भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ४४९ क०-गरुड़वेल। मला०-अम्रितु। गोआ०-अमृतवेल। फा०-गिलोई, गिलोय। अ०-गिलोइ। अं०-टिनोस्पोरा। ले०-Tinospora cordifolia (Willd.) Miers (टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया मायर्स)। Fam. Menispermaceae (मेनिस्यर्मेसी)। गिलोय-प्रायः सब प्रान्तों के जंगल-झाड़ियों में पाई जाती है विशेषकर गरम प्रान्तों में अधिक होती है। देहरादून और सहारनपुर के जङ्गलों में बहुत पायी जाती है। इसकी बहुवर्षायु, चिकनी एवं मांसल लता-बहुत विस्तार में वृक्षों पर फैल जाती है। शाखाओं से डोरे के समान शीरियाँ निकल कर भूमि की ओर लटकती हैं। पत्ते-पान के समान, २-४ इञ्च के घेरे में गोलाकार नुकीले, चिकने, पतले, ७-९ शिराओं से युक्त एवं १-३ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। प्रायः वसन्त ऋतु में इसके पुराने पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं और ज्येष्ठ तक नवीन पत्ते निकल आते हैं। उसी समय हरापन युक्त पीले रंग के अथवा केवल पीले रंग के फूलों के गुच्छे आते हैं। फल-मटर के समान होते हैं और पकने पर ये लाल हो जाते हैं। बीज-कुछ टेढ़े तथा चिकने होते हैं। इसके मूल तथा कांड का व्यवहार औषध के लिये किया जाता है। ताजी अवस्था में कांड की छाल हरी तथा मांसल रहती है तथा उस पर पतली भूरे रंग की बाह्य त्वचा रहती है जिसकी पपड़ी निकलती रहती है। इस पर छोटे- छोटे गड्ढे होते हैं। इसको काटने से अन्दर का भाग चक्राकार दिखाई देता है। ताजी एवं हरी गुडुच ज्यादा लाभप्रद होती है। गरमी में मई महीने के आखिर में इसका संग्रह करना चाहिये। प्रयोग के पूर्व इसके ऊपर की छाल खुरचकर निकाल दी जाती है। इसमें गन्ध नहीं होती किन्तु स्वाद कड़वा होता है। इससे कुछ भिन्न इसकी एक दूसरी जाति प्रायः बड़ी (४°-९° x ८°), मृदु रोमश और प्रायः त्रिखण्ड पत्तियों वाली होती है। इसके बीज के कठोर आवरण पर छोटे-छोटे दाने होते हैं। इसे सं०-पद्मगुडूची, बं०-पद्मगुलंच, माल०, पं०-बड़ी सरसटीलत एवं ले०-Tinospora malabarica (Lam.) Miers (टिनोस्पोरा मलवारिका मायर्स) कहते हैं। दोनों के गुण और स्वरूप में स्थूल रूप से कोई अन्तर न मिलने के कारण दोनों का ही व्यवहार गुडूची के नाम से किया जाता है। इसे कुछ विद्वानों ने सुदर्शन माना है। रासायनिक संगठन-इसकी ताजी कांड त्वक् में तीन रवेदार पदार्थ, गिलोइन ग्लूकोसाइड (Giloin, C₂₃ H₃₂ O₁₀, 5H₂ O), गिलोइनिन नामक कड़वा पदार्थ (Giloinin, C₁₇ H₁₈ O₅) तथा गिलोस्टेरॉल (Gilosterol, C₂₈ H₄₈ O) पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें बर्बेरिन (Berberine) एवं मोम की तरह का एक पदार्थ पाया जाता है। गुडूचीसत्व-अच्छी मोटी गुडुच बरसात के पूर्व संग्रहकर ऊपर की छाल छुड़ाकर साफ धोकर छोटे टुकड़े बना पत्थर के खरल में महीन कूट डाले। इसमें चौगुना जल डाल १२-२४ घंटा भींगने के बाद अच्छी तरह मसलकर कपड़े से छान ले। सत्व नीचे बैठने के बाद ऊपर का जल धीरे से निथार कर सत्व को सुखाकर बन्द बोतलों में रखें। कुछ लोग निथरे हुए जल में फिर से उसी गुडुच को मसल एवं उबाल कर छान लेते हैं तथा उस द्रव को पहले निकाले हुए सत्व में मिलाकर धूप में सुखा लेते हैं जिससे इसमें उष्ण जल में घुलनशील पदार्थ भी आ जाते हैं। कुछ लोग निथारे हुए जल को औटाकर स्वतन्त्र प्रयोग भी करते हैं। गुण और प्रयोग-गुडुच कड़वी, उष्ण, त्रिदोषघ्न, रसायन, बल्य, ज्वरहर, दीपन, मूत्रजनन, त्वग्रोगहर, पित्तसारक तथा विषघ्न है। नवीन, अनुसंधानों से गुडूची का व्याधिप्रतिकारक गुण व्यापक रूप में प्रमाणित हुआ है। जीर्ण पूतिकेन्द्र (Chronic septic focus) जनित विकार, जीर्ण विषमज्वर तथा यकृत् की हीनकार्यता आदि में कुछ काल तक गुडूची का प्रयोग करते रहने से अवश्य लाभ होता है। ३२ भाव.I