भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ गुडूच्यादिवर्गः अथ गुडूची। तस्य उत्पत्तिं नामानि गुणांश्चाह अथ लङ्केश्वरो मानी रावणो राक्षसाधिपः। रामपत्नीं बलात्सीतां जहार मदनातुरः ।।१।। ततस्तं बलवान् रामो रिपुं जायाऽपहारिणम्। वृतो वानरसैन्येन जघान रणमूर्धनि ।।२।। हते तस्मिन्सुरारातौ रावणे बलगर्विते। देवराजः सहस्राक्षः परितुष्टश्च राघवे ।।३।। तत्र ये वानराः केचिद्राक्षसैर्निहता रणे। तानिन्द्रो जीवयामास संसिच्यामृतवृष्टिभिः ।।४।। ततो येषु प्रदेशेषु कपिगात्रात्परिच्युताः। पीयूषबिन्दवः पेतुस्तेभ्यो जाता गुडूचिका ।।५।। गुडूची मधुपर्णी स्यादमृताऽमृतवल्लरी। छिन्ना छिन्नरूहा छिन्नोद्भवा वत्साडनीति च ।।६।। जीवन्ती तन्त्रिका सोमा सोमवल्ली च कुण्डली। चक्रलक्षणिका धीरा विशल्या च रसायनी ।।७।। चन्द्रहासा वयस्था च मण्डली देवनिर्मिता। गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी ।।८।। संग्राहिणी कषायोष्णा लघ्वी बल्याऽग्निदीपिनी। दोषत्रयामतृड्दाहमेहकासांश्च पाण्डुताम् ।।९।। कामलाकुष्ठवातास्रज्वरक्रिमिवमीन्हरेत् । (प्रमेहश्वासकासार्शः कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत्) ।। १०।। अब यहाँ से गुडूच्यादिवर्ग आरम्भ होता है। उसमें प्रथम 'गिलोय' की उत्पत्ति, नाम तथा गुण कहते हैं। उत्पत्ति—जबकि अभिमानी, लङ्का के राजा, राक्षसों के स्वामी रावण ने कामातुर हो श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी श्रीसीताजी को बलपूर्वक हरण किया, तब बलवान् श्रीरामचन्द्रजी ने स्त्री के हरण करनेवाले उस शत्रु (रावण) को वानरों की सेनाओं से युक्त हो युद्ध में मारा। बल से गर्वीले, देवताओं के शत्रु उस रावण के मारे जाने पर हजार नेत्रों वाले देवताओं के राजा इन्द्र, श्रीरामचन्द्रजी पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उस युद्ध में जो कोई वानर राक्षसों के द्वारा मारे गये थे उन्हें अमृत की वर्षा से सींचकर जिला दिया। उसके बाद जिन स्थानों पर वानरों के शरीर से अमृत की बूँदें पृथ्वी पर गिरीं, उनसे 'गिलाय' की उत्पत्ति हुई। नाम—गुडूची, मधुपर्णी, अमृता, अमृतवल्लरी, छिन्ना, छिन्नरुहा, छिन्नोद्भवा, वत्साडनी, जीवन्ती, तन्त्रिका, सोमा, सोमवल्ली, कुण्डली, चक्रलक्षणिका, धीरा, विशल्या, रसायनी, चन्द्रहासा, वयस्था, मण्डली और देवनिर्मिता ये सब संस्कृत नाम 'गिलोय' के हैं। गुण—गिलोय कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवं विपाक में मधुर रसयुक्त, रसायन, संग्राही, उष्णवीर्य, लघु, बलकारक, अग्निदीपक तथा त्रिदोष, आम, तृषा, दाह, मेह, कास, पाण्डुरोग, कामला, कुष्ठ, वातरक्त, ज्वर, क्रिमि और वमि को दूर करती है। (यह प्रमेह, श्वास, काश, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, हृद्रोग और वात इन सबों का नाश करने वाली होती है)। [१-१०] इसके पत्तों के गुण आगे शाकवर्ग में लिखे हुए हैं। १. गिलोय हिं०-गिलोय, गुरुच, गुडुच। बं०-गुलंच, पालो (सत्व)। म०-गुलवेल, गरुड़ वेल। गु०-गलो। क०- अमरदवल्ली, अमृत वल्ली। ते०-तिप्पतीगे। ता०-शिन्दिलकोडि, अमृडवल्ली। उ०-गुलंचा। पं०-गिलो।