भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 494, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ४४३
व्रण, वमन, प्यास, खाँसी, अरुचि, हृद्रोग, कफ, विष, रक्तपित्त, कुष्ठ, मूत्ररोग और कृमिरोग, इन सबों को दूर करती है। [१२०-१२१] ५०. एलवालुक एलवालुक संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे 'कंकोलसदृशं कुष्ठगंधि' मानते हैं। चरक में शुक्रशोधन और वेदनास्थापन दशेमानि में एवं कषायस्कंध में इसका उल्लेख है। आसवयोनि में इसकी छाल का उल्लेख है। अर्शोक्त अभयारिष्ट, उन्मादोक्त कल्याणकघृत तथा पांडु के बीजकारिष्ट में इसका पाठ है। सुश्रुत के लोध्रादिगण में इसका पाठ है। उपर्युक्त विवेचन से यह बात स्पष्ट है कि एलवालुक, ॲलोज् (मुसब्बर) नहीं हो सकता जैसा कि कुछ लोग मानते हैं क्योंकि एलवालुक का पाठ त्वगासवयोनि में होने से यह कोई वृक्ष है ऐसा मालूम होता है। अधिकांश विद्वान् प्रुन्स् सिरेसस् को एलवालुक मानते हैं क्योंकि इसका एक नाम आलुवालु है। यह शायद एलवालुक का अपभ्रंश हो। डॉ० देसाई, गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् को एल्वालुक मानते हैं। इन दोनों का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। कुछ लोगों ने मुकिआ स्काब्रेला आर्न० (Mukia scabrella Arn.) को माना है जो दीपन, मृदुविरेचन एवं मूत्रजनन है तथा जिसके पत्तों का प्रयोग चक्कर में, बीजों का प्रयोग स्वेद लाने के लिये एवं मूल का आध्मान में उपयोग किया जाता है। एलवालुक-१ हिं०-आलूवालू। पं०-गिलास। अं०-Dwarf cherry (ड्वार्फचेरी)। ले०-Prunus cerasus Linn. (प्रूनस् सिरॅसस् लिन.)। Fam. Rosaceae (रोज़ेसी)। इसके वृक्ष हिमालय के पर्वतों में लगाये हुए मिलते हैं। इसके पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े, लट्वाकार-अंडाकार, अग्र यकायक नोकीला तथा किनारा दन्तुर (तीक्ष्णाग्रगोल दाँत) होता है। पुष्प-श्वेत या गुलाबी एवं; फल-गोल, चिकना, चमकीला और घेरे में आधा इञ्च तक होता है। इसके बीज बाजार में बिकते हैं जिनकी मज्जा का औषध में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कडुवा एवं सुगन्धित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल एवं पद्माकाष्ठ आदि में पाया जाने वाला हाइड्रोसायेनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहता है। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पौष्टिक एवं वेदनास्थापक है। मज्जा तन्तु के रोगों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके अन्य गुण उपर्युक्त विष के समान हैं। इसकी छाल ग्राही एवं ज्वरहर होती है। मात्रा-२-५ रत्ती। एलवालुक-२ हिं०-बालुका साग। बं०-बालुक। म०-व(वा) लुची भाजी। ता०-मनलकिरै। ते०-एसकदन्तिकुर। ले०-Gisekia pharnaceoides Linn. (गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडॅसी)। यह वनस्पति पंजाब, सिंध, दक्षिण तथा सिलोन में होती है। इसके क्षुप-छोटे, फैले हुये तथा अनेक शाखाओं से युक्त होते हैं। पत्र-विपरीत, मांसल, अखंड, अंडाकृति, करीब १ इञ्च लम्बे तथा आधार की तरफ नोकीले होते हैं। पुष्प-अनेक; फल-बाह्यदल से आवृत झिल्लीदार होते हैं। बीज-काले से, पृष्ठ पर गोलाई लिये हुए एवं श्वेत छोटी ग्रंथियों से युक्त होते हैं। बंगाल में वालुक नाम से यह बीज बिकते हैं। औषध में पंचाग का व्यवहार किया जाता है।