भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्पूरादिवर्गः ४४७ अथ प्रपौण्डरीकम् । सुगन्धि द्रव्यम् (पुण्डेरी) इति लोके प्रसिद्धम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह प्रपौण्डरीकं पौण्डर्यं चक्षुष्यं पौण्डरीयकम् । पौण्डर्यं मधुरं तिक्तं कषायं शुक्रलं हिमम् । चक्षुष्यं मधुरं पाके वर्ण्यं पित्तकफप्रणुत् ।।१३१।। ‘पुण्डेरी’ इस नाम से लोक में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य के नाम तथा गुण—प्रपौण्डरीक, पौण्डर्य, चक्षुष्य और पौण्डरीयक ये सब संस्कृत नाम ‘पुण्डेरी’ के हैं । पुण्डेरी—मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शुक्रजनक, शीतवीर्य, नेत्र के लिये हितकर, पाक में मधुर और शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला तथा पित्तकफ का नाशक है । [१३१] ५५. पुण्डेरी प्रपौण्डरीक भी एक संदिग्ध द्रव्य है । कुछ लोगों ने पुण्डरीक तथा प्रपौण्डरीक में नाम तथा गुण सादृश्य होने से दोनों को एक मान लिया है लेकिन यह उचित नहीं है । पुण्डरीक श्वेत कमल का नाम है । पुण्डरीक नाम से सुश्रुत (क० अ० २) में कन्दविष का उल्लेख है । ‘पुण्डरीकेण रक्तत्वमक्ष्णोर्वृद्धिस्तथोदरे ।’ प्रपौण्डरीक का एक नाम ‘चक्षुष्य’ होने से ‘चाकसू’ नामक वनस्पति को प्रपौण्डरीक के स्थान पर लिया जा सकता है । डॉ० देसाई ने चाकसू को ‘वन्यकुलत्थ’ लिखा है । वन्यकुलत्थ-रक्तपित्तकृत्, शीतल, कफवातहर एवं कषाय रसयुक्त होती है । कुछ लोग यूनानी द्रव्य ममीरा मानते हैं क्योंकि उसका नेत्र रोगों में बहुत व्यवहार होता है । निम्न वर्णन चाकसू का है । सं०—चक्षुष्या, अरण्यकुलत्थिका । हिं०—चाक्षुस्, चाकसू । पं०—चक्सू । गु०—चीमेड । कांठि०—चमेड । म०—चिनोल, कानकुटी, चिम्न । ता०—करुकानम् । ते०—चनुपाल विट्टलु । कं०—क्रीड, निन्द्रताछ । अ०—जश्मीजज, इब्बुस्सूदान । फा०—चश्मीजज, चशूम । ले०—Cassia absus Linn. कैसिआ एब्सस् लिन०) । Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी) । यह प्रायः सर्वत्र प्राप्त होता है । इसके एक वर्षायु क्षुप-८-१८ इञ्च ऊँचे होते हैं । पत्रनाल बड़ा और पत्रदण्ड पर प्रत्येक पत्रकद्वय के बीच एक रेखाकार ग्रन्थि होती है । पत्रक—संख्या में ४, आयताकार, .६-.९ इञ्च लम्बे, करीब-करीब कुण्ठिताग्र और मध्यशिरा के दोनों ओर के उनके दोनों भाग आधार पर असमान होते हैं । पुष्प सवृन्त पीले या लाल जिसमें केवल ४ पुंकेशर होते हैं और जो अग्रय मंजरी मे रहते हैं । फली—चिपटी, रोमश तथा १-१ १/२ इञ्च लम्बी होती है । बीज—संख्या में पाँच, चमकीले, काले भूरे, चिकने, चिपटे, अंडाकृति किन्तु एक सिरा पतला और लम्बाई तथा चौड़ाई में १/६ इञ्च होते हैं । बीज का कवच निकाल देने से पीले रंग की तथा कड़वी मज्जा निकलती है । रासायनिक संगठन—इसके बीजों में २ १/२% राख होती है । उसमें मँगेनीझ का अंश रहता है । गुण और प्रयोग—यह संग्राहक एवं नेत्राभिष्यंदप्रशमन है । पूययुक्त नेत्राभिष्यंद में भुने हुए बीजों की मज्जा का १/२ रत्ती चूर्ण पलकों के अन्दर रखते हैं । बीजों को पानी में साने हुए गेहूँ के आटे में रख, गरम राख में गरम कर, छिलका निकाल कर नेत्ररोगों में प्रयोग किया जाता है । चाकसू के २१ बीज तथा सफेद चंदन ५ माशे रात में जल में भिगो कर सुबह उस जल को छानकर पिलाने से रक्त मूत्र ठीक होता है । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे कर्पूरादिवर्गः समाप्त ।। ❖※❖ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA