भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६० भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग—यह उष्ण, दीपन, सारक, बल्य, रसायन, शोथहर एवं वात-कफहर है। वायु, कफ तथा सूजन जिन-जिन रोगों में होता है उनमें इसका उपयोग करते हैं। आमवात तथा आन्तरिक ज्वर में इसकी जड़ सोंठ एवं मिरिच के साथ दी जाती है। इसके मूल का क्वाथ सोजाक, विस्फोटक ज्वरों की रोगमुक्तावस्था, आमवात तथा नाड़ीशूल में देते हैं। इसके पत्र तथा काण्ड का उपयोग मधुमेह में उपयोगी पाया गया है। आध्मान में इसके पत्ररस से लाभ होता है। मोच तथा शरीरपीड़ा में पत्तों को पीसकर उसका लेप किया जाता है। त्वचा के रोगों में १/२ औ० पत्ररस दिन में दो बार पिलाते हैं। मात्रा—चूर्ण १-२ माशा।
८. बृहदग्निमंथ
हिं०—अरनी, अरणी, अंगेथु, गणियारी, गनियार, गनियारी, वाकर। बं०—गनिर, गनियारि। मा०—अरणी। म०—नरवेल, अरणी। प्र०—अगेथु, गनियार। गु०—अरणी। संथा०—कण्ड्रा-मिया। फा०—गनियार। अवधी— गन्नियारी। गढ़वाल—बकोरचा। ता०—इरुमै मुल्लै, मुन्नै। ने०—गिनेरी। उडि०—गन्धौना। ते०—घेबुनेल्लिल। मला०— अप्पेल। उत्क०—अगबिथ। ले०—(प्रेम्ना इण्टेग्रिफोलिआ लिन.)। (वर्बिनेसी)। वह बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, अवध, गढ़वाल, राजपुताना, दक्षिण-हिन्दुस्तान, बम्बई, सिलोन तथा अन्यान्य प्रान्तों में विशेष रूप से समुद्री किनारों पर पाई जाती है। इसका झाड़ीदार वृक्ष—३०-३५ फुट तक ऊँचा होता है। स्तम्भ छोटा तथा बहुत सी काँटेदार टहनियाँ नीचे लटकी हुई रहती हैं। छाल—पतली सफेदी-युक्त हलके पीले रंग की और लकड़ी हलकी किंचित् दृढ़ होती है। पत्ते—विपरीत, लम्बे, पर्णवृन्त से युक्त, साधारण हृदया-कृति किन्तु अग्र कुछ कटा हुआ तथा चिकने रहते हैं। चैत्र-वैशाख में छोटे- छोटे हरापन लिये सफेद रंग के फूल झूमकों में आते हैं। फल—छोटी मकोय के समान झूमकों में लगते हैं और पकने पर काले हो जाते हैं। पूरे वृक्ष में एक प्रकार की उग्र गंध आती है। इसका स्वाद खट्टा सा तथा कषाय रहता है। इसके मूल तथा पत्तों का व्यवहार किया जाता है। इसका एक अन्य भेद प्रेम्ना लैटिफोलिया राक्स. (Premna latifolia Roxb.) पाया जाता है। इसके पत्ते कुछ-कुछ दुर्गन्धयुक्त, प्रायः लट्वाकार, कभी-कभी अंडाकार, ३-५ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, अखंड, लम्बे नोकवाले तथा एक ओर (नीचे) या नवीन रहने पर दोनों तलों पर मृदुरोमश होते हैं। पुष्पव्यूह-त्रि-विभक्त और व्यास में २-५ इञ्च, रोमश और कोण पुष्पकों से युक्त होता है। बाह्यकोश शीर्ष पर दन्तुर होता है और दाँत पाँच होते हैं। आभ्यन्तर कोश स्पष्टतः द्वयोष्ठ होता है। फल—गोल, अग्र पर दबा हुआ और .२५ इञ्च बड़ा होता है। इसका जो भेद इस प्रान्त के शाल वनों में मिलता है उसे प्रे० मक्रोनॅटा राक्स (P. mucronata Roxb.) कहते हैं। यह नम स्थानों में प्रायः बहुत बड़ा हो जाता है। नवीन शाखाओं पर प्रायः १-३ इञ्च लम्बे मजबूत कांटे होते हैं और इनकी पत्तियाँ तीन-तीन या चार-चार एक चक्र में होती हैं। काट प्रायः १/२ इञ्च मोटा, सफेद और बिना रेशे का होता है। पत्तियाँ मसलने पर गंधयुक्त और सूखने पर काली हो जाती हैं। इस वृक्ष की लकड़ियों को परस्पर रगड़ने से आग पैदा होती है। इसके अन्य भी कई भेद होते हैं। गुण और प्रयोग—यह कटु, उष्ण, तिक्त, शोथघ्न, वातहर, दीपन, श्लेष्मघ्न, ज्वरघ्न, सारक, शीत प्रशमन, अनुवासनोपग तथा गर्भाशय के लिये अवसादक है। इसका प्रयोग वातरोग, कफरोग, शोथ, आमवात, नाड़ीशूल, पांडु, अर्श, अग्निमांद्य, विबंध, प्रतिश्याय, ज्वर एवं पर्यायिक तथा विस्फोटक ज्वर में किया जाता है।