। क०-गन्धमेणसु। ते०-चलवमिरियालु। ता०-वाल्मिलगु। फा०-कबाबह, कबाबचीनी। अ०- हब्बुलू ऊरूस, कबाबेसीनी। अं०-Cubebs (क्यूबेब्स); Tailed Pepper (टेल्ड पेपर)। ले०-Piper cubeba Linn. f. (पाइपर क्यूबेबा लिन.)। Fam. Piperaceae (पाइपेरेसी)। शीतलचीनी-यह एक लता जाति की वनस्पति का पूर्ण रूप से विकसित किन्तु अपक्व अवस्था में सुखाया हुआ फल है, जो काली मरिच के समान होता है। यह जावा, सुमात्रा तथा बोर्निओं में होती है। लङ्का में इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में विशेष कर मैसूर में इसकी कुछ उपज की जाती है। इसकी आरोही बहुवर्षायु लता होती है। कांड-चिकना, लचीला एवं जोड़दार होता है। पत्ते-अखंड, सवृन्त, आयताकार या लट्वाकार-आयताकार, नोकीले, गोल या हृद्त् पर्णतलवाले, चर्मवत् तथा चिकने होते हैं। शिराएँ बहुत होती हैं। पुष्प-अद्विलिंगी तथा अवृन्त-काण्डज पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल-गोल, अष्ठिफल होते हैं जिनमें आधार की तरफ डंठल लगा रहता है। हरी अवस्था में ही इन्हें तोड़कर धूप में सुखा लिया जाता है। यह अपक्व फल काली मिर्च के समान, गोल, झुर्रीदार गहरे भूरे रंग के एवं करीब ४ मि० मि० व्यास के सूखे हुए होते हैं। इसके शिखर पर त्रिकोणयुक्त कुक्षि लगी रहती है तथा आधार पर ४ मि० मि० लम्बा डंठल रहता है। इसके अन्दर एक बीज रहता है। इसको चबाने से मनोरम तीक्ष्ण मसालेदार विशिष्ट गन्ध आती है; स्वाद कडुवा, चरपरा १. कक्कोलं इति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA