भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ४५९ प्रथम पाढल दक्षिण में कम मिलने के कारण वहाँ इस वृक्ष की छाल तथा पुष्प का पाटला के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक रवेदार कड़वा पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीतल, वातहर एवं ज्वरघ्न है। मस्तिष्क तथा वातनाड़ी संस्थान पर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इसके मूल का फांट ज्वर में रोगी को शांतता लाने के लिये देते हैं। इसके फूलों का रस पाचन ठीक होकर दूषित पित्त का निर्हरण हो इसलिये देते हैं। मात्रा-चूर्ण १-३ माशा। अथाग्निमन्थः । (अगेथू, अरनी इति च लोके) तस्य नामानि गुणाँश्चाह अग्निमन्थो जयःसस्याच्छ्रीपर्णी गणिकारिका । जया जयन्ती तर्कारी नादेयी वैजयन्तिका ।।२३।। अग्निमन्थः श्वयथुनुद्दीर्घोष्णः कफवातहृत् । पाण्डुनुक्तटुकस्तिक्तस्तुवरो मधुरोऽग्निदः ।।२४।। अगेथू या अरनी के नाम तथा गुण-अग्निमन्थ, जय, श्रीपर्णी, गणिकारिका, जया, जयन्ती, तर्कारी, नादेयी और वैजयन्तिका ये सब संस्कृत नाम 'अगेथू' या 'अरनी' के हैं। अरनी या अगेथू शोथनाशक, उष्णवीर्य, कफवात तथा पाण्डु रोग को दूर करने वाला, कटु, तिक्त, कषाय तथा मधुर रस युक्त एवं अग्निवर्धक है। [२३-२४] नोट-भावप्रकाशकार ने यद्यपि एक ही अग्निमंथ का वर्णन किया है तथापि अन्य निघंटुओं में लघु एवं बृहद् ऐसे दो भेद अग्निमंथ के लिखे हैं। दोनों के गुणों में विशेष अन्तर नहीं हैं किन्तु लघु अग्निमंथ को लेप, उपनाह एवं शोफ में विशेष उपयोगी लिखा है। 'लघ्वाग्निमंथस्य गुणाः प्रोक्ताः वृद्धाग्निमंथवत् । विशेषाल्लेपने चोपनाहे शोफे च कीर्तितः ।।' (नि० र०)। सुश्रुत के वरुणादि गण में तर्कारी और अग्निमंथ ये दोनों शब्द आये हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि ये दोनों भिन्न द्रव्य हैं। आधुनिक ग्रन्थकारों ने प्रेम्ना इण्टैग्रिफोलिआ (बृहद् अग्निमंथ) एवं क्लेरोडेण्ड्रम फ्नोमाइडीस् (क्षुद्र अग्निमंथ) ऐसे दो द्रव्यों का वर्णन किया है। ये दोनों ही एक वर्ग के हैं तथा इनके गुणों में भी साम्य होने के कारण दोनों को एक दूसरे के स्थान में प्रयोग किया जा सकता है। इनमें से प्रथम को कुछ लोगों ने तर्कारी माना है तथा द्वितीय को अग्निमंथ माना है। कुछ लोग इसके विपरीत मानते हैं जो अधिक उचित है क्योंकि क्लो० फ्लोमाइडिस्का स्थानिक नाम 'टेकार', तर्कारी का अपभ्रंश मालूम होता है। यहाँ दोनों का अलग-अलग वर्णन दिया जा रहा है। ७. क्षुद्राग्निमंथ हिं०-अरनी(णी), टेकार, उरिन। बं०-अरनी, गणियारी। संथा-पनजोत। मुंगे०-रैन। गु०-अरणी। म०-ऐरण, टांकली। ता०-थलंजी। ते०-तलूंकि। क०-तग्गि। मल०-तिरूतालि। ले०-Clerodendrum phlomidis Linn. f. (क्लेरोडेण्ड्रम् फलोमाइडीस् लिन. । Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी)। यह महाराष्ट्र, गुजरात, सिंध आदि सब प्रान्तों में प्रायः बाडों पर या सूखी जगहों में पाई जाती है। इसके गुल्म-बड़े (छोटे वृक्ष), प्रायः शाखाएँ-प्रसरणशील और टहनियाँ हलके खाकी रंग की तथा मृदुरोमश होती हैं। पत्ते-विपरीत, चौड़े लट्वाकार अथवा कुछ-कुछ तिर्यगायताकार, अखण्ड या दूर-दूर गोलदन्तुर, प्रायः २ x १.५ इञ्च बड़े, सवृन्त और मृदुरोमश (नवीन) या चिकने होते हैं। पुष्प-श्वेत, सुगंधि, पत्रकोणीय या अग्र्य गुच्छों में आते हैं। आभ्यंतर नाल .७५-.१ इञ्च बड़ा और मुख व्यास में .७५ इञ्च होता है। फल-अष्ठिल फल, करौंदे इतने बड़े, शीर्ष पर दबे हुए परन्तु अन्त में शुष्क होकर चार खण्डों में फट जाते हैं। जानवरों के प्रवाहिका तथा कृमिरोग में क्षुद्राग्निमंथ का उपयोग ग्रामीण करते हैं। बृहद् अग्निमंथ के अभाव में इसके पंचांग, मूल तथा पत्र का उपयोग किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA