भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ४४५ अथ स्पृक्का (असबरग)। सुगन्धिद्रव्यम् (शाकविशेषः)। 'लङ्कोइकपुरी'ति लोके च। तस्या नामगुणानाह स्पृक्काऽसृग् ब्राह्मणी देवी मरुन्माला लता लघुः। समुद्रान्ता वधूः कोटिवर्षा लङ्कोषिकेत्यपि ।। १२५ ।। स्पृक्का स्वाद्वी हिमा वृष्या तिक्ता निखिलदोषनुत्। कुष्ठकण्डूविषस्वेददाहाश्री¹ ज्वररक्तहृत् ।। १२६ ।। स्पृक्का (असबरग) जो कि सुगन्धित द्रव्यों में से एक प्रकार का शाक ही है तथा जिसे लोक में 'लङ्कोइकपुरी' भी कहते हैं, उसके नाम तथा गुण—स्पृक्का, असृग्, ब्राह्मणी, देवी, मरुन्माला, लता, लघु, समुद्रान्ता, वधू, कोटिवर्षा और लङ्कोषिका ये सब संस्कृत नाम 'स्पृक्का' के हैं। स्पृक्का—स्वादिष्ट, शीतवीर्य, वृष्य, तिक्त रसयुक्त तथा सम्पूर्ण दोषों को दूर करने वाली होती हैं एवं यह कुष्ठ, खुजली, विष, पसीना, दाह, अलक्ष्मी, ज्वर तथा रक्तविकार को नष्ट करती है। [१२५-१२६] ५२. स्पृक्का स्पृक्का भी एक सन्दिग्ध द्रव्य है। डल्हण ने इसे 'कुटिलपुष्पा सुगन्धिद्रव्यमौत्तरापथिकम्' (सु० सू० ३८) लिखा है। चरक में भी इसका उल्लेख है। कुछ लोगों ने इसका ले० नाम मार्सिलिआ क्वाड्रिफोलिएटा (Marsilia quadrifoliata) तथा कुछ ने ट्राइफोलिअम् ऑफिसिनेल् (Trifolium officinale) लिखा है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। डॉ० देसाई ने एनिसोमेलिस् मलवारिका को स्पृक्का लिखा है। वर्णन एवं गुण-धर्म की दृष्टि से यह उचित मालूम होता है अतः इसी का वर्णन किया जा रहा है। गु०—मखमली चोधारों। म०—कपुरीमधुरी, कालोतुंबो, गावजबान, चोधारा। क०—करितुंबे। ते०—मोगबीराकु। ता०—पेथिमसरी। अं०—Malabar catmint (मॅलॅबर् केट्मिण्ट्)। ले०—Anisomeles malabarica R. Br. (एनिसोमेलिस् मलवारिका र० ब्र०)। Fam. Labiatae (लेविएटी)। इसका क्षुप—अत्यन्त रोमश तथा झाड़ीदार दक्षिण भारत में होता है। यह ४-६ फीट ऊँचा रहता है। पत्ते—मोटे, लंबगोल, कुछ शल्याकृति, दन्तुर तथा सवृन्त रहते हैं। पुष्प—हलके जामुनी रंग के रहते हैं। इसके पत्र सुगन्धि एवं कड़वे रहते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल तथा एक कडुवा क्षाराभ रहता है। गुण और प्रयोग—यह उत्तम स्वेदजनन, शीतप्रशमन तथा उत्तेजक है। यह तीव्र औषध है। उदर शूल, अपचन तथा कुपचन में इसे खिलाते हैं तथा इसका पेट पर लेप भी करते हैं। बच्चों में दंतोद्भेद के समय होने वाले विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है। कृमिज्वर तथा अन्य ज्वरों में विशेष कर जीर्ण ज्वर में इससे लाभ होता है। आमवातादि में इसके उड़नशील तैल को लगाया जाता है तथा पत्तों के क्वाथ से सेंका जाता है। तैल का भी आंतरिक प्रयोग पाचन के विकारों में किया जाता है। मात्रा—स्वरस १/४-१/२ चम्मच। तैल-२-५ बूँद। 'पर्पटी' इति प्रसिद्धं 'पद्मावती' इति चोत्तरदेशे, सुगन्धि द्रव्यम्। अथ पर्पटी (पनडी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह पर्पटी रञ्जना कृष्णा जतुका जननी जनी। जतुकृष्णाऽग्निसंस्पर्शा जतुकृच्छ्रकवर्तिनी ।। १२७ ।। पर्पटी तुवरा तिक्ता शिशिरा वर्णकृल्लघुः। विषव्रणहरी कण्डूकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ।। १२८ ।। १. दाहास्र इति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA