भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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४४४ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-पत्तों में बालू की तरह क्षार के कंकड रहते हैं । इसी से इसे बालू का साग कहा जाता है । गुण और प्रयोग-इसका पंचाग, सुगंधित, आनुलोमक एवं कृमिघ्न है । कृमिरोग में इसके पंचाग का रस १ औंस तथा शीतजल १ औंस मिलाकर सुबह खाली पेट पिलाते हैं । हर दूसरे दिन ३, ४ बार के प्रयोग से स्फीतकृमि (Taenia) मर कर निकल जाते हैं । अथ कैवर्तीमुस्तकम् (केवटी मोथा) । तस्य नामलक्षणगुणानाह कुटन्नटं दासपुरं बालेयं परिपेलवम् । प्लवगोपुरगोनर्दकैवर्तीमुस्तकानि च ।। १२२ ।। मुस्तावत्पेलवपुरं¹ शुकाभं² स्याद्वितुन्नकं ।। १२३ ।। वितुन्नकं हिमं तिक्तं कषायं कटु कान्तिदम् । कफपित्तास्रवीसर्पकुष्ठकण्डूविषप्रणुत् ।। १२४ ।। 'केवटीमोथा' के नाम लक्षण तथा गुण-कुटन्नट, दासपुर, बालेय, परिपेलव, प्लव, गोपुर, गोनर्द, कैवर्तीमुस्तक और वितुन्नक ये सब संस्कृत नाम 'केवटीमोथा' के हैं। केवटीमोथा के लक्षण-यह मोथा की भाँति, कोमल दलकोश तथा शुक की भाँति वर्ण से युक्त होता है । केवटीमोथा-कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य और कान्तिवर्धक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तविकार, वीसर्प, कुष्ठ, खुजली तथा विष को दूर करता है । [१२२- १२४] ❖ 'केवटीमोथा'-'गुडतजी' इति च लोके । इदं तु वितुन्नकनाम्नो वृक्षस्य त्वग मुस्ताकृतिः ।। १२२- १२४ ।। यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि लोक में 'केवटीमोथा' गुडतजी नाम से भी प्रसिद्ध है तथा यह वितुन्नकनामक वृक्ष का छिल्का है एवं आकार में मोथा की भाँति होने से इसे केवटीमोथा कहते हैं । [१२२-१२४] ५१. केवटीमोथा कैवर्तमुस्तक का उपर्युक्त वर्णन भ्रमात्मक मालूम पड़ता है । मुस्ता के आकारवाली वितुन्नक नामक वृक्ष की छाल कैवर्तमुस्तक है यह उपर्युक्त वर्णन से मालूम होता है । केवटीमोथा नाम से ग्रन्थिसदृश छोटे काले कन्द मिलते हैं जो मोथा वर्ग (Cyperus) के ही होते हैं । इसके गुणों में तथा मोथे के गुणों में विशेष अन्तर नहीं है । इसलिये इन्हें कैवर्तमुस्तक माना जा सकता है । डॉ० देसाई ने ले०-Celosia argentea Linn.; Fam. Amaranthaceae (सेलोसिआ आर्जेण्टिआ, लिन. ॲमॅरेन्थ्येसी) का संस्कृत नाम शितवार, वितुन्नक लिखा है । इसे हिं० में सुर्वाली, सफेद मुर्गा कहा जाता है । शाकवर्ग में वर्णित, शितिवार यही मालूम होता है । शितिवार के पर्यायों में 'सुनिषण्णक' शब्द भी आता है किन्तु ये दो भिन्न द्रव्य मालूम होते हैं । सुनिषण्णक यह चौपतिया साग है जिसका वर्णन आगे शाकवर्ग में किया गया है । शितिवार यह सुर्वाली होने की अधिक संभावना है । इसका क्षुप समस्त भारत में होता है । यह ३ फीट ऊँचा, पत्ते-एकान्तर, लम्बे, पतले तथा कम चौड़े; पुष्प-सफेद तथा गुलाबी एवं क्षुप के अन्त में गुच्छों में; फली-दीर्घ वृत्ताकार छोटी; बीज-बहुत, काले से भूरे रंग के होते हैं । पत्तों का शाक खाते हैं तथा बीजों का भी व्यवहार किया जाता है । बीज शीतल, स्नेहन तथा पौष्टिक होते हैं । १ तोला बीज, मिश्री तथा उष्ण दुग्ध के साथ कामोत्तेजना के लिये देते हैं । बीजों का फांट अतिसार में तथा मूत्राघात में मिश्री एवं बीज का उपयोग किया जाता है । मात्रा-१/२-१ तोला । १. पुटमिति पाठा० । २. शुक्राभमिति पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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